चालबाज़ चीन

The Prime Minister, Shri Narendra Modi and the President of the People’s Republic of China, Mr. Xi Jinping at the delegation level talks, in Mamallapuram, Tamil Nadu on October 12, 2019.

सीमा पर चीन की गतिविधियाँ बड़े ख़तरे का संकेत

चीन का दूसरा नाम धोख़ेबाज़ है। सीमा पर उसकी शरारतें महज़ शरारतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनसे किसी बड़े ख़तरे की बू आ रही है। ज़्यादातर रणनीतिक जानकार इस बात पर सहमत हैं कि चीन लद्दाख़ के एक हिस्से में अपने क़ब्ज़े की साज़िश रच रहा है। चीन बहुत सोच-विचार के साथ अपनी सैन्य शक्ति को भी मज़बूत कर रहा है और भारत सीमा के संवेदनशील इलाक़ों में अपनी गतिविधियाँभी तेज़ कर रहा है। चीन की इस चाल और उससे बढ़ते ख़तरे के बारे में बता रहे हैं गोपाल मिश्रा :-

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते चीन आर्मी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों से लैस है, जिसका अन्तिम ध्येय सैन्य सन्तुलन को स्थानांतरित कर पूर्वी लद्दाख़ में लम्बे समय तक सैन्य अभियानों की अपने पक्ष में तैयारी करना है। भारत और चीन के बीच चल रही कमांडर स्तर की बातचीत से कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सकता है; क्योंकि चीन शान्ति की बात करते हुए भी सीमा क्षेत्रों में सैन्य रणनीतिक गतिविधियाँ सक्रिय रखना चाहता है।

हिमालय की ऊँचाइयों का लाभ लेने के लिए अपना पक्ष मज़बूत करने के अलावा पीएलए का एजेंडा अपने आश्रित पाकिस्तान को अपने कश्मीर एजेंडे की तरफ़ और अधिक मज़बूती से आगे बढ़ाने में सक्षम बनाने का है। उत्तरी और दक्षिणी तटों को जोडऩे के लिए पैंगोंग झील के नज़दीक एक पुल के निर्माण की हाल में सामने आयी उपग्रह छवियाँ एक बड़े राजनीतिक और रणनीतिक एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होती हैं। इसके साथ ही चीन ने अरुणाचल प्रदेश में एक चोटी सहित कम-से-कम 15 स्थानों के चीनी भाषा में नये नामों की घोषणा की है।

वैसे चीन भले कुछ करे; लेकिन वह भारत से मुँह की खाएगा। भारत के सेनाध्यक्ष मनोज मुकंद नरवणे का कहना है कि यदि चीन भारत पर युद्ध थोपता है, तो उसे हार का मुँह देखना पड़ेगा। उधर 12 जनवरी को भारत और चीन के बीच 14वें दौर की सैन्य वार्ता हुई, जिसमें हॉट स्प्रिंग्स से सैनिकों को पीछे हटाने पर जोर दिया गया। नई दिल्ली में विदेश कार्यालय भारतीय स्थानों के नाम बदलने के लिए चीन की आलोचना करने में तत्पर रहा है; और यह भी आश्वासन दिया है कि पैंगोंग झील की तीन जनवरी की तस्वीरों से उन क्षेत्रों का पता चलता है, जो पिछले छ: दशकों से चीनी नियंत्रण में हैं। हालाँकि भारतीय प्रवक्ता अरिंदम बागची को यह याद दिलाना चाहिए था कि दलाई लामा की यात्रा के बाद सन् 2017 में चीन ने अरुणाचल प्रदेश में छ: स्थानों का नाम बदल दिया था। साल 2022 में चीन ने घोषणा क्यों दोहरायी? यह काफ़ी दिलचस्प है। इसका उत्तर शायद यह हो सकता है कि अब अक्टूबर, 2021 में बनाये गये क़ानून के तहत पीएलए को चीनी क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा करने वालों के ख़िलाफ़ $कदम उठाने का पूरा अधिकार है। रूसी दबाव के बाद गलवान संघर्ष में भारत और चीन के बीच एक अस्थायी संघर्ष विराम हो गया था; लेकिन स्थिति अभी भी गम्भीर बनी हुई है। भारत शायद एक नये बहुपक्षीय चीनी आक्रमण के बारे में गहरे से आशंकित है, जिसमें कभी भी कहीं भी उसके ख़िलाफ़ आश्चर्यजनक तत्त्व हों। यह जून, 2020 में भारत द्वारा झेली गयी कई मौतों के साथ हुई झड़पों से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।

