क्या 2014 में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं? | Tehelka Hindi

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क्या 2014 में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

मुलायम सिंह यादव भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं. जितना लंबा समय उन्होंने भारतीय राजनीति को दिया है उसके मद्देनजर इसमें कोई बुराई भी नहीं है. उनका लंबा-चौड़ा राजनीतिक अतीत है, तीन-तीन बार वे देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लोकसभा में उनके पास 22 सांसद हैं, उनका बेटा उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे बड़े बहुमत की सरकार चला रहा है. अकेले मुलायम सिंह के परिवार में चार सांसद हैं. इस लिहाज से उनका प्रधानमंत्री पद के बारे में सोचना लाजिमी है.

लेकिन क्या सिर्फ इन आंकड़ों के सहारे उनका प्रधानमंत्री पद का दावा मजबूत माना जा सकता है? आंकड़े ये भी हैं कि 2004 में मुलायम सिंह के पास 35 सांसद थे. तब वे उत्तर प्रदेश की सत्ता में भी थे. इसके बावजूद यूपीए-एक की सरकार में अपने लिए एक सम्मानजनक जगह तक नहीं बना सके थे. 2004 में केंद्र की राजनीति में हाशिये पर धकेल दिए गए मुलायम सिंह यादव उस निराशा में पूर्व प्रधानमंत्री और वरिष्ठ समाजवादी नेता चंद्रशेखर से मिलने पहुंचे थे. चंद्रशेखर ने उन्हें सांत्वना के साथ यह कहकर साहस दिया कि हम तो इधर-उधर से चालीस सांसद जोड़कर प्रधानमंत्री बने थे आपके पास तो अपने चालीस सांसद हैं, निराश क्यों हो रहे हैं, आपका समय आएगा. मुलायम सिंह ने चंद्रशेखर की वह बात और प्रधानमंत्री पद की अपनी इच्छा, दोनों को गांठ में बांध लिया. पर उनके संघर्ष के दिन अभी खत्म नहीं हुए थे. 2009  का साल उनके लिए और बड़ी निराशा लेकर आया. यूपीए को 2004 से भी बड़ा जनमत मिला. मुलायम सिंह संसद में 22 सीटों पर सिमट गए. एक बार फिर उनकी इच्छा धरी रह गई. उनके पास यूपीए को मुद्दा-आधारित समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

असल में मुलायम सिंह की आशा-निराशा के बीज साल 1996 में छिपे हुए हैं. उस साल बनी संयुक्त मोर्चे की सरकार में देवगौड़ा से पहले ज्योति बसु और मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे. लेकिन तब उनके सजातीयों (शरद, लालू) ने उनका खेल खराब कर दिया था. बिल्ली और बंदर वाली कहानी की तर्ज पर यादवों की लड़ाई में देवगौड़ा ने बाजी मार ली थी. इस चूक की टीस और चंद्रशेखर का भरोसा मुलायम सिंह के मन में कायम है. 2012 में हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव ने उनकी उम्मीदों को नई परवाज दी है. देश एक बार फिर से उसी मोड़ पर खड़ा है जहां से मुलायम सिंह के लिए सात रेसकोर्स की राह निकल सकती है, यानी लोकसभा चुनाव. यूपी के इस क्षत्रप की गतिविधियां एक बार फिर से बढ़ गई हैं. मुलायम को भी पता है कि वे अपनी आखिरी कोशिश कर रहे हैं. लेकिन 2012 में अखिलेश यादव के सत्ता में आने के बाद से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में काफी बदलाव आए हैं. 90 के दशक के पूर्वार्ध से थम चुके सांप्रदायिक दंगों की एक नई बाढ़ इस दौरान प्रदेश में देखने को मिली है और मोदी के रूप में एक नए फैक्टर का उदय हुआ है. उधर युवाओं के बीच टैबलेट, लैपटॉप और भत्ते की एक नई राजनीति भी इस दौरान चल रही है और पिछड़ा राजनीति का एक नया अध्याय इसी दौरान मुलायम सिंह ने शुरू किया है. मुलायम सिंह की प्रधानमंत्री पद की संभावनाओं को आंकने के लिए उनकी राजनीति के तमाम कलपुर्जों की पड़ताल करना जरूरी है. वे कलपुर्जे जो मुलायम सिंह की उम्मीदों को बड़े पंख देते रहे हैं.

