गर्त में डूब रही हैं सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं

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सत्ता की सियासत को सुगढ़ बनाने वाली योजनाओं को साधने के लिए संकल्प की आवश्यकता होती है और जब संकल्प बिखरता है तो यही योजनाएं सरकार की अन्त्येष्टि की अर्थी तैयार कर देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजनाओं का सत्य यदि इसी अवधारणा के सन्निकट है तो सरकार का ‘राम नाम सत्य है…’’ का मर्सिया सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।’’ बाज़ादी के बाद के भारत के शासक अब तक इतिहास से ही सीखते-समझते आए हैं लेकिन मोदी सरकार इस इतिहास की उलटबांसी में जुटी रही। सरकार की योजनाओं का सत्य बांचने और उनके अमल का खाता-बही जांचने वाले मंत्रालय ने अपनी रपट में जो लेखा-जोखा सांैप दिया उसके मुताबिक सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं के बेड़े में 14 योजनाएं बुरी तरह फ्लाप हो चुकी हैं। खबरिया चैनलों पर ऊंचे सुर में मोदी सरकार की जिन योजनाओं के गुणगान में कसीदे पढ़े गए, उनमें प्रधानमंत्री जन आवास योजना देश के 27 राज्यों में राह से भटक चुकी थी। योजना में कर्ज वापसी की अक्षमता और ओैपचारिकताओं की घुमावदार गलियों ने उस ‘गरीब’ को किनारे कर दिया जिसके लिए कथित रूप से यह योजना बनाई गई थी। लोगों के आसपास यह बहस बुरी तरह खदबदाती रही और फट पडऩा चाह रही है कि,’गरीब’ मेरी प्राथमिकता का आलाप करने वाले मोदी असहमति का स्वर क्यों सुन नहीं पाए?

आठ करोड़ गरीब महिलाओं को मुफ्त कनेक्शन देने का लक्ष्य लेकर चली जिस ‘उज्जवला योजना’ को भावुकता से सने लफ्जों के साथ मोदी ने अपनी मां की पीडा को आत्मसात किया कि,’इस योजना के पीछे मुझे मेरी ‘मां’ का बेहाल चेहरा नजर आता है, जो धुएं की धोंकनी बर्दाश्त करती हुई मेरे लिए रोटी बनाती थी, अब इस योजना से गांव-गुवार में रहने वाली करोड़ों ‘माताओं’ को दम घोंटू, धुएं से निजात मिल सकेगी। क्या ऐसा हुआ? जबकि पेट्रो कंपनियों के ढुलमुल रवैये और केरोसीन वितरण में लाभार्थी पहचान की नाक घुसडऩे की कोशिश ने योजना को दौडऩे से पहले ही कुंद कर दिया, नतीजतन ‘मोदी गाथा’ का जाप करने वाली यह योजना गांवों की तरफ जाने वाली पगडंडियों पर ही ठिठक गई? अब इस हकीकत को क्या कहा जाए कि दीनदयाल ज्योति योजना बावजूद ‘सौभाग्य योजना’ के जोड़ -घटाव के बाद भी 15 राज्यों में फिसड्डी बनी रही? फसल योजना ने अगर भला किया तो कंपनियों का ! सीएजी रिपोर्ट तो इस योजना को किसानों का बंटाढार करने का सर्टिफिकेट दे चुकी है। कितना कड़वा सच है कि बीमा कंपनियां फसल बीमा योजना का 32 हजार करोड़ डकार गई और सरकार उन चेहरों को भी नहीं पहचान पाई? भाजपा को सत्ता में पहुंचाने में जिस किसान की अहम भूमिका रही, वो आज भी सड़कों पर है? किसानों को भरोसा दिया गया था कि फसल की लागत का उन्हें 50 फीसदी मुनाफा दिया जाएगा, लेकिन साल से सरकार इसी समीकरण में उलझी रही कि ‘लागत की परिभाषा क्या हो? कांग्रेस सरकार के दौरान कृषि के क्षेत्र में 4.2 फीसदी की तुलना में अब तक की सबसे कम 1.9 फीसद वृद्धि आंकी गई। जिस मनरेगा को कभी मोदी ‘मौत का स्मारक’ कह कर कोस चुके थे, उस पर वे हजार बार निसार रहे और इसकी सफलता भी हड़पने में कोताही नहीं बरती।