यह अब एक स्थापित तथ्य या भाग्य है कि सीमावर्ती राज्य होने के नाते अपने उत्तरी पड़ोसी देश चीन के साथ लगभग 2,500 किलोमीटर से अधिक लम्बी सीमा होने के कारण भारत को संघर्ष का सामना करना पड़ता है। जब भी यह संघर्ष होता है, इसमें किसी अन्य शक्ति का भौतिक समर्थन नहीं होता, विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस का। भारतीयों की स्मृति में यह अभी भी है कि सन् 1962 के संघर्ष के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन कैनेडी ने पीएलए से अधिक संख्या में भारतीय बलों को कोई भी हवाई कवर (समर्थन) देने से इन्कार कर दिया था। भारत को महत्त्वपूर्ण हवाई समर्थन से वंचित कर दिया गया था, जो उसे अपमान को बचा सकता था। हालाँकि सन् 1967 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के शासन के दौरान भारतीय सेना ने नाथू ला में चीनियों को परास्त किया और चार साल बाद बांग्लादेश भारत के सक्रिय समर्थन से स्वतंत्रता हासिल कर सका। इन घटनाओं के साथ, पूर्वोत्तर क्षेत्र में चीनी शरारत कुछ दशकों के लिए समाहित हो गयी। सन् 1962 के बाद के संघर्ष के वर्षों के दौरान तत्कालीन चीनी नेतृत्व की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा को चुनौती देने के लिए भारत को उच्च तकनीक वाले हथियारों से वंचित कर दिया गया था। इसके बजाय संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने पाकिस्तान को भारी आर्थिक सहायता और नवीनतम हथियार प्रणाली प्रदान की। इसने तत्कालीन पाकिस्तानी तानाशाह फील्ड मार्शल, अयूब ख़ान को तीन साल बाद सन् 1965 में भारत पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया। सन् 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन से भारत पर हमला करने के लिए कहा था, ताकि पाकिस्तानी सेना बंगाली मुसलमानों को ख़त्म कर सके। यह अनुमान है कि अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों द्वारा समर्थित नरसंहार ने 20 मिलियन लोगों की सामूहिक हत्याएँ कीं, जिसमें 30 मिलियन युवा बंगाली मुस्लिम महिलाओं का दमन शामिल था।

बड़े संघर्ष की तैयारी करे भारत

सावधानी के साथ एक प्रतिष्ठित पूर्व भारतीय राजनयिक एल.एल. मेहरोत्रा ने इस पत्रकार से कहा कि पैंगोंग झील के हालिया घटनाक्रम और चीनी भाषा में अरुणाचल प्रदेश के 15 स्थानों का नाम बदलने पर भारतीय कूटनीति द्वारा विश्वव्यापी अभियान शुरू करके आक्रामक रूप से मु$काबला किया जाना चाहिए। चीन के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों के पास वीटो की शक्ति है और जब भी वे मानते हैं कि वैश्विक शान्ति को ख़त्म है, वे इसका इस्तेमाल करते हैं। इसलिए यदि कोई स्थायी सदस्य हिंसा या संघर्ष को भड़काने में लिप्त होता है, तो उसे वीटो पावर से हटा दिया जाना चाहिए। उनका सुझाव था कि भारत को इसकी माँग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

महरोत्रा ने पीड़ा व्यक्त की कि भारत पहले ही मैकमोहन लाइन के कार्यान्वयन पर जोर न देकर चीन को कूटनीति में बहुत जगह दे चुका है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) या नियंत्रण रेखा (एलओसी) ने वास्तव में चीन को सीमाओं पर अपनी स्थिति को बदलने के लिए अनावश्यक स्थान दिया है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि यह एक मूर्खतापूर्ण तर्क है कि नेहरू शासन ने वर्तमान शासकों की तुलना में चीन को बहुत अधिक भूमि दी थी। चीनी एजेंडा हिमालय में रणनीतिक पदों पर क़ाबिज़ रहना है।

अधिकांश लोग, जो या तो कूटनीति के संवेदनशील क्षेत्र में रहे हैं या भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठान का संचालन कर रहे हैं, 2022 में तिब्बत के साथ उसकी सीमाओं पर चीनी सैन्य गतिविधियों को नये सिरे से ख़ारिज़ नहीं करते हैं। चीनी सैन्य दुस्साहस उसके एजेंडे के साथ निकटता से जुड़ा हुआ है। वह एशिया के साथ-साथ दुनिया भर में अपनी सैन्य श्रेष्ठता का दावा करता है। वह पहले से ही विश्व व्यापार और वित्तीय प्रणालियों में ख़ुद को आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर चुका है। कुल मिलाकर भारतीय धारणा यह है कि भारत और चीन के बीच चल रहे अनावश्यक सैन्य टकराव दुनिया में अपनी निर्विवाद सत्ता स्थापित करना एक बड़े चीनी डिजाइन का एक हिस्सा है; ख़ासकर जब 2049 में चीन कम्युनिस्ट अधिग्रहण के 100 साल का जश्न मनाएगा।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर ध्यान

