चुनावी चुनौतियाँ

नये साल में होने वाले विधानसभा चुनावों में होगा सभी पार्टियों का इम्तिहान

नया साल देश की राजनीति के लिहाज़ से भी बहुत महत्त्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। इस साल में कई विधानसभाओं के चुनाव होने हैं; जबकि कांग्रेस भी अगस्त-सितंबर तक अपना अध्यक्ष चुन लेगी। भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के लिए ये चुनाव बहुत अहम हैं। भाजपा को हाल के महीनों में जनता से मिले तिरस्कार की भरपायी करनी है; जबकि कांग्रेस चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करके अपनी स्थिति में सुधार लाना चाहती है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती उत्तर प्रदेश है, जहाँ योगी सरकार का इम्तिहान होना है। क्षेत्रीय दल भी इन चुनावों  में अपनी ताक़त दिखाकर जीतना चाहते हैं। यह माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के रूख़ को समझने के लिए ये विधानसभा चुनाव बहुत अहम हैं, क्योंकि इन चुनावों से सत्ताधारी भाजपा और दूसरी पार्टियों के प्रति जनता के रूख़ का पता चलेगा। फ़िलहाल के चुनावी माहौल और भविष्य के अनुमान को लेकर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

उत्तर प्रदेश में भाजपा की मेहनत बता रही है कि उसे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में चुनौतियों का अहसास है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले वरिष्ठ नेता अमित शाह के देश के इस सबसे बड़े राज्य के सघन दौरे ज़ाहिर करते हैं कि दिल्ली का गेटवे माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा की राह उतनी सरल नहीं है। भाजपा उत्तर प्रदेश में हिन्दुत्व के एजेंडे से लेकर अपने तरकश के तमाम तीर कमान पर चढ़ा चुकी है, जबकि उसे योगी सरकार के पाँच साल के कामकाज पर भी भरोसा है। हालाँकि ज़मीनी स्थिति बताती है कि योगी सरकार के पाँच साल के कामकाज को लेकर जनता की राय बँटी हुई है। मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो इस तरह खुलकर धार्मिक आयोजनों में शामिल हो रहे हैं। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के उद्घाटन पर उनका पहरावा और पूजा पाठ को लेकर विरोधी टिप्पणियाँ कर रहे हैं; लेकिन भाजपा को इसकी चिन्ता नहीं है। कॉरिडोर के उद्घाटन से पहले तमाम अख़बारों के पहले पन्ने पर सरकार के विज्ञापन प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरों से अटे पड़े थे। मथुरा के नारे भी उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल में भाजपा की तरफ़ से ख़ूब गूँज रहे हैं। भाजपा जानती है कि संकट में आया उत्तर प्रदेश का चुनाव उसे कैसे जीतना है? लेकिन क्या योगी सरकार के कामकाज को लेकर अपना मन बना चुकी जनता भाजपा की इस उम्मीद को पूरा करेगी? उत्तराखण्ड में भी भाजपा की राह आसान नहीं है। पंजाब में उसे काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं गोवा और मणिपुर में भी सत्ता थाली में रखे लड्डू की तरह नहीं मिलने वाली।

ओमिक्रॉन के बढ़ते खतरे के बीच अगले साल के शुरू के महीनों में उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब, उत्तराखण्ड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा के चुनाव होने हैं। उसके बाद साल के आख़िर तक कुछ और राज्यों में भी विधानसभा चुनाव हैं। ज़ाहिर है अगला साल देश की राजनीति में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सबसे अहम साबित होने जा रहा है। भाजपा उत्तर प्रदेश सहित अधिकतम राज्यों में जीत के झण्डे गाडऩा चाहती है। क्योंकि उसे मालूम है कि जितने राज्य उसके हाथ से फिसलेंगे, उतनी उसकी 2024 की दिल्ली की राह मुश्किल होती जाएगी।

भाजपा इन चुनावों में सघन चुनावी प्रचार और रणनीति बुनने के बावजूद भय से भरी है। प्रधानमंत्री ने चुनाव से तीन महीने ही प्रचार शुरू कर दिया है, जबकि पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिकार माने जाने वाले अमित शाह व्यक्तिगत रूप से चुनाव की तैयारियों पर नज़र रखे हुए हैं। प्रधानमंत्री साल के आख़िर तक आधा दर्जन बार चुनाव की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं, जिसके चलते इस बार वह संसद के शीत कालीन सत्र में भी अधिकतर अनुपस्थित रहे। जबकि अमित शाह दिल्ली से चुनाव से जुड़ी हर पल की ख़बर रख रहे हैं। इससे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की अहमियत समझी जा सकती है।

