गांवों के नाम मुस्लिम थे इसलिए बदल दिए

0
634

उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर करने के बाद प्रदेश में भी उसी तर्ज का बदलाव शुरू हो गया है। चुनाव सिर पर देख कर सरकार मतदातों को रिझाने के लिए उनकी मांग के अनुसार गांवो के नाम बदल रही है।

शुरूआत हिन्दू बहुल गांवों के मुस्लिम नाम बदलने के साथ हुई है। बाड़मेर के मियां का बाड़ा गांव का नाम महेश नगर और झुंझनू के इस्माइलपुर का नाम पिचानवा खुर्द और जालौर के नरपाड़ा का नाम परपुरा कर दिया कर दिया है और आधा दर्जन गावों के नाम बदलने के प्रस्ताव केन्द्र को भेज दिए गए हैं।

मियां का बाड़ा गांव का नाम बदलने के लिए पंचायत ने 2010 में प्रस्ताव लिया और इसे राज्य सरकार के जरिए केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा। वहां से मंजूरी मिलने के बाद गांव का नाम महेश नगर किया गया। यहां के स्टेशन का नाम भी अब बदलने की प्रक्रिया चल रही है। नाम बदलने की वजह प्राचीन गांव का नाम महेश रो बाड़ो होना बताया गया है। अजमेर जिले के सलेमाबाद में श्री निंबार्क तीर्थ है। इसका नाम निंबार्क तीर्थ रखने का प्रस्ताव है। झुझनू जिले के एक अन्य गांव इस्माइलपुर का नाम कौशलनगर या ईश्वर नगर करवाने का प्रयास चल रहा है। चित्तौडग़ढ़ जिले की भदेसर तहसील का मंडफिया गांव देश के लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है यहंा सांवलिया सेठ का विशाल मंदिर है। लंबे समय से मंडफिया गांव का नाम सावंलियाजी करने की मांग चल रही है। चित्तौडग़ढ़ के ही मोहम्मदपुरा का नाम मेडी का खेड़ा, नवाबपुरा का नाम नई सरथल, रामपुर-आजमपुर का सीताराम जी का खेड़ा रखना तय है।

हिन्दू बहुल गांवों के मुस्लिम नाम बदलने के पीछे कारण भी अनूठा बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि कई गांवों के लोगों की शिकायतें थी कि गांव का नाम मुस्लिम होने के कारण हिन्दू युवाओं की शादियों में अड़चने आ रही है। इसके बाद ग्राम पंचायत स्तर से ही इन गावों के नाम बदलने का प्रस्ताव आया था। सरकार को केन्द्र से ऐसे 27 गावों के नाम बदलने की मंजूरी मिल चुकी है। किसी भी गांव का नाम बदलने के लिए पंचायत सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर राजस्व विभाग को भिजवाती है। इसकी पुष्टि करने के बाद राज्य सरकार की ओर से केन्द्र को प्रस्ताव भेजा जाता है। अनुमति मिलने के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू की जाती है, लेकिन ऐसा कोई करतब नजर नहीं आता?

कहा जाता है कि, सलेमाबाद का नाम बदलने की मांग काफी पुरानी है। लेकिन श्री जी महाराज के देवलोक गमन के बाद एक स्वर में गांव का नाम बदलने की आवाज़ उठनी शुरू हो गई। यहां के राजकीय विद्यालय का नाम पिछले साल ही बदल दिया गया था। सलेमाबाद के सरपंच धरणीधर उपाध्याय ने बताया कि 15 अगस्त 2017 को विद्यालय का नाम बदलकर जगतगुरू निंबाकाचार्य श्री जी महाराज राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय कर दिया गया था। उसके बाद जन प्रतिनिधियों द्वारा प्रस्ताव बनाकर जिला प्रशासन को भेजा गया। सलेमाबाद का नाम जागीरदार सलीम खान के नाम पर पड़ा था लेकिन अब यहां मात्र एक मुस्लिम परिवार के सात सदस्य रहते हैं। सरपंच धरणीधर ने बताया कि सलेमाबाद श्री जी महाराज की वजह से हिन्दुओं का तीर्थ है। इसलिए गांव का नाम श्री निम्बार्क तीर्थ करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

गत् एक जून को राजस्व विभाग ने बाड़मेर तहसील के समदंडी के राजव ग्राम मियां का वाड़ा का नाम बदलकर महेशनगर कर दिया। जानकारी के अनुसार मुगलकाल में इसका नाम महेश नगर था जिसे बाद में बदलकर मियों का बाड़ा कर दिया गया था। वर्तमान में गांव की मुस्लिम आबादी मात्र 21 है। महेश नगर के जनप्रतिनिधि पिछले दस साल से इसका नाम परिवर्तित करवाने के लिए प्रयासरत थे। अब जाकर महेश नगर के वाशिंदों की यह मांग पूरी हुई है। बदले गए इन गावों के नाम बदलने के पीछे जातिगत आंकड़ों को आधार माना गया है।

राजस्व मंडल के सब रजिस्ट्रार सुरेश सिंधी के अनुसार एक पूरी प्रक्रिया अपनाकर नाम बदला जाता है। पहले पंचायत सबूत या फिर नाम बदलने के आधार पर सर्वसम्मति से राजस्व विभाग को सिफारिश भेजती है, जिसकी पुष्टि कर राज्य सरकार भारत सरकार को भेजती है। जहां से अनुमति मिलने के बाद हम नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। इसलिए कई बार नाम बदलने के प्रक्रिया में समय भी लग जाता है। गांव का नाम बदलने की प्रक्रिया सरपंच से शुरू होकर गृह मंत्रालय तक जाती है। लेकिन सवाल है कि नाम बदलाव में क्या वास्तव में यह पूरी प्रक्रिया अपनाई गई?