जाँच की आँच से खलबली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताक़त का स्रोत क्या है? संघ का आधार नकारात्मक होता, तो दीर्घकाल तक ऊर्जा और प्रतिबद्धता उत्पन्न नहीं कर सकता था। स्पष्ट कहें, तो संघ अपनी विचारधारा को शुचिता और निष्ठा से जोड़कर परिभाषित करता रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि संघ की शक्ति का पूरा लाभ भाजपा को मिलता है। इसलिए यश, अपयश का प्रभाव भी संघ पर पड़ता है। ऐसे में इससे जुड़े लोगों की राजनीतिक शैली और प्रक्रियाओं पर नियंत्रण भी आवश्यक हो जाता है।
प्रश्न उठता है कि क्या संघ आरोप-प्रत्यारोप की तात्कालिक चुनौतियों के प्रति सतर्क है। ग्रेटर जयपुर की निलंबित मेयर सौम्या गुर्जर के कथित धतकर्मों ने इन सवालों में सेंध लगायी है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा सौम्या गुर्जर कांड में उनके पति राजाराम और बीवीजी कम्पनी के प्रतिनिधि ओमकार सप्रे की गिरफ़्तारी के साथ आरएसएस के क्षेत्रीय प्रचारक निंबाराम की घेराबंदी ने प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है। इसकी शुरुआत पिछले पखवाड़े जिस हो-हल्ले से हुई, उसने बवंडर की शक्ल अख़्तियार कर ली है। एसीबी ने अभी निंबाराम के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज की है। घूसख़ोरी के वीडियो में निंबाराम की मौज़ूदगी भाजपा के लिए परेशानी का सबब बन गयी है।
भाजपा के उपनेता राजेन्द्र सिंह राठौड़ भड़के हुए अंदाज़ में कांग्रेस पर हमलावर हो रहे हैं कि यह सौदा सरकार को बहुत महँगा पड़ेगा। राष्ट्रवादी संगठन को बदनाम किया गया, तो इस नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ सड़क से संसद तक बिगुल बजा देंगे। एसीबी ने आख़िर प्रारम्भिक जाँच को मुक़दमे में तब्दील क्यों कर दिया? जबकि इसमें कोई शिकायत ही नहीं है। केवल कूटरचित वीडियो के आधार पर मुक़दमा दर्ज कर लिया गया। यह मामला ही झूठ का पुलिंदा है। उधर एसीबी के डायरेक्टर जनरल बी.एल. सोनी का कहना है कि रिश्वत की राशि पेश करने और माँगने की पुष्टि होने के बाद वीडियो में नज़र आ रहे राजाराम, ओमकार सप्रे और निंबाराम साफ़-साफ़ नज़र आ रहे हैं। उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया है। उधर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा अपनी ही सरकार पर हमलावर हो रहे हैं कि निंबाराम की गिरफ़्तारी में देरी किस बात को लेकर है? जबकि वीडियो में संघ के क्षेत्रीय प्रचारक निंबाराम की मौज़ूदगी साफ़ नज़र आ रही है। इस मामले में एसीबी सावधानी की बात करें, तो उसके दो क़दम जबरदस्त चर्चा में रहे। पहला, एसीबी ने राजस्थान राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला से ऑडियो-वीडियो की तो जाँच करायी, जिसकी पुष्टि के लिए तेलंगाना एफएसएल से भी जाँच करायी; ताकि रिपोर्ट पर सवाल उठें, तो बचाव किया जा सके। दूसरा, एफएसएल की रिपोर्ट तो एसीबी को समयरहते मिल गयी थी, किन्तु सौम्या गुर्जर ने निलंबन सम्बन्धी प्रावधानों को उच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी थी। ऐसे में उच्च न्यायालय के फ़ैसले का इंतज़ार ज़रूरी था। न्यायालय का फ़ैसला जब सौम्या गुर्जर के ख़िलाफ़ आया, तब जाकर एसीबी ने गिरफ़्तारी का क़दम उठाया।


अलबत्ता दोनों एफएसएल जाँचों का लब्बोलुआब समझें, तो बीवीजी कम्पनी के प्रतिनिधि ने घूस की मोटी रक़म का प्रस्ताव दिया। राजाराम ने धमकाने के अंदाज़ में रिश्वत माँगी। उक्त मामले में प्रथम दृष्टया एक अन्य व्यक्ति की सहयोगात्मक उपस्थिति भी पायी गयी। स्पष्ट है कि यह अन्य व्यक्ति कौन था? भाजपा के उपनेता राजेन्द्र सिंह राठौड़ एफएसएल जाँच को लेकर उखड़े अंदाज़ में सरकार पर हमलावर हो रहे हैं कि जाँच केंद्रीय एफएसएल के बजाय तेलंगाना से क्यों करायी? उधर एसीबी सूत्रों का कहना है कि बीवीजी कम्पनी के जिस भी कर्मचारी ने वीडियो बनाया, उसने पहले 276 करोड़ के भुगतान सम्बन्धी बातचीत को मोबाइल पर रिकॉर्ड किया, फिर मुलाक़ात के दौरान वीडियो बनाया। सूत्रों का कहना है कि पाँच-छ: दिनों के अंतराल में उसने कुल तीन वीडियो और पाँच-छ: बार ऑडियो बनाये गये।
