जलवायु परिवर्तन, नौनिहाल तक बेहाल

रियलिटी चेक : बच्चों की सेहत को कैसे प्रभावित कर रहा है बदलाव, यह गम्भीरता से सोचने का समय है कि जलवायु परिवर्तन हमारे बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं डाल रहा। यदि हम अब भी नहीं चेते, तो विनाशकारी जलवायु परिवर्तन का हमारे बच्चों के स्वास्थ्य विपरीत असर पर पड़ेगा। कैसे? बता रहे हैं चरणजीत आहूजा

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दुनिया के सबसे पुराने और  प्रतिष्ठित मेडिकल जरनल में शामिल लैंसेट की जलवायु परिवर्तन पर नवंबर में जारी रिपोर्ट में भारत को गंभीर खतरे के रूप में रखा गया है। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, खराब स्वास्थ्य सेवा और कुपोषण का सामना कर रहे भारत के लिए यह खतरा अधिक चुनौतीपूर्ण है। 2019 की रिपोर्ट में पाँच प्रमुख डोमेन में 41 संकेतकों का वार्षिक अपडेट पेश प्रस्तुत किया गया है- जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जोखिम और भेद्यता, अनुकूलन, योजना और स्वास्थ्य पर असर। लोगों की सेहत पर असर डालने का सीधा मतलब है कि उसका आपकी जेब पर असर। इससे अर्थशास्त्र और राजनीति दोनों का सीधे जुड़ाव है। यह रिपोर्ट हर महाद्वीप से 35 प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों के निष्कर्षों पर आधारित है।

रिपोर्ट के आधार पर आपको दो विकल्पों में से किसको चुनना ज़रूरी है। इसमें या तो आप व्यवसाय को प्राथमिकता के तौर पर लेंगे या फिर लोगों के भविष्य को देखते हुए फैसले लेंगे। रिपोर्ट में कहा गया है- ‘जिन क्षेत्रों में तापमान 2 डिग्री सेल्सियस का परिवर्तन होता है, तो इससे होने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को पहचानने में मदद करती है; साथ ही इससे कैसे निपटा जाए? इसका उपाय भी बताती है।’ आज दुनिया में सामान्य स्तर से एक सेल्सियस तापमान बढ़ गया है। पिछले एक दशक के आठ साल सबसे ज़्यादा गर्म रिकॉर्ड किये गये हैं। इस तरह तेज़ी से हो रहे बदलाव के पीछे मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन का अन्धाधुंध दहन बताया गया है। कोयला, गैस और डीज़ल-पेट्रोल की खपत में बेतहाशा वृद्धि होती जा रही है।

नवजातों पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन के चलते आने वाले समय में आज जन्म लेने वाला बच्चा एक ऐसी दुनिया से रू-ब-रू होगा जहाँ का तापमान औसतन 4 डिग्री सेल्सियस अधिक होगा। इससे उसके स्वास्थ्य और किशोरावस्था से वयस्कता और बुढ़ापे तक प्रभावित होंगे। दुनिया-भर में बच्चे जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हैं। 1960 के बाद से किये गये अध्ययनों से सामने आया है कि सभी प्रमुख फसलों के लिए वैश्विक उपज क्षमता में गिरावट का रुझान खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा है। अक्सर पौष्टिक भोजन नहीं मिला, तो इसका सबसे •यादा असर बच्चों पर ही होता है।

बच्चे डायरिया रोग से बेहद प्रभावित होते हैं और डेंगू बुखार के सबसे गम्भीर प्रभावों को झेलते हैं। बच्चों में बीमारियों के मामले में इन परिवर्तनों का होने वाला असर चिन्ता पैदा करने वाला है।  साल 2000 के बाद डेंगू बुखार के मामले 10 में से 9 मामले बच्चों के ही सामने आये। इसी तरह 1980 के दशक के शुरुआती आधार के बाद विब्रियो (डायरिया के लिए •िाम्मेदार विषाणु) की संख्या दोगुनी हो गयी है और तटीय विब्रियो कालरा में 9.9 फीसद की वृद्धि हुई है।

किशोरावस्था और उससे आगे के वर्षों के दौरान वायु प्रदूषण मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन से होने वाला प्रदूषण कहीं •यादा घातक साबित होता है। जलवायु परिवर्तन के चलते युवाओं में हृदय, फेफड़े और हर दूसरे महत्त्वपूर्ण अंग को नुकसान पहुँचता है। इसका प्रभाव उम्र बढऩे के साथ ही बढ़ता जाता है। आगे चलकर बढ़ती आयु के साथ बीमारियाँ गम्भीर रूप धारण कर लेती हैं। प्रदूषण की वजह से संसार में 70 लाख मौतें हर साल हो जाती हैं। सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखें तो इससे सबसे •यादा खतरे में महिलाएँ रहती हैं।

कैसे प्रभावित है भारत?