भारत के राजनीतिक और सैन्य दोनों सुरक्षा प्रतिष्ठानों ने निकट भविष्य में दो एशियाई दिग्गजों के बीच सीमा गतिरोध के किसी भी स्थायी समाधान से इन्कार किया है। भारतीय प्रयासों को प्रौद्योगिकी विकास पर अधिक ध्यान देकर बढ़ाया जाना चाहिए। यह एकमत है कि पिछले तीन दशक के दौरान लगातार दुनिया भर में सरकारें क्षेत्र में चीन की कभी न ख़त्म होने वाली महत्त्वाकांक्षाओं से निपटने के लिए चौबीसों घंटे सतर्कता के साथ एक बहुआयामी भारतीय रणनीति विकसित करने में विफल रही हैं।

हाल के वर्षों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में चीनी पहल की तुलना में भारत पहले ही अपनी प्रौद्योगिकियों को विकसित करने का अवसर चूक चुका है। जबकि चीन अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 फ़ीसदी विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निवेश करता है, भारत ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.75 फ़ीसदी ज्ञान की उच्च खोज में निर्धारित किया है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जर्मनी ने नयी प्रौद्योगिकियों के विकास में चीन के साथ काम करने का फ़ैसला किया है। संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान के बाद चीन को पेटेंट होने वाले उत्पादों की सबसे बड़ी संख्या मिल रही है।

नयी रणनीतियाँ और हथियार

पिछले 10 वर्षों के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग ने पारम्परिक सैन्य योजना में सुधार किया है और इसे नागरिक-सैन्य एकीकरण के साथ सशक्त बनाया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में नये आविष्कारों ने चीनी सेना को और मज़बूत किया है। आधुनिक फ्रिगेट और पनडुब्बियों के साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार की नौसेनाओं को सशक्त बनाने के चीनी निर्णय ने भारतीय रक्षा तैयारियों की क़ीमत पर इस क्षेत्र में शक्ति सन्तुलन को अचानक बदल दिया है।

पिछले एक दशक के दौरान चीनी पहल के बारे में भारतीय मीडिया या यहाँ तक कि भारत में थिंक टैंक के सम्मेलनों में शायद ही कभी चर्चा की जाती है। सन् 2011 के बाद से रियर एडमिरल वांग यू, जो नेवल इक्विपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रमुख व्यक्ति थे; ने नौसेना के जहाज़ों को नये सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म के साथ नवीनीकृत करने में मदद की है। मेजर जनरल ये झेंग, जो 2011 से सैन्य योजना का हिस्सा थे; ने नये शोध के साथ विकास में मदद की है। इसलिए भारतीय नौसेना को दक्षिण-एशियाई क्षेत्र में इन घटनाओं पर ध्यान देना होगा और संघर्ष की स्थिति से कैसे निपटा जाए और ये स्थानीय शक्तियाँकैसे प्रतिक्रिया देंगी? इस पर मंथन करना चाहिए। भारत के सैन्य और नागरिक नेताओं के बीच एकमत है कि भारत को कभी भी यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अगर कभी चीन के साथ कोई टकराव बड़े पैमाने पर होता है, तो विश्व शक्तियाँसंयुक्त राज्य अमेरिका और रूस, उसकी ओर से वास्तविक हस्तक्षेप करेंगे।

