लाल कृष्ण आडवाणी: चिरयात्री

प्रधानमंत्री बनने की आडवाणी की आकांक्षा नई नहीं है. 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद जिस तरह से भाजपा का उभार हुआ था उसमें वे ही पार्टी के सबसे बड़े नेता थे. लेकिन भाजपा को केंद्र की सत्ता में पहुंचाने की रणनीति के तहत आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी का नाम पीएम पद के लिए आगे किया. तब उनकी छवि एक कट्टरपंथी नेता की थी और वाजपेयी उदार छवि वाले माने जाते थे. ऐसे में आडवाणी को लगता था कि गठबंधन राजनीति के दौर में वाजपेयी के नाम पर सहयोगी दलों को जुटाना आसान होगा. हुआ भी ऐसा ही. 1996, 1998 और 1999 में भाजपा वाजपेयी की अगुवाई में केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हुई.

जो लोग उस दौर के आडवाणी को जानते हैं, वे बताते हैं कि वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में आडवाणी ने हर वह कोशिश की जिससे उनकी छवि थोड़ी उदार बने ताकि भविष्य में उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो. अपनी छवि उदार बनाकर वे प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, यह 2002 में तब साफ हो गया जब राष्ट्रपति चुनाव होने वाले थे. उस दौरान चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम से जो लोग वाकिफ हैं वे जानते हैं कि आडवाणी चाहते थे कि 2002 में वाजपेयी को राष्ट्रपति बनवा दिया जाए और वे खुद प्रधानमंत्री बन जाएं. पार्टी के कुछ नेताओं ने इस प्रस्ताव पर वाजपेयी की राय जानने की कोशिश भी की थी. लेकिन वाजपेयी इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे और इसका नतीजा यह हुआ कि आडवाणी और वाजपेयी में इस बारे में सीधी बातचीत नहीं हो पाई. इसके बाद 2002 में ही वे उपप्रधानमंत्री बने ताकि अगर 2004 में फिर से भाजपा वापस सत्ता में लौटती है तो उनके लिए पीएम पद का रास्ता साफ रहे. वे जानते थे कि खराब सेहत की वजह से वाजपेयी अगला कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे और ऐसे में उनके लिए प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाएगा. इसके पीछे आडवाणी की सोच यह भी थी कि अगर वाजपेयी के नेतृत्व में 2004 का चुनाव लड़ा जाए तो इसका फायदा मिलेगा. लेकिन आडवाणी की वह योजना इसलिए धरी की धरी रह गई कि भाजपा की अगुवाई वाला राजग चुनाव हार गया.

इसके बाद वाजपेयी धीरे-धीरे नेपथ्य में चले गए. इसमें उनकी बिगड़ती सेहत की भी भूमिका रही. ऐसे में 2009 के लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिहाज से आडवाणी ने यह तय किया कि वे  आगे आकर नेतृत्व करेंगे. 2004 की हार के बाद वे खुद भाजपा के अध्यक्ष बने. अपनी उदार छवि गढ़ने के लिए वे पाकिस्तान गए. वहां मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर पहुंचे और बयान दिया कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे. संघ में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई और उन्हें अध्यक्ष पद के लिए बचे हुए कार्यकाल के लिए राजनाथ सिंह के लिए रास्ता साफ करना पड़ा. लेकिन 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले आडवाणी ने खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराया पर रथयात्रा सहित उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद पार्टी 2004 से भी कम सीटें जीत पाई. उनका सपना फिर अधूरा रह गया.

एक बार फिर लगा कि अब आडवाणी चूक गए और उनके लिए प्रधानमंत्री बनने के लिए सारे रास्ते बंद हो गए. संघ और भाजपा की तरफ से यह संकेत दिया गया कि भाजपा में बदलाव का दौर शुरू होगा और नए लोगों को जिम्मेदारी दी जाएगी. नितिन गडकरी को पार्टी अध्यक्ष बनाकर लाना उसी दिशा में बढ़ाया गया एक कदम था. लेकिन बदलाव का जो दौर चला उसमें एक-दो चेहरों को छोड़कर बाकी चेहरे वही पुराने रहे. जिन राजनाथ सिंह को 2009 में पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर गडकरी को लाया गया था, आज वही राजनाथ सिंह एक बार फिर से पार्टी के अध्यक्ष हैं. यानी बदलाव की बात हवा-हवाई रह गई और पार्टी एक बार फिर अपने पुराने ढर्रे पर लौट आई. ऐसे में शायद ही कोई आडवाणी को यह जाकर कहे कि आपको 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहिए और प्रधानमंत्री पद का मोह छोड़ देना चाहिए.

ऐसी स्थिति में आडवाणी को लगता है कि उनके लिए संभावनाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं. उन्हें लगता है कि भले ही मोदी को लेकर कितना भी माहौल बन रहा हो, लेकिन भाजपा अपने या मौजूदा सहयोगियों के बूते 272 का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाएगी और इसलिए उनके लिए प्रधानमंत्री बनने की संभावना अब भी बनी हुई है. उन्हें उम्मीद है कि ऐसी स्थिति में उनके साथ वे सहयोगी दल भी आ सकते हैं जो भाजपा से दूर हो गए हैं और कुछ नए सहयोगी दल भी उनके साथ आ सकते हैं.

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