2001-14 और 2015-18 तक वन्यजीवों पर जलवायु परिवर्तन का असर वैश्विक स्तर पर 77 प्रतिशत देशों पर देखा गया है। इस अवधि में भारत में 2 करोड़ से •यादा और चीन में 1.7 करोड़ में इसका और असर देखने को मिला। विकासशील देशों में मौसम में हो रहे बदलावों की घटनाओं से आर्थिक नुकसान तो होता ही है, साथ ही लोगों के परिवारों पर भी बोझ बढ़ जाता है। तापमान में बढ़ोतरी और लू की चपेट में आने से बड़ी आबादी साल दर प्रभावित होने लगती है। इससे उनके काम करने की क्षमता पर भी असर होता है। इन बदलाव के चलते 2018 में वैश्विक स्तर पर 133.6 अरब घंटे लोग काम नहीं कर सके।  2000 बेस-लाइन से 45 अरब अधिक और संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी क्षेत्रों में सबसे गर्म महीने के दौरान सम्भावित दैनिक कार्य पर 15-20 फीसदी का नुकसान हुआ। 1990 से 2018 के बीच हर क्षेत्र में गर्मी और लू से बड़ी आबादी चपेट में आयी है। 2018 में इस आबादी ने वैश्विक स्तर पर 22 करोड़ लोगों ने गर्म हवाओं का सामना किया और 2015 के

20 करोड़ लोगों के सामना करने का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

पेरिस समझौते ने ‘पूर्व-औद्योगिक स्तरों के ऊपर वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे रखने और तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक सीमित करने के प्रयासों का लक्ष्य निर्धारित किया। आज पैदा हुआ एक बच्चा अपने छठे और 11वें जन्मदिन तक यूके और कनाडा में कोयले का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद होते देखना चाहेगा। आज की स्थिति के हिसाब से देखें, तो वे अपने 21वें जन्मदिन तक संभवत: देखेंगे कि फ्रांस ने पेट्रोल और डीज़ल कारों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इसी तरह 2050 में दुनिया के नेट-ज़ीरो तक पहुँचने के समय तक वे 31 साल के हो जाएँगे। ब्रिटेन में भी कुछ इसी तरह के कदम उठाये जाने की बात कही गयी है।

बच्चों के लिए विकल्प

स्वच्छ हवा, सुरक्षित शहर और अधिक पौष्टिक भोजन मिलने को परिवर्तन के चलते बच्चों के लिए क्या विकल्प हो सकते हैं।?  इसका सीधा सम्बन्ध स्वास्थ्य प्रणालियों और महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में नये निवेश से जुड़ा हुआ है। अन्य विकल्प यह है कि वैश्विक स्तर पर औसत तापमान वृद्धि को ‘2 डिग्री सेल्सियस से नीचे’ तक सीमित रखे जाने के लिए कदम उठाये जाएँ। अगर ऐसा करना सम्भव हुआ, तो बच्चों के लिए यह बेहतर होगा।

2015 और 2016 के बीच इलेक्ट्रिक वाहनों के वैश्विक प्रति व्यक्ति उपयोग में 20 फीसदी की वृद्धि हुई और अब चीन कुल परिवहन ईंधन के उपयोग का 1.8 फीसदी का प्रतिनिधित्त्व करता है। आने वाले समय में इनकी माँग में कहीं •यादा वृद्धि देखने को मिल सकती है। पर्यावरण के प्रति जागरूक होने के साथ ही भारत में भी धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन बढऩे लगा है।

स्वास्थ्य के प्रति सतर्कता न बरतने के चलते या देखभाल में कम खर्च करने की वजह से उनके कार्यबल में असर दिखता है। अगर इन परिवर्तन के प्रति कदम नहीं उठाये, तो सेहत के साथ ही कार्यबल पर भी असर दिखेगा। इससे आपकी जेब तो प्रभावित होगी ही, साथ ही काम करने के घंटों पर असर देखने को मिलेगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से शहर और स्वास्थ्य प्रणालियों को भी तैयार रहना होगा।