अमेरिका और भारत की निकटता

यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि मानवाधिकार के मुद्दों पर बहुत चर्चा के बावजूद, अमेरिका के नेतृत्व वाला पश्चिम चीन के ख़िलाफ़ कभी वित्तीय प्रतिबन्ध गम्भीरता से लगाएगा। भारतीय विद्वान और रक्षा विशेषज्ञ एकमत हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार को अपनी चीन नीति को ठीक करना चाहिए, वह भी बिना बयानबाज़ी या तेज़ घोषणाओं के। यह पूछा जा रहा है कि वुहान घोषणा के रूप में ज्ञात शान्ति और समृद्धि के लिए भारत और चीन के प्रस्तावित संयुक्त प्रयास अब तक क्यों नहीं चल पाए। इसका श्रेय मोदी को जाता है कि उन्होंने भारत के उत्तरी पड़ोसी देश के साथ एक स्थिर सम्बन्ध बनाने के लिए कई बार राष्ट्रपति जिनपिंग से मुलाक़ात की। वह अपने पूर्ववर्तियों की तरह, क्षेत्र के कल्याण और प्रगति के लिए चीन में शामिल होना चाहते थे; लेकिन अब उसे सीमाओं की रक्षा के लिए देश के संसाधनों को फिर से तैनात करना होगा। चूँकि चीन के साथ संघर्ष बहुपक्षीय और बहुआयामी होने जा रहा है, वित्तीय औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्रों को शामिल करते हुए चुनौतियों का सामना करने की रणनीति बहुत व्यापक होनी चाहिए। इस बीच राजदूत मेहरोत्रा जी. पार्थसारथी जैसे विदेशी मामलों के विशेषज्ञों के सुझाव का समर्थन नहीं करते हैं कि चीन अमेरिका के प्रति निकटता के लिए भारत से नाराज़ हो रहा है। ज़मीनी सच्चाई यह है कि बाइडेन की चीन विरोधी बयानबाज़ी के बावजूद चीन में अमेरिकी निवेश बेरोकटोक जारी है। इस प्रकार, अमेरिकी राजधानी और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के निरंतर प्रवाह से सशक्त चीन ने अंतत: विश्व व्यापार में प्रतिष्ठित महाशक्ति का दर्जा हासिल कर लिया है और एशिया में अपना अधिकार लागू करने का इच्छुक है। चीनी रणनीति से ऐसा प्रतीत होता है कि वह सैन्य टकराव के साथ भारत को अग्रिम पंक्ति का राज्य होने के नाते लक्षित और शान्त करना चाहता है।

पूर्वी लद्दाख़ से लेकर भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र तक चीन की सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश और 15 किलोमीटर चौड़ाई वाले संकीर्ण क्षेत्र, जो भारत की मुख्य भूमि को उसके पूर्वोत्तर आठ राज्यों जोड़ता है; में चीन की आक्रामक मुद्रा दर्शाती है कि उसे इनकी ज़रूरत है। एक महाशक्ति के रूप में भी सैन्य दृष्टि से अमेरिका के जगह लेने की चीन की इच्छा जगज़ाहिर है। पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम) में चीनी घुसपैठ पिछले चार दशक से जारी है। वह मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और यहाँ तक कि मेघालय की गारो पहाडिय़ों में भी विद्रोहियों का समर्थन करने में कभी नहीं हिचकिचाता। भारत के मैत्रीपूर्ण प्रयासों के बावजूद चीन ने इस क्षेत्र में द$खल देना कभी नहीं छोड़ा।

चीनी खेल

01 जनवरी, 2022 की सुबह जब सूरज एक नयी उम्मीद की शुरुआत कर रहा था, तब एक अचंभित करने वाली शान्त धुन्ध भी थी। नये साल की पूर्व संध्या पिछले वर्षों में आशाओं और वादों को बढ़ाने के लिए धूमधाम वाली संध्या हुआ करती थी। हालाँकि पिछले दो वर्ष कोरोना महामारी के घातक दौर के चलते चुनौतियों भरे रहे हैं। इसके बावजूद दो देशों- भारत और चीन के सैनिकों का एक बड़ा समूह नये साल का स्वागत करने के लिए एक-दूसरे को बधाई देता है, वह भी ब$र्फ से ढकी हिमालय पर्वतमाला के बीच; जहाँ शिविरों में साँस लेने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। इन कठिन इलाक़ों में ऑक्सीजन कम हो जाती है, जहाँ हमारे सैनिक चौबीसों घंटे निगरानी रखते हैं। हालाँकि उन्होंने चीनी सैनिकों को मिठाई के साथ बधाई देने के लिए अपने नये साल की भावना को बरक़रार रखा। कुछ समय के लिए यह भूल गये कि जून, 2020 में ही, उनके बीच झड़प हुई थीं, जिसके नतीजे में दोनों पक्षों का भारी नु$कसान हुआ था। यह वही जगह गलवान घाटी थी, जहाँ सेनाएँ पिछले 20 महीनों से एक-दूसरे के सामने डटी हैं। लेकिन $खुशियों का यह आदान-प्रदान अल्पकालिक था। कई लोग तब आश्चर्यचकित रह गये, विशेष रूप से वह लोग, जिन्होंने केवल कुछ घंटे पहले ही मिठाइयों का आदान-प्रदान किया था; क्योंकि उन्हें उनके वरिष्ठों ने सूचित किया कि चीनियों ने एक अपनी भाषा में कई चीनी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर अपना झण्डा साझा किया है, जिसमें उन्होंने दवा किया है कि जिस क्षेत्र पर वे क़ब्ज़ा करना चाहते थे, उस पर क़ब्ज़ा कर लिया है। भारतीय पक्ष ने भी इस दुष्प्रचार का मु$काबला करने के लिए तुरन्त तिरंगा साझा किया।