चोट देते भुखमरी के आंकड़े

आज जबकि देश के शासक पांच मिलियन इकॉनमी का ढोल पीट रहे हैं जीएचआई के भारत की भुखमरी पर नवीनतम आंकड़े चिंता पैदा करते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि एक तरफ तो ‘हाउडी मोदी’ जैसे प्रायोजित कार्यक्रमों से भारतीयों को सपनों की ऊंची उड़ान दी जा रही है, दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत बहुत चिंता पैदा करने वाली है। जीएचआई 2019 में भारत को भुखमरी के मामले में 117 देशों में 102 के बहुत खराब स्थान पर रखा गया है लेकिन शासक किसी और ही दुनिया में मस्त हैं। भारत में भुखमरी पर बता रहे हैं विशेष संवादाता राकेश रॉकी।

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यह 48 साल पहले की बात है। इंदिरा गांधी ने चुनाव में एक नारा दिया- गरीबी हटाओ। इस नारे के पांच दशक होने को हैं और हम आज भी गरीबी और भुखमरी के आंकड़ों में दुनिया के सामने शर्मसारी झेल रहे हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2019 के आंकड़े जाहिर करते हैं कि आज जब हम पांच मिलियन इकॉनमी का ढोल पीट रहे हैं तो भुखमरी के मामले में हम दुनिया के 117 देशों में 102वें नंबर पर हैं।

यह इस देश की त्रासदी ही है कि यहां सबसे ज्वलंत मुद्दों पर न चुनाव लड़े जाते हैं, न यह किसी बड़ी डिबेट का हिस्सा ही बन पाते हैं। अमेरिका में लाखों-लाख रुपए खर्च करके ‘हाउडी मोदी’ जैसे दिखावे वाले प्रायोजित कार्यक्रम तो हमारे टीवी चैनलों के मुख्य कार्यक्रम बन जाते हैं, लेकिन देश की भुखमरी पर वे खामोशी धारण किये रहते हैं। यदि देखें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में मुख्या ‘पोआरटी’ भाजपा की तरफ से ‘उग्र राष्ट्रवाद’ मुद्दा बनाया गया। यह चिंता की बात है कि इस ‘राष्ट्रवाद’ में भुखमरी, अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी जैसे देश के सबसे मुख्य मसलों को कोर्ई जगह नहीं। यह कैसा राष्ट्रवाद है, जिसमें वास्तविक राष्ट्रवाद के मसलों को ही जगह नहीं तो सा$फ है कि यह राष्ट्रवाद तो चुनाव और वोट का ही राष्ट्रवाद है।

सत्ता में आकर नेता देश की आबादी की चिंता नहीं कर रहे हैं। यह इस बात से जाहिर हो जाता है कि भारत में छह से 23 महीने की उम्र वाले सिर्फ 9.6 फीसदी बच्चों को ही न्यूनतम डाइट मिल पा रही है। कहाँ ‘हाउडी’ जैसे कार्यक्रमों की चकाचौंध और कहां भुखमरी में तथ्प कर जान देते देश के जन।

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ‘गुजरात मॉडल’ के साथ सत्ता में आये तो लगा था कि एक सूबे में चार बार मुख्यमंत्री रहा और ज़मीनी हकीकत को समझने वाला व्यक्ति देश के वास्तविक मुद्दों की राजनीति करेगा लेकिन सच्चाई इसके बिलकुल उलट हुई। कॉरपोरेट अंदाज में सरकार चलने से देश के ज्वलंत मुद्दे और गंभीर हो गए हैं और उन पर वर्तमान शासन का कोर्ई ध्यान नहीं है। हालत यह है कि जिस पाकिस्तान को सत्ताधारी दल के लोग भिखमंगा कह-कहकर चिढ़ाते रहते हैं, वहां भुखमरी का ग्राफ भारत से बेहतर है। हम 117 देशों में 102वें स्थान पर हैं और पाकिस्तान 94वें स्थान पर। यहाँ तक कि बांग्लादेश और नेपाल जैसे देश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। मोदी राज में तो भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में और नीचे लुडक़ गया है। भारत न केवल दक्षिण एशियाई देशों में सबसे खराब रैंकिंग पर पहुंच गया है, भयंकर आर्थिक स्थिति का सामना कर रहे पड़ौसी पकिस्तान से भी बुरी जीएचआई हालत में है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्कोर 30.3 पाया गया है जो ‘सीरियस हंगर कैटेगरी’ में माना जाता है।

