चुनावी धुरंधर को ही नीतीश ने सौंप दी पार्टी

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नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी को हर तरह से ताकतवर बनाने की मुहिम तेज कर दी है। इस बावत उन्होंने पार्टी के तमाम नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी भी सौंप दी है। जिन नेताओं पर ज़्यादा भरोसा है, उन्हें ज़्यादा और जिन नेता पर कम भरोसा है, उन्हें कम जिम्मेदारी सौंपी गई है। सबसे ज्यादा भरोसा प्रशांत किशोर पर है, उन पर ही ज्यादा जिम्मेदारी डाली गई है। नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद भी सौंपा है। प्रशांत किशोर को एकाएक पार्टी का सदस्य बनाया गया और फिर एकाएक राष्ट्रीय उपाध्याक्ष भी बना दिया गया। प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के आवास में रह कर ही नीतीश कुमार के निर्देशों पर अमल कर रहे हैें।

नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं ही, अपनी पार्टी जद (एकी) के राष्ट्रीय अध्य्क्ष भी हैं। आने वाला लोकसभा चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनाव उनकी ही अगुवाई में लड़ा जाएगा। पार्टी की स्थिति को सभी दूसरी पार्टियों से सबसे ज़्यादा ताकतवर बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। 2005 से लगातार जद (एकी) सबसे बड़ी पार्टीं रही है। लेकिन 2015 में जद (एकी) का दूसरा स्थान हो गया। राजद सबसे ज़्यादा ताकतवर बन कर उभरा। राजद ऐसे वक्त में सबसे ज्यादा ताकतवर बन कर उभरा, जब राजद और जद (एकी) एक साथ थे और उन्होंने एक होकर विधानसभा चुनाव लड़ा। अब जद (एकी) राजद से अलग है और भाजपा के साथ है। फिर नीतीश कुमार शरद यादव को दरकिनार कर खुद अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जब शरद यादव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे या उसके पहले जब जार्ज फर्नाडींज राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, तो वे नीतीश कुमार को किसी मुद्दे पर टोक सकते थे। लेकिन अब पार्टी में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो उन्हें टोके। नीतीश कुमार पार्टी में जो चाहे, वह फैसला कर सकते हैें। जद (एकी) की दशा वैसी है, जैसी राजद की रही है। राजद के बारे मेें यह कहा जाता रहा है कि राजद का मतलब लालू प्रसाद और लालू प्रसाद का मतलब राजद। यही बात जद (एकी) और नीतीश कुमार के साथ भी कही जाने लगी है।

जानकारों के मुताबिक प्रशांत किशोर पिछले विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले नीतीश कुमार के करीब हुए। नीतीश कुमार को इसका फायदा हुआ। पिछले लोगसभा चुनाव के कुछ समय पहले वे भाजपा के संपर्क मेें आए थे और पार्टी को सलाह देने से लेकर प्रचार के काम में सहयोग करने की जिम्मेदारी उन्होंने संभाल ली। भाजपा को कामयाबी मिली। लेकिन बाद में भाजपा और प्रशांत किशोर के बीच टकराव हो गया। प्रबंध करने मेें प्रवीण माने जाने वाले प्रशांत किशोर ने पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव मेें कांग्रेस की मदद की। लेकिन प्रशांत किशोर को तरजीह नहीं मिली। फिर वे नीतीश कुमार की शरण में आ गए। जद (एकी) के नेताओं को प्रशांत किशोर को पार्टी में एकाएक लाना और ऊंचे पद पर बैठा देना अखरा तो है, लेकिन उनकी हिम्मत यह नही कि उनके खिलाफ नीतीश कुमार को कुछ बोल सके। फिर, नीतीश कुमार ने खुद ही प्रशांत किशोर को खास जगह दी है।

प्रशांत कुमार फिलहाल पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं की लगातार बैठकें कर रहे हेैं। पार्टी को ताकतवर बनाने के मकसद से वे युवकों को प्रशिक्षित कर रहे हैं। उनके जरिए आम युवकों के बीच पार्टी का प्रचार-प्रसार करेंगे।

राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि प्रशांत किशोर को पिछले विधानसभा में जिस तरह कामयाबी मिल सकी थी, क्या उसी तरह इस लोकसभा चुनाव में कामयाबी मिल पाएगी? पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त उन्हें भाजपा के खिलाफ रणनीति अख्तियार करनी पड़ी थी। इस बार नीतीश कुमार की पार्टी और भाजपा एक साथ हंै। नीतीश कुमार को लाभ का मतलब भाजपा का भी फायदा और भाजपा को फायदा मिलने का मतलब नीतीश कुमार को भी फायदा। वे भाजपा के साथ थे और अभी नहीं है। लेकिन उन्हें भाजपा के प्रति अपना रुख नरम करना पड़ेगा। जानकारो का तो यह भी कहना है कि प्रशांत कुमार जद (एकी) और भाजपा के बीच लोकसभा सीटों के बंटवारे में अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। वे खुद बिहार के हैं और बिहार के हर चप्पे की राजनीतिक स्थिति की उन्हें जानकारी है।