गठबंधन का तिलक लगाए चुनाव मैदान में आएंगी पार्टियां

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चुनावी दंगल 2019 में क्या राष्ट्रीय और क्या क्षेत्रीय सभी दोस्त और दुश्मन की पहचान करते हुए गंठबंधन या गठजोड़ या फिर तालमेल ही सही, की कोशिश में जुटे हुए हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी से भाजपा में खासी कशमकश हैं। वह बिहार में नीतीश के साथ गठजोड़ और रामविलास पासवान के साथ तालमेल में कामयाब रही है। हालांकि नागरिकता के मुद्दे पर असम गण परिषद अब एनडीए से बाहर है वहां की तीन दूसरी पार्टियां भी बाहर आने को बेताब है। वहीं उत्तरपूर्व में मेघालय के संगमा ने भी गठबंधन पर पुनर्विचार की बात छेड़ दी है। एनडीए की पुरानी सहयोगी शिवसेना यों भी भाजपा को राम मंदिर निर्माण आदि मुद्दों पर धमकाती ही रहती है।

बिहार  में नया तो नहीं पर दिलचस्प गठजोड़ बिहार में नीतीश कुमार की पार्टी के साथ एनडीए का फिर हुआ है।  जब 2014 में लोकसभा चुनाव हुए थे तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने अलग-अलग राह पर चलने का फैसला लिया था। विधानसभा चुनाव भी अलग-अलग ही लड़े गए। अब फिर इनमें गठजोड़ हो गया है। दोनों दलों के नेताओं में कई दौर में बातचीत हो चुकी है लेकिन आधिकारिक घोषणा का इंतजार हें संभावना है कि कांग्रेस और शरद पवार  के नेतृत्व वाली एनसीपी महाराष्ट्र में कुल 48 सीटों में आधे-आधे पर लड़ेंगे।

अनुमान है कि प्रदेश की इन लोकसभा सीटों पर ये दोनों बड़ी पार्टियां 20 सीटों पर एक साथ  चुनाव लड़ेंगी। बाकी आठ सीटें ये अपने सहयोगी दूसरी छोटी पार्टियों में बांट देंगी। एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि उनकी पार्टी का इरादा है कि किसी भी तरह भाजपा और शिवसेना को हराया जाए। हालांकि इस गठबंधन में महाराष्ट्र नवनिर्माण (एमएनएस) के लिए स्थान नहीं है।  कांग्रेस ने 2014 में 26 सीटों और एनसीपी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा। आखिरी सीट तालमेल की सहयोगी पार्टी को दी गई। एमसीपी को जहां चार सीट मिली जबकि कांग्रेस को महज दो।

शिवसेना-भाजपा

दोनों पार्टियों शिवसेना और भाजपा ने इस साल विधानसभा चुनावों के पहले आपसी सहयोग समाप्त कर लिया था। इसमें कांग्रेस को 42 और एनसीपी को 41 सीटें 288 सीटों में से मिली। इसमें सबसे ज़्यादा लाभ शिवसेना और भाजपा को मिला। इन्होंने मिलकर सरकार का गठन किया । इन दोनों पार्टियों की आपसी समझ और एका के चलते स्थानीय निकाय और एमएलसी चुनावों में भी समझ बनी। आगामी लोकसभा चुनावों के लिए एक सलाह यह है कि इन्हें ज़्यादा सीटों के  लिए चुनावी लाग -डपटÓ की बजाए एक समान सीटों पर चुनाव लडऩा चाहिए। यदि वे फिर सहयोगी होना चाहते हैं।

कांग्रेस-आप

ऐसा नहीं है कि भाजपा और कांग्रेस ही गठजोड़ के लिए उत्सुक हैं बल्कि आम आदमी पार्टी भी सहयोग ढूंढ रही है। तहलका ने पिछले दिनों एक रपट दी थी। जिसमें यह जानकारी दी गई थी कि लोकसभा चुनावों में इसका तालमेल कांग्रेस के साथ दिल्ली और संभवत: पंजाब में भी होगा। पूर्व पत्रकार – आप नेता- पत्रकार फिर आशुतोष ने अपने न्यूज पोर्टल में पहली जनवरी को लिखा कि आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन का प्रस्ताव पहली बार अरविंद केजरीवाल ने दिया था। हालांकि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दोनों पार्टियों में ऐसे किसी तालमेल से इंकार किया था क्योंकि तब पंजाब में कांग्रेस मजबूत थी। पार्टी के व्यापक हितों की खातिर ऐसी संभावना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह बात मान लेंगे। उनकी मुलाकात भी पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी से सात जनवरी 2019 को हो चुकी है।