मुसलमान
मुसलमान मुलायम सिंह की राजनीति की सबसे मजबूत धुरी है. 1992 में रामजन्मभूमि-बाबरी विवाद के बाद से ही यह तबका मुलायम सिंह के साथ रहा है. 2009 तक इसका समर्थन एकमुश्त मुलायम सिंह के साथ ही रहा था. लेकिन 2009 में हालात बदल गए. उस साल हुए लोकसभा चुनावों में सपा का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार लोकसभा में नहीं पहुंच सका. इसकी कुछ वजहें थीं- कल्याण सिंह को सपा में शामिल करना, आजम खान को बाहर करना आदि. मुलायम सिंह यादव ने तत्काल ही इन खामियों को दूर करके एक बार फिर से मुसलमानों का विश्वास जीता. 2012 में उन्हें इसका नतीजा भी मिला. छिटका हुआ मुसलमान उनसे फिर से आ जुड़ा. पूर्व समाजवादी नेता और पत्रकार शाहिद सिद्दीकी के शब्दों में, ‘मुसलमान मुलायम से इसलिए नहीं जुड़ा है कि वे उसे बेहतर गवर्नेंस या तरक्की देते हैं, मुसलमान उनसे सिर्फ इसलिए जुड़ा क्योंकि वे उसे सुरक्षा का भरोसा देते थे.’

जिस बात से सिद्दीकी अपनी बात खत्म करते हैं, वहीं से मुलायम सिंह यादव की मुसीबतें शुरू होती हैं. जिस सुरक्षा के भरोसे मुसलमान मुलायम सिंह यादव के साथ जुड़ा था, वह बीते डेढ़ सालों के दौरान बुरी तरह से टूटा है. मुजफ्फरनगर के शाहपुर विस्थापित कैंप में रह रहे इमरान अहमद कहते हैं, ‘हम तो सोचते थे कि हमारी सरकार है. लेकिन ये भी भाजपा वालों की तरह ही हैं.’ मोहभंग की यही भावना सैकड़ों किलोमीटर दूर आजमगढ़ में रहने वाले शायर सलमान रिजवी की बातों से भी झलकती है, ‘कदम-कदम पर अपनी ही जमीन पर हमें शक की निगाहों से देखा जा रहा है और इसका सिलसिला बढ़ता जा रहा है. आज पूरी उस कौम के अंदर एक खौफ बैठ गया है जिसने आज़ादी के आंदोलन में अपने घरों को लुटवाया था. सिर्फ साठ सालों के अंदर देखते ही देखते उसको तोहमतों से ढक दिया गया है. पूरी कौम अपने को बेचारगी के आलम में फंसा महसूस कर रही है. लोगों के अंदर पुलिस और स्टेट का खौफ भर दिया गया है, अब हमें ऐसे राजनीतिक विकल्प को तलाशना और खड़ा करना होगा जो पूरी तरह सेक्युलर और ईमानदार हो.’

ये विचार अचानक से नहीं बदले हैं. उत्तर प्रदेश में 2012 में सपा की सरकार बनने के बाद से प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों की बाढ़ आ गई है. मुजफ्फरनगर में हुए हालिया दंगों के बाद से हालात सपा के हाथ से एकदम निकले हुए दिखाई देते हैं. यहां करीब 60 लोगों की मौत हुई है जिनमें 40 के करीब मुसलमान हैं. इमरान अहमद जैसे हजारों लोग आज भी अपनी जड़ों से उखड़ कर विस्थापन शिविरों में रहने को मजबूर हैं. मीडिया और सोशल मीडिया में आ रही विस्थापन की तस्वीरें बार-बार समाज को ठेस पहुंचा रही हैं और उन्हें हर दिन के साथ मुलायम से दूर और दूर ले जा रही हैं. जो भरोसा सपा हमेशा मुसलमानों को देती आई थी, वह टूट गया है. हालांकि सपा नेता कमाल फारुखी का यकीन कुछ और है, ‘लोकसभा चुनावों में अभी काफी वक्त है. नेताजी इतनी आसानी से मुस्लिमों को नाराज नहीं छोड़ेंगे. जल्द ही वे कोई न कोई रास्ता खोज लेंगे.’

