जानना महानगरों की परंपरा को!

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पुराने ऐतिहासिक, धार्मिक-सांस्कृतिक नगरों में उत्तरप्रदेश सरकार की काफी रुचि है। शायद इच्छा हो आधुनिक पीढ़ी भी अपनी परंपरा को जाने समझे और संजोए। लेकिन यह काम और बेहतर होता यदि भारतीय जनमानस को तटस्थ भाव से परंपरा की जानकारी देने का काम शासन कर पाता।

प्रधानमंत्री का संसदीय निर्वाचन क्षेत्र है वाराणसी। वाराणसी या बनारस गंगा जमुनी तहजीब में रचा-बसा पुराना शहर है। वाराणसी में जीवन भर लोग रहते हैं लेकिन वे इसे नहीं समझ पाते। कहते है वाराणसी पुराणों के काल से ‘शिव के त्रिशुल पर बसी काशी’ कही जाती रही है।

गंगा और शिव के बिना इस काशी की कोई चर्चा हो ही नहीं सकती। यही वे विश्वविख्यात शिव हैं जिनके दरवाजे पर कभी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई बजाते थे तो विश्वनाथ मंदिर के कपाट खुलते थे। यह वह काशी है जहां पंडित राज जगन्नाथ गंगा की आराधना में रहते थे और गंगा खुद आकर उनके चरण का स्पर्श करती थी। यह वहीं नगर है जो सदियों से सिर्फ मोक्ष के लिए नहीं बल्कि शिक्षा, धर्म, व्यापार के लिए भी चर्चा में रहा। यहीं पंडित मंडन मिश्र और पंडित शंकराचार्य के बीच शास्त्रार्थ भी हुआ था।

उत्तरप्रदेश पत्रिका के काशी अंक में शायद यह न हो। एक दौर वह भी था जब एयर इंडिया के टिकट पर वाराणसी का टिकट लेते हुए उस पर लिखा होता था ‘सुबह-ए-बनारस’ और लखनऊ लौटते हुए को ‘शाम-ए-अवध’। लेकिन अब वह रिवाज नहीं है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी, आदि का कोई उल्लेख इस काशी में नहीं किया गया। यहां के संस्कृत और कश्मीर के पूर्व महाराज कर्ण सिंह का स्थापित रणवीर संस्कृत विद्यालय का भी कहीं कोई उल्लेख नहीं है। जहां से वेदपाठी आज पूरे देश में फैले हुए हैं।

काशी विश्वनाथ मंदिर के कलशों पर सोने का पतरा पंजाब के महाराज रणजीत सिंह ने लगवाया था। इस तरह मंदिर परिसर में कभी फर्श पर अशर्फियों बिछवाई गई थीं लेकिन समय के साथ वे गायब हो गईं। वाराणसी में एक मान्यता यह भी रही है कि विद्वत परिषद का आप पर साया है तो आपकी मेहनत सिर-आंखों पर। खैर यह दौर अंग्रेज़ी राज की शुरूआत में ही खत्म हो गया। यहीं तीज-त्योहारों में कजरी, ठुमरी, बिरहा आदि लोकगीतों की खासी परंपरा थी जिसे गाने सेे गिरिजा देवी का देश-दुनिया में खासा नाम हुआ और कीर्ति फैली।

आंदंोलनों और आज़ादी के बाद भी पूरे देश में चल रहे आंदोलनों की वाराणसी में खासी प्रतिध्वनि थी। एक दौर था जब यहां के नामी फोटोग्राफर एस अतिबल, सुधेदु पटेल और एक बड़ा हुजूम यहां साहित्यिक -सांस्कृतिक गतिविधियों में खासा योगदान करता था। हिंदी के विभिन्न साहित्यकार वाराणसी आना अपना सौभाग्य मानते थे। विदेशी विश्वविद्यालयों से बड़ी संख्या में तब छात्र बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी संपर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, काशी विद्याापीठ में आते थे। पंडित विद्यानिवास मिश्र इसी वाराणसी के पढ़े-लिखे विद्वान थे। ऐसे ही ढेरों नाम हैं जिनकी तस्वीर अचानक कौंध जाती है जब कोई बनारस जाने की बात करता है।