लगभग 50 फीसदी देशों और 69 फीसदी शहरों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुकूलन योजनाओं या जलवायु परिवर्तन जोखिम आकलन के संचालन के प्रयासों को लेकर रिपोर्ट तैयार की हैं। इस बाबत योजनाएँ तैयार करके उनको लागू किया जा रहा है। इसमें 2018 में स्वास्थ्य क्षेत्र में जलवायु सेवाएँ प्रदान करने वाले देशों की संख्या 2019 में 55 से बढ़कर 70 हो गयी; जबकि 109 देशों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकालीन ढाँचे के लिए ज़रूरी कदम उठाने में कई कोशिशें की हैं।

साहसिक पहल

जलवायु परिवर्तन के प्रति बदलावों के लिए ज़रूरी है कि इसके लिए नीति तैयार की जाए, शोध और कारोबार के प्रति इसका ध्यान रखा जाए। साथ ही नये दृष्टिकोण को अपने जाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। किसी भी अनूठी चुनौती को हासिल करने के लिए अभूतपूर्व कदम उठाने पड़ते हैं। वर्तमान में अगर ऐसा किसी भी तरह का बदलाव लागू किया जाता है, तो यह सीधे 7.5 अरब लोगों पर होगा। इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि आज पैदा हुए बच्चे का स्वास्थ्य बदलते पर्यावरण के हिसाब से हैं या नहीं?

दुनिया-भर में एक पूर्व-औद्योगिक बेस-लाइन से 1 डिग्री सेंटीग्रेड की औसत तापमान वृद्धि के चलते पहले से ही इसका असर गर्मी के तौर पर सामने आ गया है।  पर्यावरणीय परिवर्तनों के परिणाम के तौर पर भयंकर तूफान और बाढ़, लम्बे समय तक लू और सूखा, नये और उभरते संक्रामक रोग खाद्य सुरक्षा के लिए बड़े खतरे के रूप में सामने आ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन वर्तमान और भावी पीढिय़ों के स्वास्थ्य प्रोफाइल को परिभाषित करेगा साथ ही पहले से ही व्याप्त स्वास्थ्य प्रणालियों को नयी चुनौती पेश करेगा। संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों (एसडीजी) और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) की दिशा में प्रगति को कम करेगा। जंगलों में लगी भीषण आग के धुएँ के चपेट में आने से लोगों को साँस सम्बन्धी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। इसके अलावा, जो लोग सीधे सम्पर्क में आते हैं, तो वे अपनी जान तक गँवा देते हैं। इसके अतिरिक्त जंगलों की आग से प्रभावित प्रति व्यक्ति वैश्विक आर्थिक बोझ भूकम्पों की तुलना में दोगुना •यादा झेलता है।  बाढ़ की तुलना में 48 गुना अधिक नुकसान होता है। हालाँकि वैश्विक घटनाओं और बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या जंगलों में लगने वाली आग की तुलना में बहुत अधिक है।

संक्रामक रोगों की शुरुआत

जलवायु परिवर्तन कई संक्रामक रोगों को जन्म देता है। 2019 लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट डेंगू वायरस, मलेरिया, और विब्रियो के संचरण के लिए पर्यावरणीय उपयुक्तता का एक अद्यतन विश्लेषण प्रदान करती है, जिसमें सबसे हाल ही में उपलब्ध आँकड़े हैं और तटीय क्षेत्रों में वी. कोलेरा पर्यावरण उपयुक्तता का एक अतिरिक्त विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

ऊर्जा प्रणाली की कार्बन तीव्रता को शून्य से 2050 तक कम करने की आवश्यकता होगी। पिछले 15 वर्षों में कार्बन की तीव्रता काफी हद तक कम हो गयी है; क्योंकि जीवाश्म ईंधन को विस्थापित करने के लिए कार्बन ऊर्जा को कम करने के लिए जो कदम उठाये, वे पर्याप्त नहीं हैं। न केवल जलवायु परिवर्तन को कम करने के लिए, बल्कि वायु प्रदूषण से होने वाली तमाम समस्याओं व मौतों के लिए ज़रूरी है कि कोयले का उपयोग खत्म कर दिया जाए। दिसंबर, 2018 तक 30 देशों की सरकारों और कारोबार से जुड़े उद्योगपतियों के साथ मिलकर ऐसे बिजली उत्पादन की व्यवस्था करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने की बात कही गयी है, जिसमें कोयले का प्रयोग न हो। इसके लिए कोयले को चरणवद्ध तरीके से खत्म करने की प्रतिबद्धता जतायी गयी। पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए तेज़ी से घटता कोयला उपयोग शून्य तक ले जाने का लक्ष्य है। उदाहरण के लिए 2017 से 2050 तक कोयले के उपयोग में 80 फीसदी की कमी (5.6 फीसदी की सालाना कमी दर) करके बढ़ते तापमान को रोकने के अनुरूप नहीं माना गया है।