आप-कांग्रेस एका को बल: माकन का इस्तीफा

आशुतोष कांग्रेस- आप गठबध्ंान पर लिखते हैं–सच्चाई यह है कि आप में क्या कुछ होता है वह केजरीवाल ही तय करते हैं। वे पिछले एक साल से इस प्रयास में थे कि कांग्रेस के साथ आप का समझौता हो जाए। आप और कांग्रेस में गठबंधन की कोशिश दूसरी पार्टियों ने भी की। लेकिन इस काम में सबसे बड़ी बाधा थी कांग्रेस की दिल्ली इकाई। न्यूज पोर्टल में आशुतोष ने पिछले शुक्रवार को लिखा: ‘अजय माकन का इस्तीफाÓ।

कांग्रेस की दिल्ली इकाई पार्टी आलाकमान से कहती रही है कि यह आप से समझौता न करे क्योंकि इसके चलते राजधानी में यह अलोकप्रिय होती जा रही है। लोकसभा के पहले चुनावी तालमेल की अफवाहों का बाजार पिछले साल से गर्म है। माकन ने पिछले साल जून में कहा था- आप का कांग्रेस को तीन सीट देने का प्रस्ताव। इस पर मैंने केजरीवाल को लिखा था। जब दिल्ली के लोग केजरीवाल सरकार को लगातार नकार रहे हैं तो हमें उनकी मदद ही क्यों करनी चाहिए। आखिर केजरीवाल टीम को राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ समर्थक के  ही लोगों ने समर्थन दिया था। इन सब लोगों ने एक राक्षस बनाया जो मोदी सा था।

आशुतोष आगे लिखते हैं, इस समझौते से आप-कांग्रेंस गठबंधन दिल्ली में सातों सीटें जीत जाएगा। लेकिन यदि ऐसा न हुआ तो दोनों पार्टियों के   समान मतदाता मसलन मुस्लिम, दलित, झुग्गी-झोपड़ी वाले फिर सातों सीटों पर भाजपा को जीत दे देंगे। एक बार यह समझौता दिल्न्ली में अमल में आ गया तो पंजाब में भी 13 सीटों पर इसी तरह का समझौता होगा। जहां  कांग्रेस का राज है और विपक्ष में आप है। ऐसी स्थिति में आप-कांग्रेस मिल कर भाजपा को दो राज्यों में खासी चुनौती देंगी। ऐसी ही किसी संभावना के हरियाणा में होने से इंकार हीं किया जा सकता।

आशुतोष का यह भी कहना था कि गठजोड़ राजनीति राज्य नेतृत्व के लिए कड़वी गोली है। जिसके सामने कोई और चारा ही नहीं बनता कि वह आप में शामिल हो जाए। दोनों ही पार्टियों में तालमेल का खासा अनुभव रहा है। भले ही दिल्ली में 49 दिन की आप सरकार रही हो। इस बार फिर से दोनों एक साथ दिख सकते है।।

उत्तरप्रदेश में गठबंधन से दूर कांग्रेस

हालांकि कांग्रेसी सांसद समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सथ खड़े हुए जबकि सीबीआई ने अवैध खनन की जांच-पड़ताल में उनकी भूमिका जांची। बसपा की नेता मायावती ने भी अखिलेश को अपना और दल का साथ दिया। लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस बाहर रहेगी सपा-बसपा गठबंधन से ।

उत्तरप्रदेश में लोकसभा की सीटों पर कामयाब होगा गठबंधन!

उत्तरप्रदेश में कैराना, फूलपुर और गोरखपुर में बसपा-सपा तालमेल के कारण विपक्ष को जीत मिली। अब यह बिडंबना ही है कि जिस दिन बसपा सुप्रीमो मायावती और समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव में गठबंधन की घोषणा हुई उसी दिन सीबीआई ने राज्य में 2012 से 2016 के बीच हुई अवैध खनन के तहत सपा नेता अखिलेश यादव के खिलाफ जांच बिठा दी। पूरे देश में आम चुनाव को महज तीन महीनों से भी कम समय है। इस बीच जांच की इस कार्रवाई को राजनीति प्रभावित माना जा रहा है।

