चुनाव आयोग पर उठ रही उंगलियां

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भारत के लोकतंत्र में चुनाव आयोग का एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह आयोग ही है जिसे देश में चुनाव कराने की जिम्मेवारी हमारे संविधान ने सौपी है। संविधान की धारा – 324(1) चुनाव आयोग को संसद और हर राज्य की विधानसभा  के सभी चुनाव कराने, मतदाता सूचियां तैयार करने की निगरानी करने, निर्देशन तथा नियंत्रण करने का अधिकार देती है।

पिछले 70 साल से आयोग ने इस जिम्मेवारी को बहुत अच्छे तरीके से निभाया है। इससे भारत की साख बढ़ी है। स्वतंत्र व निष्पक्ष तरीेके से चुनाव कराने के लिए आयोग का रिकार्ड काफी अच्छा और विश्वसनीय रहा है। ऐसा नहीं है कि उसके काम में कहीं कमज़ोरी या  कमी नहीं रही पर उनमें से काफी चीजों के लिए आयोग को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कारण यह है कि अपना काम कराने के लिए आयोग को उन नौकरशाहों पर निर्भर रहना पड़ता है, जो खुद पूरी तरह अनुशासन में नहीं रहते। इसके अलावा  आयोग पर राजनैतिक दवाब भी पड़ता है। कई बार उसे सत्ताधारी पार्टी के साथ टकराव भी लेना पड़ता है। इन सबके बावजूद आयोग ने कमोवेश अच्छा काम ही किया है। इस पृष्टभूमि के होते हुए आयोग जो 2019 के लोकसभा चुनाव करवा रहा है, उस पर उंगलियां उठ रही हैं। आयोग से यह उम्मीद रहती  है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान वह आदर्श चुनाव आचार संहिता को पूरी सख्ती से लागू करवाएगा।  इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखेगा कि सत्ताधारी दल चुनाव के लिए सरकारी तंत्र का दुरूपयोग नहीं करे। सभी पार्टियों को बराबरी के मौके मिलें। इसके साथ ही धन बल के दुरूपयोग पर अंकुश लगाना भी चुनाव  आयोग का ही काम है।

मौजूदा चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के अलावा दो और सदस्य भी हैं। आयोग पर अपने काम में कोताही बरतने का आरोप विपक्षी दल लगा रहे हैं। सबसे आम शिकायत यह है कि आयोग आदर्श चुनाव आचार संहिता के परिपालन और विशेष तौर पर प्रधानमंत्री के मामले में उसे लागू करने में कोताही बरत रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में दिए भाषणों में बार-बार आदर्श चुनाव संहिता का उल्लंघन किया है। एक बार उन्होंने अपने भाषण में कांग्रेस पार्टी पर हिंदुओं का अपमान करने का आरोप लगाया और घोषणा की कि लोग इसके लिए चुनाव में उसे सज़ा देंगे। वे बार-बार बालाकोट हवाई हमले और पुलवामा  के शहीदों के नाम पर वोट मांगते रहे हैं। सशस्त्र सेनाओं की कार्रवाई की दुहाई और इसके लिए श्रेय का दावा करना उनके भाषणों में रहा और आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें आयोग को मिलती रही पर आयोग ने कभी भी उन पर ध्यान नहीं दिया।

फिर जब 15 अपै्रल को देश की सर्वोच्च अदालत ने आयोग को पूछा कि वह नफरत फैलाने वाले भाषणों के मुद्दे पर क्या कर रहा है तब कहीं आयोग ने मायावती, आदित्यनाथ, आज़म खान और मेनका गांधी के भाषणों पर कार्रवाई की और उनके चुनाव प्रचार करने पर दो से तीन दिन तक की रोक लगाई। लेकिन नरेंद्र मोदी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। उसी बैठक में आयोग ने गुजऱात भाजपा के अध्यक्ष वधानी पर भी उकसावेपूर्ण भाषण के लिए प्रचार से तीन दिन दिन के लिए रोक लगाई। लेकिन, इस फैसले का कोई अर्थ नहीं था क्योंकि इस रोक से पहले ही 23 अप्रैल को गुजरात में वोट पड़ चुके थे।  मतलब यह कि रोक मात्र एक औपचारिकता थी।

हुआ यह था कि जब प्रधानमंत्री के खिलाफ लगातार आदर्श चुनाव संहिता के उल्लंघन के बावजूद चुनाव आयोग सुस्त बना रहा तो कांग्रेस पार्टी की एक सांसद ने सर्वोच्च न्यायालय  में एक याचिका दाखिल की थी। इसके बाद ही 30 अपै्रल को आयोग ने बैठक की और प्रधानमंत्री के वर्धा के भाषण के बारे में फैसला लिया। आयोग का फैसला था कि इसमें आदर्श चुनाव संहिता या जन प्रतिनिधित्व कानून का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

चुनाव आयोग नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार में संशस्त्र बलों का दुरूपयोग किए जाने के बारे में दायर शिकायतों पर विचार करने से इंकार करता रहा है। यह सब उस स्थिति में है जब इस तरह का दुरूपयोग खुद चुनाव आयोग के इस ठोस निर्देश के खिलाफ है कि चुनाव प्रचार में सुरक्षाबलों की भूमिका को नहीं घसीटा जाना चाहिए। नौ अपै्रल को लातूर के अपने चुनावी भाषण में प्रधानमंत्री ने फिर सेना को खींचा  पर आयोग की चुप्पी बदस्तूर जारी है। अपनी पार्टी को लाभ पहुंचाने के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल करने में तो अमित शाह ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। देखा जाए तो इस मामले में वे मोदी से भी आगे निकल गए। अपनी कार्यशैली से तो आयोग यही दिखा रहा है कि वह सत्ताधारी दल के खिलाफ कार्रवाई करने से झिझक रहा है। इससे यह सोच बन रही है कि आयोग प्रधानमंत्री के समक्ष काफी बौना है। एक संस्थान के रूप में चुनाव आयोग एक महत्वपूर्ण संस्था है। इसे कार्यपालिका की दया पर  नहीं छोड़ा जा सकता।

तहलका ब्यूरो