‘स्मार्ट सिटी’ शायद मोदी सरकार की सबसे ज्यादा महत्वाकांक्षी योजना रही, लेकिन अव्वल तो इसके खांचे में ही खोट था। शहरों को आधुनिक संचार व्यवस्था से परिपूर्ण करने का लक्ष्य लेकर चली इस योजना की प्रगति अब तक सिर्फ दो फीसद की पूर्ति के साथ ही चौंकाती रही। यह योजना निकाय, निजी कंपनियों और परामर्शकों के तितरफा हाथों में तो विभाजित थी ही, फिर शहरी विकास का दायित्व भी निकाय और निगम दो भागों में बंटा हुआ रहा नतीजतन योजना का बंटाढार तो होना ही था। इस योजना में चयनित शहरों में प्रत्येक को दो सौ करोड़ किए दिए गए। लेकिन उपयोग सिर्फ 8.5 फीसद रकम का ही हो पाया। जो योजना केन्द्र, राज्य और निजी क्षेत्रों में बंटी हुई हो, उसका भविष्य क्या हो सकता था, क्यों इस बात पर मंथन नहीं किया गया? मुद्रा योजना में एक व्यक्ति को औसतन 17 हजार रुपए का कर्ज मिल पाता है। इस रकम से उसका अपना गुजारा तो संभव है, लेकिन दूसरों के लिए रोजगार उत्पन्न करना तो कल्पना से परे है। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ में तो नेताओं की कैमरापरस्ती ही ज्यादा हावी रही। नतीजतन अभियान में शिरकत करते नेताओं की फितरत तस्वीरों की शक्ल में उनके घरों में टंग गई, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने यह कहते हुए हकीकत बेपर्दा कर दी कि ‘दुनिया के सबसे 15 प्रदूषित शहरों में 14 शहर भारत के हैं और इनमें दिल्ली भी शामिल है। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ को लागू करने से पहले इसे प्रयोग के धरातल पर परखा जाना चाहिए था। बगैर ऐसा किए, इसे पूरे देश में एक साथ लागू करने का क्या औचित्य था? पांच सालों में अगर देश के गिनती के क्षेत्र ही शौच मुक्त हो पाए तो इस योजना की विश्वसनीयता क्या रही?

जन-धन योजना, मोदी के इस संकल्प के साथ शुरू की गई कि, ‘आर्थिक गतिविधियों में जनता की भागीदारी सरकार का उत्तरदायित्व है…..’’ फिर ऐसा क्यों हुआ कि इस योजना में 50 फीसद खाते तो आज भी ‘जीरो बैलेंस’ बने रहे। सूत्रों के मुताबिक यह 76.81 प्रतिशत रही। इस योजना की सबसे बड़ी खामी रही इसकी पात्रता के दायरे में आने वाले लोग जिनका अपना गुजारा ही बमुश्किल से होता हो, वो खाते में जमा करवाने के लिए रकम लाते कहां से? फिर सरकार ही इन खातों में रकम जमा करवाने के अपने दायित्वों से कैसे मुकर गई?

मेक इन इंडिया’ के अभियान की शुरूआत इस दावे के साथ बड़े जोशोखरोश से की गई कि भारत को ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाया जाएगा। इसमें नवाचार को बढ़ावा देने और कोैशल विकास की वृद्धि का दावा भी शामिल था, लेकिन जब विश्व व्यापार में हिस्सेदारी ही 0.8 फीसदी पर अटकी रही और निवेश के तमाम रास्ते बंद रहे तो कैसे बनता भारत वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग हब? इस योजना पर अंदेशों की परतें तो शुरूआती दौर में ही चढ़ गई थी जब मोदी और संघ की आर्थिक विचार धारा में टकराव की स्थितियां उत्पन्न हो गई थी। संघ ने स्वामित्व के अधिकारविहीनता की गोटी को यह कहकर कैच कर लिया कि,’दिहाड़ी मजदूर आखिर कैसे विकास का मॉडल हो सकता है? नतीजतन इस योजना पर अप्रत्यक्ष रूप से मोदी ओैर संघ के बीच साझा चुप्पी ही बनी रही। ‘मेक इन इंडिया’ का सीधा रिश्ता कौशल विकास के अलावा शिक्षा से भी है, लेकिन मानव संसाधन मंत्रालय ने पाठ्य पुस्तकों के भगवाकरण के फेर में इन अवसरों को मु_ी से फिसल जाने दिया?