कुल ऊर्जा-सम्बन्धित उत्सर्जन के 38 फीसदी के लिए बिजली उत्पादन क्षेत्र के लेखांकन के साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के साथ जीवाश्म ईंधन के विस्थापन अहम है। वैश्विक रूप से प्रति वर्ष 38 लाख मौतें घरेलू वायु प्रदूषण के कारण होती हैं, जो मोटे तौर पर खाना पकाने के लिए कोयला, लकड़ी, लकड़ी का कोयला और बायोमास जैसे ठोस ईंधन के उपयोग की वजह से होती हैं। ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन और अल्पकालिक जलवायु प्रदूषकों को कम करने के अलावा स्वच्छ खाना पकाने और हीटिंग तकनीक प्रदान करने के तरीके अपनाकर स्वास्थ्य सम्बन्धी पर्याप्त लाभ ले सकते हैं। परिवेशी वायु प्रदूषण के सम्पर्क में आने से समय से पहले मृत्यु दर की बड़ी वजह के चलते पर्यावरणीय जोखिम का गठन करता है। हर साल हृदय और श्वसन सम्बन्धी बीमारियों से समय से पहले लाखों लोग मौत की गिरफ्त में आ जाते हैं।

बच्चों पर प्रभाव

90 फीसदी से अधिक बच्चे पीएम सांद्रता के सम्पर्क में हैं जो डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों से ऊपर हैं और जो उनके जीवन-भर के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। फेफड़ों के नुकसान का एक बढ़ा जोखिम, फेफड़े के विकास और निमोनिया और बाद में अस्थमा और क्रोनिक जैसी बीमारी होने का खतरा है। पीएम के सम्पर्क में आने से •यादातर मानवजनित गतिविधियों का परिणाम है और इसका अधिकांश हिस्सा बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, परिवहन और घरेलू ताप और खाना पकाने के लिए कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधन के दहन से जुड़ा है। इसलिए, पीएम उत्सर्जन ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन के समान स्रोतों को साझा करता है।

मलेरिया और डेंगू बुखार दुनिया के कई हिस्सों में स्थानिक हैं और जैसा कि पिछले संकेतक में बताया गया है, बच्चों को ये बीमारियाँ •यादा गिरफ्त में लेती हैं। मच्छर जनित संक्रामक रोगों के संचरण के लिए उपयुक्तता तापमान, आद्र्र्रता और वर्षा सहित कारकों से प्रभावित होती है। डेंगू के लिए सदिश क्षमता, जो एक संक्रमित मामले से उत्पन्न होने वाली अति-संवेदनशील आबादी में बाद के मामलों की औसत दैनिक दर को व्यक्त करता है; की गणना एक सूत्र का उपयोग करके की जाती है, जिसमें सदिश से लेकर मानव काटने की सम्भावना, मानव संक्रामक अवधि, औसत वेक्टर काटने की दर, बाह्य ऊष्मायन अवधि और दैनिक उत्तरजीविता अवधि शामिल हैं। दोनों डेंगू विषाणुओं के लिए दूसरी उच्चतम वेक्टरियल क्षमता 2017 में दर्ज की गयी थी, जिसमें एडीज एजिप्टी और एडीस अल्बोपिकस के लिए 2012-17 की औसत 7.2 फीसदी और 9.8 फीसदी आधाररेखा से •यादा थी। यह परिवर्तन जलवायु उपयुक्तता के निरन्तर चढ़ाव पर ज़ोर देता है। मलेरिया के लिए प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम और पी. विवैक्स मलेरिया परजीवी के संचरण के लिए उपयुक्त महीनों की संख्या की गणना तापमान, वर्षा और आद्र्रता के आधार पर तय की जाती है। इसके अलावा, बढ़ते तापमान और पहले के हिमपात सहित जलवायु परिवर्तन, गर्म, आद्र्रता की स्थिति वजह बनती है कि जससे वन्यजीवों का खतरा बढ़ जाता है। फिर भी जंगलों में लगी आग कई पारिस्थितिक तन्त्रों का एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ

2019 लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट में कई अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं की पहचान की गयी है, जो गहरी चिन्ता के संकेत हैं। ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन में वृद्धि जारी है। पर्यावरण में बदलाव के चलते मानव स्वास्थ्य पर तत्काल और सीधा असर होता है। बदलाव के चलते लगातार तापमान बढऩा और लम्बे समय तक गर्मी का सामना करने के तौर पर देखा जा रहा है। स्वास्थ्य सम्बन्धी खतरों में हीट स्ट्रेस और हीट स्ट्रोक, किडनी की समस्या, कंजस्टिव हार्ट फेल्योर की वजह बनता है। इसके अलावा लोगों के व्यवहार में भी बदलाव आता है, जिसकी वजह से हिंसा का खतरा बढ़ जाता है। अत्यधिक गर्मी की अवधि के दौरान छोटे बच्चों में इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, बुखार, श्वसन रोग और गुर्दे की बीमारी का खतरा कहीं •यादा रहता है। विश्व स्तर पर मक्का सर्दियों के गेहूँ और सोयाबीन के लिए फसल की उपज पर असर दिखने वाला है। 2030 तक भूख को समाप्त करने के लिए मशक्कत करने की नौबत आ सकती है। चुनौतीपूर्ण प्रयासों के साथ तापमान में वृद्धि को कम करने के उपाय करने ही होंगे। आँकड़ों से पता चलता है कि इन प्रमुख फसलों की वैश्विक पैदावार प्रत्येक 1 डिग्री सेंटीग्रेड की बढ़ोतरी के साथ लगातार तेज़ी से घटती जाती है।

कैसे बचें?

नवीकरणीय ऊर्जा का निरंतर विस्तार, स्वास्थ्य प्रणाली अनुकूलन में निवेश बढऩा, सार्वजनिक परिवहन में सुधार से अच्छे संकेत देखने को मिल सकते हैं। ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन 2020 में पेरिस समझौते के तहत प्रतिबद्धताओं की समीक्षा करने की तैयारी की जा रही है, दुनिया की प्रतिबद्धता यह होनी चाहिए कि कैसे 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे तापमान हासिल करने के लिए क्या जरूर कदम उठाएं और इस पर तत्काल कार्रवाई की भी आवश्यकता है।

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) 2018 की ग्लोबल वार्मिंग पर विशेष रिपोर्ट 1.5 डिग्री सेल्सियस पर जरूरी कदम उठाने के लिए बड़े पैमाने पर कदम उठाने पर जोर देती है। वैश्विक वार्षिक उत्सर्जन 2030 तक आधा होना चाहिए और ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के लिए 2050 तक इसे शून्य ले जाना होगा। अगर ऐसा हुआ तो 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढऩे वाले तापमान को रोका जा सकेगा।

साफ हवा के लिए परिवहन और बिजली उत्पादन प्रणालियों का आधुनिक होना जरूरी है। पेरिस समझौते के अनुसार, गैसीय उत्सर्जन को कम करने के प्रयास उचित नहीं है, जिससे खतरा कहीं ज्य़ादा गंभीर है। क्योंकि इसकी अनदेखी का मतलब है कि तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस बढऩे से रोकने में लक्ष्य हासिल नहीं कर सकेंगे। अगर ऐसा संभव नहीं हुआ तो इसके परिणाम के रूप में भयंकर बाढ़, जंगल की आग, लू और ग्लेशियरों का पिघलने जैसी स्थितियां सामने आएंगी। यह एक घातक और खतरनाक संकेत हैं। क्या हम अपने बच्चों को लापरवाह कार्यों के बाद के प्रदूषण के बोझ से दबने दे सकते हैं? बच्चों में घातक डेंगू, डायरिया और अन्य बढ़ते संक्रामक रोग गंभीर चेतावनी है। हमें अपने बच्चों को जीने लायक स्वस्थ वातावरण देना है।  इसके लिए ज़रूरी कदम उठाने होंगे। हम किसी भी सूरत में उन अशुभ संकेतों को अनदेखा नहीं कर सकते, जो जीवन को बदसूरत बनाते हैं।