चैनलों का इतिहासबोध

0
300
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

यह प्रतीत होता है कि समाचारपत्र एक साइकिल दुर्घटना और एक सभ्यता के ध्वंस में फर्क करने में अक्षम होते हैं’

जार्ज बर्नार्ड शॉ का यह तंज चौबीस घंटे के न्यूज चैनलों पर कुछ ज्यादा ही सटीक बैठता है. चैनलों की एक खास बात यह है कि वे काफी हद तक क्षणजीवी हैं यानी उनके लिए उनका इतिहास उसी पल, मिनट, घंटे या प्राइम टाइम तक सीमित होता है. वे उस घंटे, दिन या प्राइम टाइम से न आगे देख पाते हैं और न पीछे का इतिहास याद रख पाते हैं. नतीजा यह कि चैनलों को लगता है कि हर पल-हर दिन नया इतिहास बन रहा है. गोया चैनल पर उस पल घट रहे कथित इतिहास से न पहले कुछ हुआ है और न आगे कुछ होगा. इस तरह चैनलों का इतिहासबोध प्राइम टाइम के साथ बंधा होता है.

हैरानी की बात नहीं है कि चैनल दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप पार्टी के प्रदर्शन पर बिछे जा रहे हैं. उनकी रिपोर्टिंग और चर्चाओं से ऐसा लगता है कि जैसी सफलता आप को मिली है, वैसी न पहले किसी को मिली है और न आगे किसी को मिलेगी. न भूतो, न भविष्यति! यह भी कि जैसे देश की राजनीति इसी पल में ठहर गई है, जहां से वह आगे नहीं बढ़ेगी. जैसे कि विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी के बावजूद आप की जीत के साथ इतिहास का अंत हो गया हो. जैसे देश को राजनीतिक मोक्ष मिल गया हो. मजे की बात यह है कि ये वही चैनल हैं जिनमें से कई मतगणना से पहले तक आप की चुनावी सफलता की संभावनाओं को बहुत महत्व देने को तैयार नहीं थे. कुछ उसे पूरी तरह खारिज कर रहे थे तो कुछ उसका मजाक भी उड़ा रहे थे. लेकिन नतीजे आने के साथ सभी के सुर बदल गए. हैरान-परेशान चैनलों के लिए देखते-देखते आप का प्रदर्शन न सिर्फ ऐतिहासिक बल्कि चमत्कारिक हो गया. उत्साही एंकर बहकने लगे. कई का इतिहासबोध जवाब देने लगा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here