उधर उच्च न्यायालय के फ़ैसले ने भी इस मामले में भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। उच्च न्यायालय ने सौम्या गुर्जर की याचिका ख़ारिज करते हुए साफ़ कह दिया कि सरकार की कार्रवाई मनमानी और द्वेषपूर्ण नहीं है। सौम्या गुर्जर ने एफआईआर रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने सौम्या गुर्जर को महापौर पद से निलंबन पर राहत देने से इन्कार कर दिया। साथ ही सरकार को छ: माह में न्यायिक जाँच पूरी करने को कहा है। भाजपा अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दस्तक देने की तैयारी में है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और इस पूरे मामले की कमान सँभाल रहे अरुण चतुर्वेदी ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के फ़ैसले पर कोई टिप्पणी नहीं बनती। अब पार्टी की क़ानूनी टीम की सलाह पर ही इस मामले में आगे बढ़ा जाएगा। इस मामले में बीवीजी कम्पनी बचाव के हर रास्ते पर दस्तक देती नज़र आ रही है। कम्पनी के वकील का कहना है कि सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कमीशन और रिश्वत के लेन-देन की बात नहीं हो रही, बल्कि कम्पनी के सीएसआर फंड की दो फ़ीसदी रक़म को राम मंदिर निर्माण समिति और प्रताप फंड में देने की बातचीत हो रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला केवल सियासी मक़सद के लिए दर्ज किया गया है तथा वीडियो में काँट-छाँट और तथ्यों से छेड़छाड़ भी की गयी है। सूत्रों का कहना है कि सफ़ाई व्यवस्था में कमीशनख़ोरी का क़िस्सा कोई नयी बात नहीं है। सफ़ाई की कमान चाहे ठेके पर हो या ख़ुद निगम के हाथों में, कमीशनख़ोरी के आरोप लगते रहे हैं।
जानकारों का मानना है कि यह सिलसिला बन्द हो, तभी जयपुर की प्रतिष्ठा (रैंकिंग) सुधर सकती है। सफ़ाई व्यवस्था के मामले में जयपुर हमेशा फिसड्डी रहा है। व्यवस्था ने अपना चोला नहीं बदला, तो कमीशनख़ोरी की मुहावरेदार भाषा बार-बार नये गुल खिलाती रहेगी। जयपुर की प्रतिष्ठा बनाने के लिए कोई लाख चाहे, तो भी ऐसे सूरमा की तलाश नहीं की जा सकती।
इस मामले में कांग्रेस और भाजपा के फायरब्रांड नेताओं की बयानबाज़ी ने तूल पकड़ा, तो आख़िरकार संघ को अपनी चुप्पी तोडऩी पड़ी। संघ के राजस्थान कार्यवाह हनुमान सिंह राठौड़ ने क्षेत्रीय प्रचारक निंबाराम पर लगाये गये सारे आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि निहित सियासी स्वार्थ से प्रेरित होते हुए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। हालाँकि उन्होंने कहा कि मामले की जाँच में निंबाराम हर तरह से सहयोग देने को तैयार हैं। क़ानून में सम्मत कार्रवाई करने के सभी विकल्प खुले हुए हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय और सन्दर्भ में की गयी बातचीत की वीडियो रिकॉर्डिंग करके उन्हें अन्यर्थों में पेश किया गया है, जबकि इस मामले में किसी प्रकार की राशि का आदान-प्रदान नहीं हुआ है। इसे भ्रष्टाचार से जोड़कर अनर्गल आरोप लगाना निंदनीय है। बीवीजी कम्पनी के प्रतिनिधि प्रताप गौरव केंद्र में सीएसआर फंड द्वारा सहयोग का प्रस्ताव लेकर निंबाराम के पास आये थे। निंबाराम के कहने पर कम्पनी प्रतिनिधियों ने दौरे की तिथि तय भी की; लेकिन वह वहाँ पर गये ही नहीं। ऐसे में जब लेन-देन की आग भड़की ही नहीं, तो सियासी धुआँ क्यों उठा? विश्लेषकों का कहना है कि फ़िलहाल तो जाँच के बाद ही पता चलेगा कि कौन सही है और कौन ग़लत।