आयुष्मान भारत योजना की शुरूआत इस दावे के साथ की गई कि इस योजना के तहत बीपीएल परिवारों का बीमा किया जाएगा और उन्हें अस्पतालों में कैशलेस इलाज उपलब्ध करवाया जाएगा। लेकिन क्या समय रहते योजना का खाका तैयार हो पाया? डिजिटल भुगतान की बात सुनने में अच्छी लग सकती है, लेकिन लागू होना बेहद जटिल रहा। प्रश्न है कि फुटकर कारोबार और दिहाड़ी रोजगार की बहुतायत वाले इस देश में आखिर डिजिटल भुगतान कैसे संभव था? इस योजना की प्रगति के आंकड़े ही इसकी मुखालफत करते नजर आते हैं। स्त्री-पुरुष के बीच बढ़ते लिंगानुपात की खाई को पाटने और स्त्री शिक्षा संवर्द्धन के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना तो तथाकथित प्रगति के घाट पर जल्दी ही फिसल गई। बालिका जन्म दर में इजाफा होने की बजाय आठ फीसद की गिरावट आ गई। स्किल इंडिया योजना के तहत साल 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को कौशल विकास के जरिए हुनरमंद बनाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन योजना के काम-काज पर निगरानी रखने वाली समिति ने ही इन लक्ष्यों की आपूर्ति की संभावना पर सवालिया निशान लगा दिए? मोदी सरकार हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा कर सत्ता में आई थी, लेकिन सेंटर फॉर मानीटरिंग इंडियन इकोनामी का सर्वेक्षण कहता है कि इस योजना में सरकार प्रगति के पायदान तय नहीं कर पाई। इस मामले में लेबर ब्यूरो का आंकड़े जारी नहीं करना और चुप्पी साध लेना अंदेशों को बल देता है। सांसद आदर्श ग्राम योजना संभवत: अफरातफरी में शुरू की गई होगी, अन्यथा कोई भी योजना लक्ष्यविहीनता के बगैर कैसे शुरू हो सकती है। इस योजना में प्रगति के आंकड़े उबासी लेेते सांसदों की तस्वीर सामने लाते हैं। हैरत की बात है कि पांच साल बीत गए लेकिन 80 फीसदी सांसदों ने गांवों का चयन तक नहीं किया, ऐसे में आदर्श ग्राम योजना का भविष्य सांसदों की नाफरमानी का अक्स खींच देता है?

नकदी पर चलने वाली सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में अगर काला धन काबू में करने के लिए नोटबंदी की गई तो छोटे कारोबार और कुटीर उद्योग तो डूबे ही, देश को भी अनंतकाल के लिए मंदी की अंधी गुफा में धकेल दिया गया। सेंटर फॅार मानीटरिंग इकोनामी के अनुसार नोटबंदी के कारण 15 लाख नौकरियां भी अंधकूप में चली गई। अलबत्ता नोटबंदी तो तभी लागू होती है जब देश की साख डूब रही हो, क्या नौबत ऐसी आ गई थी? जीएसटी ने हर उस जगह पर कामगारों के घुटने तोड़ दिए, जहां उन्हें रोटी-रोजगार मिला हुआ था? लोगों को मोदी से रोजगार और महंगाई सरीखे दो बड़े मुद्दों पर लीक तोडऩे की उम्मीद थी लेकिन मोदी के जुमले जमीन पर ही नहीं उतर पाए? खुद मोदी भी जुमलों को नुमाइशी बता चुके है कि, ‘चुनावी माहौल में कह दी जाती है कई बातें?’अच्छे दिन’ लाने के वादे के साथ मोदी सरकार कामयाबी का पैमाना गढऩे के इरादों पर फोकस करती तो पांच साल बाद अपनी सफाई देने वाले ‘साफ नीयत, स्पष्ट विकास’ का नाकारा नारा गढऩे की जरूरत नहीं पड़ती अलबत्ता असफलता के अहसास के साथ योजनाओं का कोई स्पष्ट ‘रोड मैप’ दिखाते तो कोई बात बनती। मोदी सरकार की नाकामी तो इसी मोड़ पर साबित हो जाती है कि,’अच्छे दिन का वादा करने वाली सरकार अच्छे दिनों का अहसास तक नहीं करा सकी।’

वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी कहते हंै कि किसी भी सरकार के लिए भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होती हीै। आधिकारिक तथ्यों पर भरोसा करके ही सारे कामकाज निपटाए जाते हैं। न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय कारेाबारी और नीति नियंता सरकारी आंकड़ों के आधार पर ही योजनाएं बनाते और उन्हें मूर्त रूप देते हैं। ऐसे में यदि सांख्यिकी विभाग द्वारा जारी किए गए तथ्यों पर सवाल खड़े हो जाएं तो बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है। भारत सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) ने यह खुलासा करके हंगामा मचा दिया कि ‘नई श्रृंखला’ में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) की गणना के लिए मंत्रालय के पोर्टल से जिन कंपनियेां केा शामिल किया गया है उनमें करीब एक तिहाई (38 फीसदी) का कहीं अता-पता नहीं है। इस पर विवाद शुरू हो गया है कि क्या ऐसा करने से जीडीपी के आंकड़ों को बढ़ाकर दिखाया जा सकता है? सरकार का दावा है कि इन कंपनियों के आंकड़ों को शामिल करने केे बावजूद जीडीपी के आकलन में कोई गड़बड़ी नहीं है। हालांकि सरकार ने इस मामले का अध्ययन करने की बात भी कहीं। इस मुद्दे पर राजनीति गरमा जाना स्वाभाविक है। पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने तो सरकार पर जीडीपी अनुमान को ज्यादा दिखाने के लिए केन्द्रीय सांख्यिकी मंत्रालय पर आंकड़ों में जानबूझकर गड़बड़ी करने का आरोप लगाया है। सरकार के दावों के विपरीत एनएसएसओ के रोजगार के आंकड़ों पर पहले भी हंगामा हो चुका है।

कोठारी कहते हैं कि जीडीपी को लेकर सरकार के अंाकड़ों पर सबसे पहले शक उस समय व्यक्त किया गया था जब 2015 में ‘नई शंृखला’ के आंकड़े पहली बार जारी किए गए। तब जीडीपी में तेज उछाल दर्ज किया गया था। सरकार का दावा था कि यह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में सबसे ज्यादा है। तब पहली बार जीडीपी की गणना के लिए उत्पादों के व्यापक सर्वेक्षण के स्थान पर कंपनियों के लाभ को शामिल किया गया। वैसे तो कुछ विशेषज्ञ इसे ज्यादा वैज्ञानिक तरीका मानते हैं क्योंकि कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास कंपनियों की वित्तीय गतिविधियों के आंकड़े आसानी से उपलब्ध होते हैं। लेकिन एनएमएसओ का यह खुलासा कि इन अंाकड़ों में शामिल एक तिहाई कंपनियां फर्जी हंै, एकबारगी जीडीपी की पूरी गणना पर सवाल खड़े कर रहा है। भारतीय सांिख्यकी विभाग के आंकड़ों पर पहले कभी ऐसे सवाल खड़े नहीं हुए थे। यह संदेश ऐसे समय प्रकट हो रहा है जब आर्थिक विकास और रोजगार, चुनाव में राजनीतिक मुद्दे बने हुए हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर तरह-तरह की आशंकाओं के कारण विदेशी निवेशक पूरी तरह निश्चित नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे में सामने आई कथित गड़बड़ी के बाद भरोसे का संकट और गहरा सकता है। इसलिए अब यह ज़रूरी हो जाता है कि आंकड़ों की गणना को राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंकाओं से दूर रखने के हर संभव उपाए किए जाएं। कोठारी कहते हैं कि, चुनाव के बाद जो नई सरकार बनेगी उसके कंधों पर यह जिम्मेदारी भी होगी कि भारत सरकार की विश्वसनीयता के साथ यदि खिलवाड़ किया गया है तो उसकी जांच कराएं और भविष्य के लिए सांख्यिकी विभाग को राजनीतिक हस्तक्षेप में दूर रखने का तंत्र विकसित करे।