चरखे से चर-खा तक

‘आप सब कुछ खाते है!’ मैं उन्हें बाड़े में लाने के लिए कुछ नए सवाल सोचने लगा. वे बोले, ‘अबोध हो. भारतीय राजनीति का इतिहास देखो. अगर इतिहास नहीं तो वर्तमान देखो. सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे.’
‘आपकी भूख असीमित क्यों है? जीने के लिए खाइए न! मगर आप इतना खाते हैं कि विदेशी बैंकों तक में आपके खाते हैं!’ ‘देखो मंगलग्रह के प्राणी! आमजन जीने के लिए खाता है, मगर हम जीतने के लिए खाते हैं. हमें चुनाव जीतना होता है इसलिए जो मिल जाता है, खाते हैं. बिना खाए, बिना खिलाए चुनाव नहीं जीते जाते. हमारा खाना प्राकृतिक है… वोट मांगा तो कसमें खाईं, जब भाषण दिया, तो भेजा खाया, कुर्सी मिली तो शपथ खाई, कुर्सी पर बैठे तो घूस खाई, कुर्सी से उतरे तो फिर सिर खाने आ गए…

तुम बस यह समझ लो कि हमारा खाने से रिश्ता कुछ ऐसा है जैसे कि सरकारी विभाग का एप्लीकेशन से और चापलूसी का प्रमोशन से.’ मैं मुंह की खा चुका था. अब उनसे शास्त्रार्थ करने की शक्ति शेष नहीं थी. मैंने अपनी बची-खुची शक्तियों को समेटा और पूछा, ‘भगवान के लिए आप यह बताइए, आप क्या नहीं खाते?’ ‘तरस’, यह कहकर वे पान चबाते आगे बढ़ लिए और मैं अपने साथ-साथ भारतीय वोटरों पर तरस खाने लगा.

-अनूप मणि त्रिपाठी

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