चिट्ठी की प्रति बेसुरे को भेजी येती ने

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मैं ‘येती’ हूं। बहुत सारे लोग मुझे प्यार से नहीं बल्कि तिरस्कार से ‘बर्फ मानव’ कहते हैं। यह किस कदर अकथनीय अशिष्ट तरीका है दुनिया के बड़े रहस्यों को जानने का। सोचिए यदि कोई आपको घृणित अभिनेता कहे। आपको कैसा लगेगा? यही वजह थी, मैं अंदर से कितना हिल गया जब आपकी पार्टी के नेताओं में एक चौकीदार तरु ण विजय ने लिखा – बधाई! हमें हमेशा आप पर गर्व है। भारतीय सेना के पर्वतारोही दस्ते के सदस्यों को सलाम। लेकिन आप भारतीय हैं। कृपया ‘येती’ को जानवर न कहें। उनके प्रति आदर दिखाएं। आप कहें कि वह ‘बर्फ मानव’ है।

मैंने जब पढ़ा ता मेरे दढिय़ल चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। मेरी आंख से आंसू निकले लेकिन न जल्दी ही वे बर्फ बन गए। मकालू बारून नेशनल पार्क में बहुत ठंड है। लेकिन मेरे प्रति जो प्यार और सम्मान  चौकीदार तरु ण विजय ने जताया। मेरे दिल का पोर पोर खिल उठा और खुशी से मेरी आत्मा झूम उठी। शायद यह पहली बार हुआ कि मेरे जैसे एक मिथकीय प्राणी के प्रति इतना आदर सम्मान जताया गया। मैंने अपनी छाती जोर से थपकी और मारे खुशी के बर्फ में नाचने लगा। उस बर्फ पर मैंने अपने और भी पदचिह्न छोड़ दिए हैं जिन्हें आपके सिपाही देख सकते हैं और मेरी तलाश में जुट सकते हैं। अगर मै कभी चौकीदार तरु ण विजय से मिला तो वादा रहा कि मैं उन्हें अपने आलिंगन में ले लूंगा और बर्फ में उनके साथ हर तरफ नाचने लगूंगा।

मोदी जी, आपको मैं चिट्ठी इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है आप और सभी लोग मुझे और मेरी बात समझेंगे। क्योंकि मेरी ही तरह आप भी एक मिथक ही हैं। हम दोनों ही, मिथकीय प्राणी हैं। आपको भी लेकर ढेरों कहानियां बनी हुई हैं। जैसे मेरे चारों और कहानियों है वैसे ही आपको लेकर हैं। मेरी कहानियों के जरिए पाठक के मन में भय, आश्चर्य, और सबसे बड़ी बात आंतक तो बढ़ता ही है। दुख इस बात का है कि आपके बारे में भी ऐसी ही भयभीत कर देने वाली कथाएं हैं। जिनके बारे में मैंने सुना है।

हिमालय के पहाड़ी गांवों में मेरे नाम से बच्चों को माताएं डराती हैं। ‘खाना खा लो, नहीं तो येती आएगा और तुम्हें खा जाएगा।’ या कि ‘आंखें बंद करके सो जाओ नहीं ते येती आएगा और तुम्हें उठा ले जाएगा।’ या ‘जंगलों में बहुत मत घूमों। येती तुम्हारे जैसे शरारती को ही वहां ढंूढता रहता है।’ मुझे लगता है कि आपके प्रवक्ता, मंत्री, प्रशंसक समर्थक और भक्त ऐसे ही देश के लोगों यानी पुरूषों और महिलाओं को आपका भय दिखा कर वह कराते होंगे जिसे करने के लिए इनका मन तैयार न होता होगा। ऐसा है कि नहीं, बंधु। आपके बारे में तो जो मिथक प्रचलित हैं वे तो तमाम दूसरे मिथकों से भी कहीं आगे हैं।  उनकी तादाद भी मुझे लेकर बनी कहानियों में कहीं ज्य़ादा ही है। इनका स्तर भी एकदम अलग है।

अब बतौर उदाहरण लेें आपके बिना काम न चले वाला ही मिथक। मोदी नहंी तो फिर कौन? फिर एक दूसरा मिथक है। चाहे राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश से सीटें न मिले पर आएगा तो मोदी ही। फिर एक मिथक है सुशासन का। एक ऐसा मिथक  कि आप ही देश के रक्षक और चौकीदार हैं। फिर मिथक है पिछले कुछ ही साल में आपके देश ने जो प्रगति की वह पहले कभी हुई नहीं। इसे सुन कर मेरी ही तरह सारे मैदानी बंदर सिर खुजाते हैं।

आपके देश में लोग क्या सचमुच इन सब बातों पर भरोसा कर लेते हैं। वह भी उस भयानक नोटबंदी के बावजूद जिससे आप भी तब चकित थे। फिर देश में बेरोज़गारी तो हर समय ग्राफ में बढ़ी ही दिखी। मैं चाहता हूं कि मुझसे संबंधित मिथक बनाने वाले, आपको मिथकीय गौरव दिलाने की काबिलियत दिखाने वालों से कुछ सीखें-समझें।

मिथक बनाने की जब चर्चा चल रही है तो ‘बाल नरेंद्र’ पर भी बात करते है। यह कॉमिक्स प्रयोग वाकई बेमिसाल है जो आपके बचपन को पूरे तौर पर मिथकीय बना देता है। हालांकि मैं मानता हूं कि यह उतना कामयाब नहीं रहा जितना तिब्बत में टिमटिन से मैं हुआ। हालांकि मेरा मिथक लेखक हर्ज, शायद भूगोल में कमज़ोर था। इसीलिए उसने नेपाल की जगह मुझे तिब्बत का बता दिया। लेकिन उसने जिस तरह मेरी तस्वीर बनाई उसमें भरपूर मौज मजा था। पढऩे वालों ने खूब सराहा भी, पीढ़ी दर पीढ़ी। बुरा मत मानना ‘बाल नरेंद्र’ तो कभी उस स्तर को नहीं छू सकेगा। मुझे अफसोस है। हालांकि मैं यह देख जानकर सन्न रह गया कि जब मैंने पढ़ा कि आपने मां घडिय़ाल से बाल घडिय़ाल भी लिया और उसे फिर लौटा भी दिया। यह तो आपकी गजब की निडरता है। हालांकि यह निडरता प्रेस  कांफ्रेस में नहीं झलकती। हा…हा….हा… (यह येती का मजाक था, लिख यह मत लेना)

बहरहाल, आपसे बातचीत करना बहुत अच्छा लगता है। सूरज अब डूबने को है। मुझे वापस पहाडिय़ों से दौड़ते हुए अपनी उस गर्म आरामदेह बर्फीली गुफा में लौट जाना है जिससे रात गुज़ार सकूं। आपकी इच्छा के ठीक उलट, मुझे तो अच्छी, लंबी रात की नींद बहुत आती है।

सस्नेह

येती

साभार : वायर इन