जापान में भी प्रिंट मीडिया की हालत पतली

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सूचना क्रांति, सोशल मीडिया, पूंजीवाद और राष्ट्रवाद के इस दौर में परंपरागत प्रिंट मीडिया और उसमें काम करने वाले पत्रकारों व तकनीकी कर्मचारियों की हालत जापान में भी पतली हुई है। कर्मचारियों की संख्या में कटौती हो रही है और कर्मचारी यूनियनें पहले से कमजोर हुईं हैं। सोशल मीडिया ने प्रिंट व इेलेक्ट्रानिक मीडिया के सूरत-ऐ-हाल को वहां भी पूरी तरह बदल कर रख दिया है।

जापान से आए यूएनआई ग्लोबल यूनियन के प्रतिनिधिमंडल के अनुसार वहां के सबसे बड़े अखबार योमियूरी शिम्बुन का सक्र्युलेशन कम हो गया है। अशाई शिम्बून का भी घटा है। पर इनके मुकाबले छोटे अखबारों का ज्यादा कम हुआ है। कारण, ये दोनों अखबार विज्ञापन पर निर्भर नहीं करते। इनका अपना सर्कूलेशन सिस्टम है। और ग्राहक भी। इनकी आय का मुख्य स्त्रोत पाठक ही है। योमियूरी के करीब एक करोड़ पाठक हैं तो अशाई के साठ लाख से भी ज्यादा। फिर भी समय को भांपते हुए इन सभी ने अपने ऑन लाइन एडिशन शुरू कर लिए हैं। कर्मचारियों की भर्ती अब नहीं हो रही है।

आईटी सेक्टर की योकोगावा के नेतृत्व में आए इस प्रतिनिधिमंडल में जापान के उद्योग जगत की विभिन्न कंपनियों के 12 प्रतिनिधि शामिल थे। सभी ने भारत में मीडिया के हालात जानने में खास रूचि दिखाई। वे जानना चाहते थे कि इंटरनेट के इस दौर में क्या भारत में भी प्रिंट मीडिया के प्रचार प्रसार में कमी आई है। इस पर आल इंडिया न्यूजपेपर्स एम्पलॉइज फेडरेशन (एआइएनएएफ) के उपाध्यक्ष पीयूष वाजपेई ने बताया कि आंकड़े बताते हैं कि भारत में अभी प्रिंट मीडिया के सर्कुलेशन में गिरावट नहीं आई है। इसके साथ ही यहां ऑनलाइन अखबारों का चलन भी बढ़ रहा है । उन्होंने प्रतिनिधिमंडल से जानना चाहा कि क्या जापान में भी मीडिया पर कुछ लोगों का एकाधिकार हो रहा है? जवाब में उन्होंने बताया कि जापान का मीडिया भी कार्पोरेट जगत की गिरफ्त में आ रहा है। मगर ज्यादा नहीं। कारण, वहां मीडिया का आधार विज्ञापन न होकर पाठकों की संख्या है। दूसरा, यूरोप की तरह वहां भी कुछ बड़े अखबार दूसरे मीडिया घरानों के अखबारों को खरीद रहे हैं। जैसे कि अखबार निकी ने पीयर्सन कंपनी से उसके अखबार फाइनेंशियल एक्सप्रेस को खरीद लिया। इससे उसके डिजिटल अखबार के खरीददार पाठकों की संख्या बढ़कर चार लाख 50 हजार से भी ज्यादा हो गई।

सोशल मीडिया के बारे में उन्होंने बताया कि उनके देश में भी युवा वर्ग इससे बुरी तरह चिपका रहता है। टीवी के आने से प्रिंट मीडिया पर कोई असर नहीं हुआ था पर इंटरनेट ने जापान में भी परंपरागत मीडिया के स्वरूप को बदलने पर मजबूर कर दिया है। अब लोगों, खासकर युवकों में पढऩे या सुनने की बजाए देखने का चलन बढ़ गया है। सोशल मीडिया की आज की सबसे गड़ी चुनौती फेक न्यूज के बारे में उनका कहना था कि जापान में भी यह समस्या है और सरकार अभी तक उसे रोक पाने का कोई हल नहीं निकाल पाई है।

महिला कर्मचारियों के संदर्भ में उनका कहना था कि उनके साथ वैसे तो कोई भेदभाव नहीं किया जाता पर हां, उच्च पदों पर उनकी संख्या वहां भी न के बराबर ही है। कार्यस्थल पर यौन शोषण से भी उन्होंने इंकार नहीं किया। उनके अनुसार वहां अमेरिका से प्रभावित हो महिला कर्मचारियों ने मी टू जैसा कोई अभियान अभी तक नहीं चलाया पर ऐसा नहीं कि वहां दफ्तरों में महिला कर्मचारियों के साथ छेड़छाड़ नहीं होती।

जापानी प्रतिनिधिमंडल के कुल 12 सदस्यों में से छह महिलाएं थीं। भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं की स्थिति के बारे में जब उन्होंने सवाल किया तो उन्हें बताया गया कि कैसे संविधान के तहत यहां कानूनी रूप से स्त्री-पुरुष के काम व वेतन में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता पर व्यवहार में यह भेदभाव अभी तक कायम है।

दुनियाभर में कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए काम कर रहे संगठन यूएनआई ग्लोबल यूनियन की मुख्य चिंता आज यही है कि कैसे कर्मचारियों को संगठित कर मल्टीनेशनल कंपनियों के भीतर उनकी स्थिति को मजबूत किया जाए। इसके लिए 2020 तक उसने अपने सामने पांच लक्ष्य रखे हैं। यूनियनों को संगठित कर उनका विकास करना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भीतर जैसे तैसे अपनी ताकत बढ़ाना, सामूहिक सौदेबाजी की अपनी ताकत बढ़ाना, और सरकार व सरकारी मशीनरी को जवाबदेह बनाना।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व एआईएनइएफ की दिल्ली कार्यकारिणी की सदस्य हैं)