उत्तरप्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने राज्य के दोनो पारंपरिक नगरों बनारस और इलाहाबाद पर अपनी मशहूर पत्रिका उत्तरप्रदेश के दो अंक निकाले हैं। अंक संग्रहणीय हैं। बनारस पर निकला ह ै’काशी अंक’ और इलाहाबाद पर ‘प्रयाग अंक’। काशी अंक जहां 428 पेज का है वहीं ‘प्रयाग अंक’ सिर्फ 326 पेज का। दोनों ही अंकों की संपादक हैं कहानीकार और उपन्यासकार एम.हिमानी जोशी। बड़े ही धीरज के साथ यदि उत्तरप्रदेश के इन दोनों अंकों को पढ़े ंतो इनकी अद्वितीय सांस्कृतिक-सामाजिक-साहित्यिक विरासत की तस्वीर ज़रूर उभरती है।

बनारस या वाराणसी के काशी क्षेत्र में विश्वनाथ मंदिर और गंगा घाट तक पहुंचने के लिए पुराणकाल से मुगल काल तक गलियां निरंतर संकरी होती गई। पूरी दुनिया में बनारस को इसकी तंग गलियों के लिए जाना जाता था। उन गलियों को उत्तरप्रदेश प्रशासन ने विश्वनाथ कारिडोर और गंगा पाथवे बनाने के लिए उजाड़ कर ऐतिहासिक-आर्थिक-सामाजिक संस्कृति का विनाश कर दिया। काशी अंक में उन गलियों को उजाडने की बात न का उल्लेख न होना काशी को विस्मरणीय बनाने के लिए काफी है। शिव के त्रिशूल पर बसी काशी एक जीवंत, फक्कड़पन और मस्ती की नगरी थी। उसे आप विशाल महानगर में तबदील हो रहे वाराणसी में नहीं पा सकेंगे। वाराणसी अब तमाम नगरों की तरह ही एक नगर हैं जहां अध्ययन, धार्मिक, पर्यटन, व्यापार और रोजग़ार के लिए आसपास से हर सुबह हजारों आते हैं। कुछ रह जाते हैं। बाकी लौट जाते हैं।

इलाहाबाद (प्रयागराज) में अभी हाल अर्धकुंभ का विशाल आयोजन हुआ। इसमें स्नान से पुण्य लाभ लेने वालों में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थे। उनका आग्रह राज्य सरकार ने सिर माथे लिया कि पुण्यार्थियों को कहीं कोई तकलीफ न हो। इस मौके पर प्रकाशित उत्तरप्रदेश का प्रयाग अंक वाकई संग्रहणीय है। काशी अंक की तुलना में ज़रूर इसकी पेज संख्या कम हैं लेकिन सामग्री अच्छी है। काशी अंक से प्रयाग अंक बेहतर है। यह ज़रूर है कि इसकी पृष्ष्ठ संख्या यदि काशी अंक जितनी ही होती तो पाठकों के साथ और न्याय होता।

इलाहाबाद या प्रयाग शुरू से ही शिक्षा, धर्म, राजनीति और साहित्य के क्षेत्र के रूप में पाया। एम जोशी ‘हिमानी’ ने परिश्रम से इस अंक में भी अच्छी सामग्री का गुलदस्ता तैयार किया है। पारंपरिक तौर पर यहां सरस्वती (अब लुप्त) गंगा और यमुना नदियों के मिलन को सदियों से धार्मिक मान्यता मिली हुई है। यहां अखाड़े और आश्रम खूब हैं। इसलिए यहां बारह साल बाद कुंभ और छह साल बाद अर्द्धकुंभ का भव्य आयोजन होता है। अभी मार्च में महाशिवरात्रि के दिन अर्द्धकुभ का समापन हुआ।

इलाहाबाद का 1857 की आज़ादी की लड़ाई में भी खासा नाम रहा है। आज़ादी की दीवानगी देश की आज़ादी के साथ बढ़ती गई जिसका असर यहां शिक्षा साहित्य पर भी दिखता है।