चुनौती और चुप्पी

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फोटो: प्रशांत रवि

देश के देहात में एक किस्सा सुनाया जाता है. एक पंडित के घर अमावस की रात चोर आए. पंडिताइन ने उन्हें देख लिया. उसने पंडित को जगाया. बताया कि घर में चोर घुस आए हैं. पंडित ने दबी से आंख चोर को देखा और बोला कि अभी चिल्लाना नहीं,  चोर आराम से चोरी करके चलते बने. सारा गांव जान गया कि पंडित के यहां चोरी हुई है लेकिन पंडित ने चुप्पी साधे रखी. कुछ दिनों बाद पूर्णिमा की रात आई. अचानक पंडित-पंडिताइन चोर-चोर का शोर मचाने लगे. गांववाले पंडित के घर दौड़े. पंडित ने कहा-अभी थोड़े न आए हैं चोर! वे तो अमावस की रात ही चोरी कर गए थे. आज तो शोर मचाने का साइत बन रहा था.

नहीं मालूम कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह किस्सा सुना है या नहीं. साइत-संजोग को वे मानते हैं या नहीं, यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. लेकिन कभी-कभी वे इस किस्से वाले पंडित की राह जरूर पकड़ लेते हैं. सब कुछ देखने और उस पर चहुंओर शोर मचने के बाद भी चुप्पी साध लेते हैं. वे चुप होते हैं तो पंडिताइन की तर्ज पर उनके सिपहसालार भी मौन साध लेते हैं और तब तक कुछ नहीं बोलते जब तक स्थिति अनुकूल न दिखे.

दो साल पहले फारबिसगंज में पुलिस गोलीकांड में पांच अल्पसंख्यकों के मारे जाने के बाद भी नीतीश ने ऐसी ही चुप्पी साधी थी. हाल के समय में बिहार में लगातार संघ परिवार की बढ़ती गतिविधियों पर भी उनकी रहस्यमयी चुप्पी नहीं टूटी. करीब एक साल पहले रणबीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद पटना की सड़कों पर मची गुंडागर्दी पर भी वे कई दिनों तक मौन ही साधे रहे थे और तीन महीने पहले पूर्णिया में आदिवासियों के मार दिए जाने पर भी वे चुप्पी धारण किए रहे. फिलहाल उनकी चर्चित चुप्पी छपरा के धर्मासती गांव में मिड डे मील कांड के बाद की है. इस हृदयविदारक घटना के बाद देश भर में शोर मचता रहा,  लेकिन नीतीश कुमार ने चुप्पी नहीं तोड़ी. विरोधी कहते रह गए कि मुख्यमंत्री पटना से करीब 90 किलोमीटर दूर धर्मासती जाने की बात छोड़िए, अपने सरकारी आवास से कुछ किलोमीटर ही दूर बने पटना मेडिकल कॉलेज तक नहीं गए जहां उस गांव से आए कई बच्चों का इलाज चल रहा था.

घटना के नौवें दिन नीतीश की यह चुप्पी टूटी. उन्होंने कहा कि छपरा की यह घटना महज इत्तेफाक या हादसा नहीं बल्कि विरोधियों की सोची-समझी साजिश का परिणाम थी. यानी नौवें दिन भी उन्होंने वही बात दोहराई जो राज्य के शिक्षा मंत्री पीके शाही घटना वाले दिन ही कह चुके थे. नीतीश के चुप्पी तोड़ने के बाद आगे की कमान उनके सिपहसालारों ने थाम ली है. जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह कहते हैं, ‘धर्मासती कांड विरोधियों की साजिश का हिस्सा है. राजद और भाजपा के लोग आपस में तालमेल बिठाकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. बोधगया बम ब्लास्ट के बाद एक ही दिन दोनों दलों द्वारा बंदी का आह्वान कोई इत्तेफाक नहीं हो सकता.’

जदयू के कई नेता इसी तरह नीतीश के कहे को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं. लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि मुख्यमंत्री इतने दिनों तक चुप क्यों रहे. वे छपरा या  पटना मेडिकल कॉलेज क्यों नहीं गए? जदयू नेताओं के पास फिलहाल इस सवाल का जवाब नहीं. कुछ कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री के पांव में मोच थी. वे चल नहीं सकते थे,  सो नहीं गए. कुछ का जवाब है कि नीतीश अपने दौरे से इलाज के काम में बाधा नहीं डालना चाहते थे. आलोचकों का तर्क है कि पांव में मोच के बावजूद नीतीश कुमार अपने सरकारी आवास पर लगातार मिलने-जुलने से लेकर दूसरे काम करते रहे. मोच के तीसरे दिन वे अपने लोकप्रिय कार्यक्रम जनता दरबार में शामिल हुए. चौथे दिन कैबिनेट की बैठक में शामिल हुए. शिक्षा मंत्री पीके शाही के साथ अलग से बैठक भी की. पांचवें दिन यूनिसेफ के कंट्री डायरेक्टर लुईस जॉर्ज से भी मिले और स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा बैठक में भी हिस्सा लिया. लेकिन धर्मासती कांड को लेकर वे न बोलने का समय निकाल सके और न ही कहीं निकलने का.

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