जीएचआई के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 2015 में जो भारत ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 93वें नंबर पर था, आज दुनिया के कुल 117 देशों में 102 स्थान पर पहुंच गया है। मोदी सरकार भले पांच ट्रिलियन इकॉनमी तक देश को पहुंचाने का ढोल पीट रही हो, जीएचआई की नई रिपोर्ट चिंता पैदा करने वाली है। रिपोर्ट जाहिर करती है कि ‘ब्रिक्स’ देशों में भारत भुखमरी के मामले में सबसे बुरी हालत में है। पिछले साल भारत जीएचआई रैंकिंग में 97वें नंबर पर था। यह आंकड़े संकेत कर रहे हैं कि देश में वर्तमान शासन असली मुद्दों की तरफ बिलकुल ध्यान नहीं दे रहा। भारत के सबसे बुरी खबर यह भी है कि जीएचआई ने अपनी रिपोर्ट में दक्षिण एशिया की खराब रैंकिंग का जिम्मेवार भारत को माना है। उसका कहना है कि भारत के खराब प्रदर्शन से दक्षिण एशिया की रैंकिंग गिरी है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 2014 से 2018 का डाटा है जिसे किसी देश में कुपोषित बच्चों के अनुपात, पांच साल से कम उम्र वाले बच्चे जिनका वजन या लंबाई उम्र के हिसाब से कम है और पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों में मृत्यु दर जैसे तीन इंडीकेटर्स के आधार पर तैयार किया जाता है। जीएचआई में देशों को 100 प्वॉइंट्स पर रैंक किया जाता है। दस से कम प्वॉइंट्स ठीक हालात की तरफ इशारा करते हैं, 20 से 34.9 को सीरियस हंगर कहा जाता है, 35 से 49.9 प्वॉइंट्स अलार्मिंग और 50 से ज्यादा प्वॉइंट्स बेहद अलार्मिंग कैटेगरी में माने जाते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि भारत के बच्चों में कमज़ोरी की दर बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। चिंताजनक यह है कि यह सभी देशों से ऊपर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, भारत में 2010 के बाद से लगातार बच्चों में कमज़ोरी (वेस्टिंग) बढ़ रही है। साल 2010 में पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों में कमजोरी की दर 16.5 फीसदी थी जो साल 2019 में बढ़ कर बेहद चिंताजनक 20.8 फीसदी हो गई है। भारत को बच्चों का कम वजन के साथ कद में भी कमी आने को वेस्टिंग की श्रेणी में रखा गया है। यूनिसेफ की रिसर्च कहती है कि ऐसे बच्चों की मृत्यु होने की आशंका अधिक होती है। बच्चों के कमजोर होने का मुख्य कारण भोजन की कमी और बीमारियां है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों में वेस्टिंग रेट 10 प्रतिशत से अधिक है, वे बेहद गंभीर स्थिति है। इन देशों को इस पर तत्काल और गंभीर ध्यान देने की ज़रूरत पर जोर दिया गया है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स के अनुसार, छह से 23 माह के 90.4 फीसदी बच्चों को जितने खाने की ज़रूरत है, उतना भारत में मिल ही नहीं पा रहा है।

जीएचआई का कहना है कि भारत की बड़ी आबादी के कारण, इसके भूख संकेतक का क्षेत्र के कुल संकेतकों पर बहुत प्रभाव पड़ता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान 102 है, जबकि इसमें केवल 117 देशों को ही शामिल किया गया है। रिपोर्ट में भारत में भूख का स्तर 30.3 अंक है, जो काफी गंभीर है। यहां तक कि उत्तर कोरिया, नाइजीरिया, कैमरून जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। पड़ोसी देश जैसे श्रीलंका (66वां), नेपाल (73वां), पाकिस्तान (94वां), बांग्लादेश (88वां) है।

इंडेक्स में भारत में उच्च स्टंटिंग (बच्चों का विकास रुकना) दर के बारे में भी चिंता जताई गई है। हालांकि पिछले सालों के मुकाबले इसमें सुधार हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में भारत में पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में स्टंटिंग की दर 42 प्रतिशत थी, जो 2019 में 37.9 फीसदी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व के मामले में दर भी बहुत अधिक है।

देश में भुखमरी और गरीबी को खत्म करना अब एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है क्योंकि शासक दुनिया के सामने देश को विकासशील दिखाने की झूठी होड़ में जुटे हैं। सत्ता में बैठे लोगों का फोकस नेता की छवि गाडऩे में लगा है। वह देश के अंदरूनी हालत और समस्यों के प्रति गंभीर रूप से उदासीन है। यह बड़े खतरे का संकेत है क्योंकि इससे देश के ज्वलंत मुद्दे विस्फोटक स्तर पर पहुँच जायेंगे।