जहाँ तक दूसरे दलों की बात है, यह सभी चुनाव राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों का भी कठिन इम्तिहान हैं। हाल के महीनों में देश में विपक्ष ने अपने स्तर पर एकजुट होने कोई गम्भीर कोशिश नहीं की है। हाँ, यह ज़रूर दिख रहा है कि विपक्ष का एक त्रिकोण बन रहा है, जिसमें एक तरफ़ कांग्रेस और उसके समर्थक दल (यूपीए) है, तो दूसरी तरफ़ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ख़ुद को कांग्रेस के विकल्प के तौर पर स्थापित करने की कोशिश करते हुए क्षेत्रीय दलों को साथ जोडऩे की कवायद में दिख रही है। वामपंथी दल अभी ख़ामोश-से हैं और उनकी सक्रियता भी कमोवेश शून्य ही है।

उत्तर प्रदेश पर नज़र

उत्तर प्रदेश में अन्य सभी दलों के मुक़ाबले भाजपा ज़्यादा सक्रिय है। उसका सबसे ज़्यादा ध्यान उत्तर प्रदेश पर है। एक तरह से भाजपा उत्तर प्रदेश को 2024 के लिहाज से जनता का मत मानकर मेहनत कर रही है। उत्तर प्रदेश को लेकर अभी तक के निजी चैनल्स के सर्वे बता रहे हैं कि वहाँ मुक़ाबला होगा और योगी सरकार के प्रति जनता में कई मसलों पर नाराज़गी है। योगी सरकार ने हाल के महीनों में अपना प्रचार तंत्र मज़बूत किया है और विज्ञापनों के ज़रिये वह अपनी उपलब्धियाँ गिनाने में जुटी है। समाजवादी पार्टी (सपा) चुनाव सर्वे में दिखाये जा रहे अपने उभार से उत्साहित है। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पूरी ताक़त से मैदान में डट चुके हैं और भाजपा के साम्प्रदायिक नारों का जवाब उसी तर्ज पर दे रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस भी काफ़ी सक्रिय है। पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी पार्टी के अपेक्षाकृत कमज़ोर ज़मीनी आधार के बावजूद कुछ अलग तरीक़े से मेहनत कर रही हैं। जनता में कांग्रेस और प्रियंका गाँधी की ख़ूब चर्चा है। हालाँकि यह वोटों में कितनी तब्दील होगी, अभी कहना मुश्किल है। प्रियंका का ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ नारा ज़मीन पर पहुँचा दिख रहा है, और महिलाओं को पहली बार अपने महत्त्व का अहसास हुआ है। वे इसका वीडियो बना रही हैं, जिससे इसके प्रचार में मदद मिल रही है। प्रियंका गाँधी उत्तर प्रदेश में महिलाओं का अपना वोट बैंक बनाने की दिशा में काम रही हैं, जो चुनौतीपूर्ण तो है; लेकिन यदि काम कर जाए, तो चुनाव में तुरुप का इक्का साबित हो सकता है।

दिसंबर के आख़िर में कट्टर हिन्दुत्ववादी नेता यति नरसिंहानंद का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह मुसलमानों के ख़िलाफ़ उग्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए दिख रहे हैं। चुनाव से ऐन पहले इस तरह की चीजों को लेकर देश में नाराज़गी के स्वर भी उठे हैं। यति के इस वीडियो को लेकर, जिसमें वह हिन्दुओं से हथियार उठाने की अपील करते दिख रहे हैं, लोग नाराज़ हैं। यह वीडियो हरिद्वार के एक सम्मेलन का है। इस मामले में वैसे उत्तराखण्ड पुलिस ने वसीम रिज़वी उर्फ़ जितेंद्र नारायण त्यागी समेत अन्य लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है। रिज़वी वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने हाल में इस्लाम छोड़ हिन्दू धर्म अपनाने का दावा किया था। उधर नरसिम्हानंद दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्ऱेंस में पैग़ंबर मोहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी भी कर चुके हैं। दिल्ली पुलिस इस मामले में एफआईआर दर्ज कर चुकी है।

हालाँकि चुनाव से पहले इस तरह का साम्प्रदायिक माहौल बनाने की कोशिशों से कई वर्गों में नाराज़गी है। ऐसे तत्त्वों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने की अपील देश के कई जाने-माने लोगों ने की है। भारत के पूर्व सेना प्रमुखों ने भी इसे लेकर सख़्त नाराज़ग़ी जतायी है। सेना के इन पूर्व प्रमुखों ने अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर और पंजाब के कपूरथला के एक गुरुद्वारे में गुरु ग्रन्थ साहिब के कथित अपमान के मामले में लिंचिंग की भी निंदा की है। पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल (रिटायर्ड) अरुण प्रकाश ने ट्विटर पर यति नरसिंहानंद के वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि ‘क्या हम साम्प्रदायिक ख़ून-खऱाबा चाहते हैं?’ सेना प्रमुख रहे जनरल वेद प्रकाश मलिक भी इससे सख़्त असहमति जता चुके हैं।

भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से उसके सांसद वरुण गाँधी भी लगातार मुसीबत किये हुए हैं। वह लगातार भाजपा को निशाने पर रख रहे हैं। हाल में वरुण ने ओमिक्रॉन को लेकर उत्तर प्रदेश में लगाये रात्रि कफ्र्यू और दिन में भाजपा के बड़ी जन रैलियाँ करने और भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करने पर तल्ख़ टिप्पणी की थी। वरुण गाँधी ने ट्वीट करके कहा था- ‘रात में कफ्र्यू और दिन में रैलियों में लाखों लोगों को बुलाना। यह सामान्य जनमानस की समझ से परे है। उत्तर प्रदेश की सीमित स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के मद्देनज़र हमें ईमानदारी से यह तय करना पड़ेगा कि हमारी प्राथमिकता भयावह ओमिक्रॉन के प्रसार को रोकना है अथवा चुनावी शक्ति प्रदर्शन।‘

चुनावों के नारे

उत्तर प्रदेश दशकों के चुनावी नारों के लिए मशहूर रहा है। चुनाव के नारे निश्चित ही लोकतंत्र के उत्सव को रोचक बना देते हैं और कमोवेश हर राजनीतिक दल चुनावों से पहले इस तरह के नारे गढ़ता है, ताकि जनता को आकर्षित किया जा सके। इसमें सत्ता की नाकामी के ख़िलाफ़ तंज भरी भाषा से लेकर अन्य चुटकियाँ होती हैं।

हालाँकि इस बार के उत्तर प्रदेश के चुनाव में साम्प्रदायिक नारे भी ख़ूब उभर रहे हैं। पुराने नारों की बात करें, तो मिले ‘मुलायम कांशीराम, हवा हो गये जय श्री राम, ‘रामलला हम आएँगे, मन्दिर वहीं बनाएँगे’, ‘बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का’, ‘जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है’, ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर’, ‘चलेगा हाथी उड़ेगी धूल, न रहेगा हाथ, न रहेगा फूल’, ‘यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहाँ है कम’, ‘गुंडे चढ़ गये हाथी पर, गोली मारेंगे छाती पर’, ‘ठाकुर बाभन बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस-फोर’, ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ जैसे नारे इन दशकों में उत्तर प्रदेश चुनाव का हिस्सा रहे हैं।

इस बार के चुनाव में भी उत्तर प्रदेश की राजनीतिक फिजा में ख़ूब नारे गूँज रहे हैं। देखा जाए, तो 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी तक सपा भाजपा को टक्कर देती दिख रही है, भले कांग्रेस और बसपा टक्कर देने की तैयारी में हैं। असदुद्दीन ओवैसी बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश में सक्रिय दिख रहे हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय क्षत्रप ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद और चंद्रशेखर भी चुनावी ताल ठोक चुके हैं। अखिलेश चुनाव की इस बेला में यात्राएँ निकाल रहे हैं। उनके आक्रमण के केंद्र में भाजपा है; लेकिन कांग्रेस को भी ख़ूब कोस रहे हैं।

बसपा कभी उत्तर प्रदेश चुनाव की बड़ी महारथी रही है। लेकिन इस बार अभी तक उसके सक्रियता ठंडी सी है। हो सकता है विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद मायावती सक्रिय हों। इतिहास देखें, तो सूबे में सन् 1989 में बसपा को 13, 1991 में 12, 1993 और 1996 में 67-67, जबकि 2002 में 98, 2007 में 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत से और 2012 में 80 सीटें बसपा ने जीतीं। लेकिन 2017 में पार्टी 19 सीटों पर लुढ़क गयी। मायावती 2007 के अलावा 1995, 1997 और 2002 में (कुछ समय के लिए) मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। साल 1993 में सपा और बसपा ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।

भाजपा का उभार राज्य में राम मन्दिर आन्दोलन की वजह से हुआ और 1991 के चुनाव में उसे पूर्ण बहुमत मिला। इसके बाद 2017 में जाकर पूर्ण बहुमत मिला भाजपा को। अब 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का लक्ष्य इस बहुमत को दोहराना है। निश्चित ही यह पिछली बार के मुक़ाबले इस बार उतना सरल नहीं है। हालाँकि 2019 के आख़िरी महीने में सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर को लेकर आये फ़ैसले को भाजपा ने हमेशा अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की है। इस बार तो भाजपा मथुरा और काशी विश्वनाथ की बात चुनाव में कर रही है।

