जलवायु बदलाव पर गंभीर नहीं विकसित देश

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आंकड़ें भयावह हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में पिछले साल सामान्य से पांच गुणा ज़्यादा वायु प्रदूषण रिकार्ड किया गया। दिल्ली में पीएम 2.5 की मात्रा 209 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रिकार्ड की गई। यही नहीं अगर औसत वैश्विक तापमान में वृद्वि को 21वीं सदी के अंत से पहले ही दो डिग्री सेल्सियस से कम रखने में विफल रहे तो दिल्ली की तबीयत क्या होगी, इसका आकलन भी कर लिया गया है।

दिल्ली का तापमान 2030 तक 2.1, 2060 तक 3.0, 2080 तक 5.0 और 2100 तक 6.1 डिग्री बढ़ जाएगा। दिल्ली के साथ-साथ बाकी दुनिया भी तपेगी। इसी चिंता से निपटने के लिए पोलैंड के काटोवाइस में सीओपी 24 यानी कांफ्रेंस ऑफ पार्टी की 24वीं बैठक का सम्मेलन चला। संयुक्त राष्ट्र जलवायु कांफ्रेंस में 197 देशों ने की। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक बयान में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की अनदेखी करना मुश्किल हो रहा है। दुनिया जंगल की आग,लू और तूफानों के कारण आग से घिरी है। गौरतलब है कि 2015 में पेरिस में हुए शिखर सम्मेलन में वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर सहमति बनी थी। लेकिन हालात क्या हैं?

आईपीसीसी की हाल में जारी रिपोर्ट में तापमान बढ़तरी को 1.5 डिग्री तक सीमित रखने की बात कही गई है। सवाल यहां यह भी अहम है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर विकसित देश पेरिस में की गई अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रति कितने गंभीर हैं। दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कहे जाने वाले अमेरिका में 2017 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी और अमेरिका ने ऐलान किया कि अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में इस जलवायु करार से अलग हो रहा है। सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाला अमेरिका ही है। काटोवाइस बैठक का एंजेडा बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। इसमें पैरिस समझौते के अम्लीकरण के लिए यानी लक्ष्य को हासिल करने के लिए रूलबुक अर्थात नियमावली बनी है। उस रूलबुक में लिखा है कि तापमानवर्धक गैसें कौन सी हैं, उन्हें कैसे मापा जाना चाहिए और मापने की एक समान इकाई क्या होगी। अभी दुनिया के सभी देश एक ही मापन प्रणाली और एक ही इकाई का इस्तेमाल नहीं करते।

यही नहीं इस रूलबुक में ऐसे भी नियम कायदे हैं कि जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय सहयोगों का स्वरूप कैसा होना चाहिए। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को पारदर्शी व जिम्मेदारियों को न्यायसंगत कैसे बनाया जा सकता है। दरअसल रूल बुक एक प्रक्रिया है। 2015 में पेरिस जलवायु समझौते में समझौता हुआ था कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने के लिए हर मुल्क अपने उत्सर्जन को कम करेगा।

रूलबुक बावत केंद्रीय वन,पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव और काटोवाइस सम्मेलन में भारतीय दल का प्रतिनिधित्व कर रहे सीके मिश्रा ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में बताया कि रूल बुक बने पर एक दो विषय पर नहीं,सभी विषयों पर,ताकि इस चुनौती से निपटने की राह खुले। सचिव मिश्रा ने इस पर भी रोशनी डाली कि विकसित व विकासशील मुल्कों को एक ही पैरामीटर में न रखा जाए। विकसित मुल्क चाहते हंै कि सभी देशों के लिए नियम कायदे एक जैसे हों। भारत इसके खिलाफ है। भारत चाहता है कि विकसित मुल्क अपनी जिम्मेदारी निभाएं और हरित कोष में सौ अरब डालर की राशि देने का अपना वादा पूरा करें। ध्यान देने वाली बात यह है कि पेरिस समझौते में विकसित मुल्कों ने 2020 तक हरित कोष में 100 अरब डालर की राशि देने का ऐलान किया था मगर उसे पूरा करते नजर नहीं आते।

सौ अरब डालर का वादा भी वर्ष 2025 तक ही है। एक तरफ इस बात को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है कि बहुत से विकासशील मुल्क अपने अपने यहां गरीबी के खात्मे के साथ- साथ ही र्काबन-डाईआक्साइड जैसी गैसों के उत्सर्जन को कम में करने की दोहरी लड़ाई लडऩे में समर्थ नहीं हैं।

ऐसे में पेरिस में तय किए गए जलवायु परिवर्तन का लक्ष्य हासिल करने के लिए आर्थिक संसाधन बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इस संदर्भ में भारत व चीन अपवाद हो सकते हैं मगर शेष विकासशील और गरीब मुल्कों को इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वित्तीय मदद की दरकार होगी। विकसित देश क्या अपेक्षा के अनुरूप आर्थिक सहयोग करेंगे, इस पर संदेह है।

भारत चाहता है कि विकसित मुल्क जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करें। खासकर गरीब और विकासशील मुल्कों को आर्थिक मदद देने के लिए आगे आएं। इधर जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की इस कंवेशन समिट में विश्व बैंक ने कहा कि वह जलवायु परिवर्तन से लडऩे के लिए 14 लाख करोड़ रुपए देगा। यह राशि अब तक दिए जा रहे पैकेज से दोगुणा है। यह रकम 2021-25 तक खर्च की जाएगी। इसमें से सात लाख करोड़ रुपए बैंक देगा और शेष रकम बैंक की दो एजेंसियों से जुटाई जाएगी। विश्व बैंक के जलवायु परिवर्तन पर वरिष्ठ निदेशक जॉन रूम ने कहा हम उत्सर्जन कम करने में नाकाम रहते हैं तो 2030 तक 10 करोड़ लोग गरीबी में पहुंच जाएगें।

लांसेट की हालिया रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में पिछले चार सालों के दौरान प्रभावित होने वालों की संख्या में 200 फीसद से भी अधिक की बढ़ोतरी हुई है। गर्मी बढऩे और तबाही की अन्य घटनाओं के कारण यह असर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के खतरों से होने वाली मौतें देश में उच्च आय वाले देशों की तुलना में सात गुणा अधिक हैं। जबकि घायल होने और विस्थापित होने वाले लोगों की संख्या छह गुणा अधिक है। इस रिपोर्ट का विश्लेषण करने वाली दिल्ली की संस्था क्लाईमेट ट्रेंड के अनुसार 2017 में बाढ़ और सूखे के कारण 18 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक का नुकसान हुआ जबकि 2018 में अकेले केरल में बाढ ़से 20 हजार करोड़ रुपये की क्षति होने का अनुमान है।