ख़तरे की मुद्रा

नक़ली नोटों के मामले में 2021-22 में 10.7 फ़ीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गयी। इनमें से 2,000 रुपये मूल्य के नक़ली नोटों में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 2021-22 में 55 फ़ीसदी की वृद्धि हुई, जबकि 500 रुपये के नक़ली नोटों में 102 फ़ीसदी की। यह कोई अतिशयोक्तिपूर्ण अनुमान नहीं, बल्कि भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के आँकड़े हैं।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021-22 के दौरान बैंकिंग क्षेत्र में पाये गये भारत में मौज़ूद कुल नक़ली नोटों में से 6.9 फ़ीसदी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया में और 93.1 फ़ीसदी अन्य बैंकों में पाये गये। दरअसल, राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 2016 के बाद पिछले पाँच साल में ज़ब्त किये गये नक़ली नोटों को लेकर बताया कि 2020 में 8,34,947 नोट, 2019 में 2,87,404 नोट, 2018 में 2,57,243 नोट, 2017 में 3,55,994 और 2016 में 2,81,839 नोट ज़ब्त किये गये।

इससे पता चलता है कि नक़ली नोटों से वास्तविक ख़तरा कितना बड़ा है। दरअसल ये नक़ली नोट हू-ब-हू असली नोटों की तरह दिखते हैं और एक ही जैसे विशेष काग़ज़ पर छपे हुए प्रतीत होते हैं। इनमें सुरक्षा की वही विशेषताएँ दिखती हैं, जो केवल सरकारी प्रेस ही प्रदान कर सकती है। खोजी पत्रकारिता की अपनी परम्परा को जारी रखते हुए ‘तहलका’ की विशेष जाँच टीम ने इस बार की कवर स्टोरी के ज़रिये नक़ली नोटों के नेटवर्क और उसके तौर-तरीक़ों का भंडाफोड़ किया है। वास्तव में इंटेलिजेंस ब्यूरो की तरफ़ से पुलिस महानिदेशकों के एक सम्मेलन में भाग लेने वालों ने पकड़े गये नक़ली नोटों को हक़ीक़त में मौज़ूद नक़ली नोटों से कहीं कम बताया था।
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एक पूर्व चेयरमैन ने मज़ाक़ में मुझसे कहा था कि मेरे बटुए में जितने नोट हैं, उनमें से एक-तिहाई नक़ली हो सकते हैं। आजकल प्रचलन में नक़ली नोटों की गुणवत्ता कितनी अच्छी है, यह एक बैंकर की टिप्पणी से समझा जा सकता है, जिन्होंने कहा- ‘ऐसा लगता है कि नक़ली नोट उसी प्रेस में छपे हैं, जहाँ असली मुद्रा छपती है।’