ज़ोर का झटका, धीरे से

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अगर आप यह सोचते हों कि शायद हमारे देश में दक्षिण पंथी ताकतें मसलन आरएसएस और दूसरी ताकतें घुसपैठ कर रही हैं तो आप एक बड़ा झटका धीरे से खाने के लिए तैयार रहिए। आज का समय फासीवादी है। तकरीबन हर सुबह अखबारों में हिंसा प्रतिहिंसा की खबरें भरी रहती हैं। दिन व दिन हमलों को होना बहुत ही नाजुक और पेचीदा भी है। ऐसे में हिंदुत्व ब्रिगेड केवल जिंदगियों पर ही नहीं बल्कि लोगों की जीवनशैली तक पर काबू रखती है।

इस संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका से भी कोई बड़ी खबर नहीं आ रही है। अभी हाल कहीं से भी ऐसे संकेत मिले हैं कि वहां भी बड़े पैमाने पर बसे हुए भारतीय अब दक्षिणपंथी हो रहें हैं। अलबत्ता उनके अपने झुकाव और तरीके हैं।

अमेरिका में रह रहे एक विद्वान राजीव मल्होत्रा के ट्वीट्स को भूला नहीं जा सकता जो उन्होंने केरल में आई बाढ़ के दौरान हिंदुओं के लिए दान की अपील करते हुए किए थे। ईसाई और मुसलमान सारी दुनिया में ढेर सारा पैसा इक_ा कर रहे हैं जिससे अपने लोगों और अपने एजेंडा को पूरा कर सकें। इस तथ्य को नजऱअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अमेरिका में ही रह रहे शलभकुमार ने वहां ‘रिपब्लिक हिंदू कोएलिशन अमेरिका’ नाम की संस्था बना रखी है। छोटे बुद्धू बक्से पर जब भी वे आते हैं तो अपने नाम के साथ ‘इंडियन’ उप नाम जोडऩा नहीं भूलते।

दरअसल जो कुछ वे कहते हैं उससे यही भ्रम होता है कि हिंदुस्तान में सिर्फ हिंदू ही रहते हैं। वे इस तरह खास तौर पर केवल पश्चिम के लोगों को नहीं बल्कि इस उप महाद्वीप के लोगों को भी भ्रम में रखते हैं। वे यह तथ्य नहीं बताते कि सिख, पारसी, मुस्लिम, दलित और नास्तिक लोग भी इस हिंदुस्तान में रहते हैं। वे इस ओर ध्यान ही नहीं देते। आखिर वे नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीब जो हंै। वे अपने संपर्कों को दक्षिणपंथ के जरिए भुना रहे हैं।

भारतीय समुदाय में दक्षिणपंथी घुसपैठ की थाह पाना सहज नहीं है जब तक कि आप अजय रैना की डाक्यूमेंटरी फिल्म ‘डाइस्पोरा’ न देखें। यह फिल्म अमेरिका में ही बनाई गई है। पुरस्कारों से नवाजी गई इस फिल्म में ढेरों दृश्य हैं और फिर वे टिप्पणीकार भी हैं। रैना इस फिल्म के जरिए कई प्रासंगिक सवाल उठाते हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के लोगों के किस तरह के संबंध हैं भारतीयों, अश्वेतों और श्वेतों से और दूसरे लोगों से। वे दूसरे भारतीयों के साथ कुछ भारतीयों की प्रतिकृति भी बनाते हैं युगों पुरानी जातिवादी, आंचलिक और धार्मिक संबंधों और जातिवादी रूझानों की एक नई ज़मीन पर।

यह एक तरह से ‘ऑफबीट’ फिल्म हैं। जो दर्शक को ट्रंप के देश में आकार बसे कई-एक भारतीयों की मनस्थिति बताती है। कहीं यह फिल्मकार हिंदुत्व को उचित ठहराने लगता है। बल्कि कहें कि कहीं जोरदार तरीके से या बड़ी ही चतुराई से यह कहलाता है। मैंने यह फिल्म अभी हाल एक शाम देखी। मैं अंर्तमन से चकित होती रही कि आखिर किस ओर हम जा रहे हैं। किस तरह का यह अलगाववाद है जो हमारी सोच और सोचने की ताकत तक को प्रभावित कर रहा है।

हां, इस फिल्म को अलबत्ता एक ऐसी फिल्म बताया जाएगा जो बदल रहे राजनीतिक तौर-तरीकों और दीर्धकालिक प्रभावों के लिहाज से हमारी आंखे खोलती है। फिल्म का आखिरी हिस्सा हो सकता है आपकी नाराजगी बढ़ाए क्योंकि फिर बेहद अलग विचार दिखते हैं।