जबरदस्त दबाव में भाजपा मिशन के लिए छ: जन विश्वास यात्राएँ निकाल रही है। सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों से यह यात्रा रही निकाली जा रही है। इन यात्राओं का समापन जनवरी के पहले हफ्ते लखनऊ में बड़ी रैली से होगा, जिसमें पार्टी के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिरकत करेंगे। भाजपा ने इन यात्राओं रूट योजनावद्ध तरीक़े से अवध, काशी, रुहेलखण्ड-ब्रज, पश्चिम, गोरक्ष और कानपुर-बुंदेलखण्ड क्षेत्र रखा गया है। इन यात्राओं की तैयारी के लिए जब बैठक हुई थी, तब मुख्यमंत्री योगी ने कहा था कि हम ग़रीब कल्याण योजनाओं, सुरक्षा, रोज़गार और इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धियों के साथ ही आस्था के सम्मान को लेकर उठाये गये क़दमों को लेकर जनता के बीच जाएँगे। अब सब लोग अयोध्या जाना चाहते हैं, काशी अब विश्व पटल पर नज़र आ रही है।

ज़ाहिर है इसका मक़सद विकास के साथ हिन्दुत्व का तड़का लगाना था। इन यात्राओं के लिए भाजपा ने बड़े नेताओं राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह आदि को आदि मैदान में केंद्रीय मंत्रियों को उतारा। भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी यात्रा शामिल रहे। ख़ुद मुख्यंमत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्रियों ने यात्राओं की अगुवाई की।

उत्‍तराखण्ड की स्थिति 

साल 2021 के कुछ ही महीनों में भाजपा सरकार में तीन मुख्यमंत्री देखने वाले उत्तराखण्ड में भी नये साल में विधानसभा के चुनाव हैं। हालाँकि सूबे की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भाजपा में घमासान के चलते चुनाव से पहले राजनीतिक स्थिति दिलचप्स हो गयी है। सतारूढ़ भाजपा के मंत्री हरक सिंह ने केबिनेट की बैठक में ही इस्‍तीफा देने का ऐलान कर अपनी पार्टी भाजपा के लिए शर्मिंदगी की स्थिति बना दी। उधर पूर्व मुख्‍यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत की नाराज़गी की भी चर्चा राजनीतिक हलकों में है।

अभी तक की ज़मीनी स्थिति से ज़ाहिर होता है कि मुख्य मुक़ाबला भाजपा और कांग्रेस में है। भाजपा के लिए जुलाई में मुख्यमंत्री बने पुष्कर सिंह धामी को जातीय समीकरण साधने के लिए (वो राजपूत हैं) को पार्टी सामने लायी। भाजपा अभी से दावा कर रही है कि वह प्रदेश में चुनाव में 60 सीटें जीतेगी।

कांग्रेस हरीश रावत की नाराज़गी ख़त्म कर उन्हें माफ़ करने का दावा कर रही है। सम्भावना यही है कि चुनाव में वही कांग्रेस का मुख्‍यमंत्री चेहरा होंगे। अभी तक के अनुमान भाजपा के पक्ष में बहुत ज़्यादा नहीं दिखते। आम आदमी पार्टी (आप) के मैदान में आने से वोटों का बँटवारा हुआ तो कांग्रेस को इसका नुक्सान होगा। हालाँकि देखना होगा कि पार्टी कितने वोट ले पाती है। हालाँकि यह तय है कि मुक़ाबला कांग्रेस-भाजपा में ही है।

राज्य में पिछले विधानसभा चुनाव (2017) में भाजपा ने 70 में से 56 सीटें जीत ली थीं। इस तरह कांग्रेस को सत्ता से बाहर करके भाजपा ने सरकार सँभाली थी। अब कांग्रेस में भाजपा के कुछ नेताओं के आने से माहौल दिलचस्प बना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही भाजपा के लिए प्रचार शुरू कर चुके हैं। इस तरह भाजपा माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। चुनाव की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी जनसभाओं में विकास के कुछ वादे उत्तराखण्ड की जनता से किये हैं।

उधर कांग्रेस ने भी उत्तराखण्ड में पूरी ताक़त झोंकी हुई है। भाजपा के हाईटेक प्रचार का जवाब देने के लिए कांग्रेस ने एक मज़बूत टीम गठित की है, ताकि अपनी बात गाँव-गाँव तक पहुँचा सके। इंटरनेट मीडिया के इस्तेमाल में कांग्रेस मैदान में उतरकर आक्रामक तरीक़े से हाईटेक प्रचार में जुटी है। दरअसल कांग्रेस ने पाँच लोकसभा क्षेत्रों को जोन के रूप में बदलकर प्रदेश भर में इंटरनेट मीडिया पर प्रचार करने के लिए 400 से अधिक स्वयंसेवक नियुक्ति किये हैं। स्वयंसेवकों को सूबे के हर कोने में जाकर पार्टी और शीर्ष नेताओं की बात पहुँचाने का जिम्मा दिया गया है।