सीबीआई के अनुसार सपा नेता अखिलेश यादव की बतौर मुख्यमंत्री इस अवैध खनन में भूमिका क्या थी इसकी ही जांच करने का आदेश है। यादव इस दौरान मुख्यमंत्री थे और एक साल तक खदान मंत्रालय उन्हीं के अधीन था। सीबीआई की इस कार्रवाई पर अखिलेश यादव ने कहा, अवैध खदान का मामला पुराना है, फिर भी जांच के लिए मैं तैयार हूं। सत्ता पार्टी भाजपा संस्कृति और परंपरा सब भूल चुकी है और अब इसे भविष्य के लिए तैयार रहना चाहिए। हम कोशिश कर रहे हैं कि लोकसभा में हम ज़्यादा से ज़्यादा सीटें जीत सकें। हमें रोकने के लिए वे हम पर सीबीआई बिठा रहे हैं। यदि सीबीआई मुझ से सवाल -जवाब करती है तो मैं उन्हें जवाब दूंगा। लेकिन भाजपा को यह याद रखना चाहिए कि मैं उन्हें जवाब देने के लिए भी तैयार हूं। यादव ने कहा, इसके पहले कांग्रेस ने हमारे पीछे सीबीआई लगा दी थी और अब यह काम भाजपा ने किया है। मैं सीबीआई से पूरी तौर पर सहयोग करूंगा। अब मैं उन्हें बता दूंगा कि कितनी सीटों के अनुपात का हमारा आपसी समझौता है। यह अच्छा है कि भाजपा ने अपनी चाल, चलन और चरित्र की बानगी दे दी है। इससे हमें एक और मौका मिला है।

समाजवादी नेता अखिलेश यादव की ओर सहयोग का हाथ बढ़ाने वालों में बसपा की सुप्रीमो मायावती सबसे आगे थी। इसके बाद विपक्ष की दूसरी पार्टियां भी साथ हुई। इन सबने एक सुर में कहा कि सीबीआई जांच का यह नया अंदाज उसी कड़ी में है जिसमें विपक्ष के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों को पहले लगाया जाता था। एजेंसियों के अनुसार कांग्रेस को सपा-बसपा गठबंधन में शामिल नहीं किया गया था इसलिए कांग्रेस के मन में खटास है। लेकिन कांग्रेस ने अपने बयान में कहा है इन छापों पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा अखिलेश यादव पर छापे तब डाले जा रहे हैं जब सपा-बसपा गठबंधन हुआ। इसका अंदेशा तो था ही। जो भी भाजपा के खिलाफ आज बोलेगा उस पर छापे डाले ही जाएंगे। इसी तरह यह सरकार काम कर रही है। उधर भाजपा ने कहा कि जांच-पड़ताल की तो तयशुदा प्रक्रिया है उसके चलते केंद्रीय जांच एजेंसी नें अपना काम किया।

सीबीआई ने उत्तरप्रदेश और दिल्ली में 14 जगह छापे मारे और तलाशी ली साथ ही 11 लोगों के खिलाफ अपनी एफआईआर के तहत कार्रवाई की। अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक राज्य के मुख्यमंत्री थे। खनन मंत्रालय 2012 से 2013 के बीच उनके ही पास था। उसके बाद गायत्री प्रजापति ने मंत्रालय संभाला। उन्हें 2017 में चित्रकूट में एक महिला के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

सीबीआई के अनुसार जिन 11 लोगों के खिलाफ एफआईआर है, उनमें आईएएस अधिकारी बी चंद्रकला, समाजवादी पार्टी के एमएलसी रमेश कुमार मिश्रा और संजय दी़िक्षत (जो बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़े और हारे) शामिल हैं। इन पर हमीरपुर जिले में 2012-16 के बीच अवैध खनिज खनन के आरोप हैं। एफआईआर में दूसरे नाम हैं दिनेश कुमार मिश्र जो सपा के एमएलसी रमेश मिश्र के भाई हैं। राम आसरे प्रजापति (तब खदान क्लर्क), अंबिका तिवारी ( मिश्रा बंधुओं के संबधी ं), संजय दीक्षित के पिता सत्यदेव दीक्षित, राम अवतार सिंह (सेवा निवृत खदान क्लर्क), कर्ण सिंह (लीज होल्डर) और आदिल खान (अवैध एक्सकैबेटर) का काम तब के खदान मंत्री गायत्री प्रजापति की सिफारिश पर दिया गया था। गायत्री प्रजापति ने मंत्री पद संभाला था।

 उत्तरप्रदेश के हमीरपुर , जालौन, लखनऊ, नोएडा, और दिल्ली में छापों में साढ़े बारह लाख रुपए नकद, संपत्ति के दस्तावेज, 1.8 किलो सोने के गहने चंद्रकला, जो इन दिनों स्टडी टूर पर है, के घर से मिले। चंद्रकला को ‘लेडी दबंगÓ नाम से सोशल मीडिया में जाना जाता रहा है। वे 2008 के बैच की अधिकारी हैं। जब 2012-14 में वे हमीरपुर में जिलाअधिकारी थी। तो कथित तौर पर ई-टेंडर प्रक्रिया से खदान ठेके देने में उन्होंने अपने जिले सेे पक्षपात बरता। उस कथित अवधि में खनन मंत्रियों की भूमिकाओं की जांच आवश्यक है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश के ढाई साल बाद यह तीसरी एफआईआर दो जनवरी 2019 को पंजीकृत हुई थी।