मैं रैना से पूछना चाहती थी कि आखिर अपने महत्वपूर्ण ‘क्यों’ की पृष्ठभूमि में ही उसे क्यों बढऩा था और यह वास्तविकता क्यों दिखानी थी- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2014 में स्क्वायर गार्डेऩ में ‘भारतीय -अमेरिकी समुदाय के बीच भाषण क्यों लपेटना था। ‘डाइस्पोरा’ एक ऐसा सजग अध्ययन है जो अमेरिका में बसे भारतीयों की पहचान करता है और उनकी राजनीति को पीछे जाकर हिंदुओं की बहुलतावाद और पहचान के आधार पर दक्षिणपंथी आंदोलन की घर वापिसी पर ज़ोर देता है।

यह राजनीति बहुतेरे भारतीय-अमेरिकी समुदायों को अमेरिका के कई हिस्सों में ‘छोटे-छोटे भारत’ बनाने के लिए प्रेरित करती है जहां से वे अपनी मातृभूमि से भी अपना संबंध बनाए रख सकते हैं। यह मानते हुए कि वे भी हिस्सेदार हैं पुरानी हिंदू सांस्कृतिक विरासत के और इनकी खासी मज़बूत हिस्सेदारी है राजनीतिक जि़ंदगी में भी।

दरअसल रैना महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि भी बताते हैं, दक्षिण एशियाई अमेरिकी लोगों ने अपने घरों में राजनीति में रूचि ली। साथ ही ढेरों मुद्दे उठाए। उनकी प्रकृति और मातृभूमि से उनके जुड़ाव की गुणवत्ता पर सवाल भी उठाए हैं।

अगर 1913 में क्रांतिकारी पार्टी गदर की स्थापना कैलिफोर्निया में हुई जो भारत में ब्रिटिश उपनिवेश के खिलाफ थी, तो आज विदेशों में बसे कुछ भारतीयों का राजनीतिक ?? अब अपनी भूमि में अखिल भारतीयता से हट कर ज़्यादा क्षेत्रीय संकीर्ण और अलगाववादी रुचियों में बदल गया है। यह इस बहुल भारत में सिखों के अलगाववादी खालिस्तानी आंदोलनों के समर्थन में दिखता है। हम इस ‘छोटे भारत’ को विदेश में बसे सिखों में देखते हैं फिर अमेरिकी ‘डाइस्पोरा’ में हिंदुओं को अपने धर्म, राजनीतिक संगठनों से कहीं ज़्यादा धार्मिक तौर पर समर्थन देना ‘मातृभूमि’ के नागरिकों की तुलना में ज़्यादा ज़रूरी जान पड़ता है। यह स्थिति कैसे बनी? भारत से विदेश में आ कर बसे लोगों की यह ‘डाइस्पोरिक’ उप संस्कृति इसलिए शायद विकसित हुई क्योंकि अमेरिका में वे जातिवादी भेदभाव के शिकार होते हैं या वे ज़रूरी मानते हैं कि अमेरिका में उन्हें कुछ ज़्यादा आदर-सम्मान हासिल हो।

यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है राजनीतिक तौर पर उस अंधेरे समय की जिसमें हम रह रहे हैं। अजय रैना ने इस बात को बड़े ही संवेदनशील तरीके से उस बात को गहराई से भांप लिया और हमें वह सब बताने की कोशिश की। रैना की इस फिल्म को देखने के पहले मैंने उनके लंबे और कुछ छोटे लेख भी ऐसे ही एक महत्वपूर्ण विषय-कश्मीर के हालात पर पढ़े। मैं उन्हें उनके विचारों को कश्मीरी संकट के बरक्स न केवल ईमानदार और साफ प्रयास मानती हंू। रैना एफटीआईआई पुणे के छात्र रहे हैं। उन्हें मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (2002) का पुरस्कार उनकी फिल्म -‘टेल देम, द ट्री दे हैड प्लांटेड हैज नॉउ ग्रोन’ (उन्हें बता दो, जो पौध उन्होंने लगाई थी वह अब बड़ी हो गई है।) काफी भावनात्मक और मार्मिक है। कई साल बाद कश्मीर घाटी की उनकी अपनी यात्रा पर यह फिल्म भी है। हालांकि वे कश्मीर में नहीं रहते लेकिन उससे उनका जुड़ाव रहा है। वे आखिर संस्थापक भी है

वे चलते-फिरते फिल्म फेस्टिवल कश्मीर बिफोर अवर आइज’ के ऑर्गेनाइजर भी है।