मुलायम सिंह यादव रास्ता खोजने में लगे हुए हैं. 1993 के बाद से वे अपने हर चुनावी अभियान का श्रीगणेश खासी मुस्लिम आबादी वाले आजमगढ़ से करते रहे हैं. 14 सितंबर,1993 को अपने चुनावी अभियान की शुरुआत के साथ ही उन्होंने इस जिले को एक यादगार तोहफा दिया था, इसे  मंडल (कमिश्नरी) बना कर. तब वे लखनऊ से कमिश्नर को अपने साथ हेलिकॉप्टर में लेकर आए थे. बदले में इस इलाके की बड़ी मुस्लिम और यादव आबादी ने भी लगातार मुलायम सिंह का साथ दिया. आज भी आजमगढ़ से उनके नौ विधायक और एक सांसद है. इस बार भी उन्होंने यहीं से अपने अभियान की शुरुआत की. लेकिन इस बार नजारा अलग था. मुलायम सिंह की चुनावी रैली में एक लाख के करीब लोग इकट्ठा हुए. लेकिन उनकी राजनीति के लिए सबसे अहम मुसलमान इस सभा से पूरी तरह नदारद थे. यह नदारदगी मुजफ्फरनगर की नाराजगी है. सिद्दीकी कहते हैं, ‘अब मुसलमान आंख बंद करके मुलायम को वोट नहीं देगा. वो स्ट्रैटेजिक वोटिंग करेगा. अब ये उम्मीदवार पर निर्भर करेगा. उसकी पहली पसंद बीएसपी या कांग्रेस होगी.’

अगर ऐसे हालात बनते हैं तो मुलायम सिंह का ख्वाब एक बार फिर से टूट जाएगा. उत्तर प्रदेश में देश की सबसे घनी मुस्लिम आबादी, लगभग 19 फीसदी, रहती है. बिना इनके शत-प्रतिशत सहयोग के मुलायम सिंह दिल्ली नहीं पहुंच सकते. वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान बताते हैं, ‘मुजफ्फरनगर और इस दौरान हुए तमाम दंगे सपा के लिए काउंटर प्रोडक्टिव हो गए हैं. ये तभी दिल्ली पहुंच सकते थे जब इन्हें मुसलमानों का पूरा वोट मिल जाता. आज की तारीख में इन्हें मुसलमान वोट नहीं दे रहा है. मुलायम सिंह को लग रहा है कि मुजफ्फरनगर का असर सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होगा. यह उनकी गलतफहमी है.’

सरकती जमीन का अहसास नेताजी को भी है, इसीलिए उन्होंने आजमगढ़ की सभा में मंच पर पीछे की कतार में बैठे अबू हाशिम आजमी को एक अतिरिक्त कुर्सी लगवाकर आगे की कतार में अपने साथ बिठाया. अपने संबोधन में नेताजी ने बार-बार आजम खान का जिक्र किया. बदले में आजम खान ने भी एक बार फिर से मुलायम सिंह को रफीकुल मुल्क (देश की धरोहर) की उपाधि दी. लेकिन जिस तबके को लेकर यह सारी रस्साकशी चल रही थी वह तबका ही इस सभा से नदारद था.

यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग
मुलायम सिंह की राजनीतिक सफलता के सूत्र उनकी जातीय और धार्मिक समीकरणों को गहराई से समझने और उन्हें साधने की चमत्कारिक प्रतिभा में छिपे हैं. मुसलमानों के छिटकने की हालत में भी यादव तबका काफी हद तक मुलायम सिंह के साथ बना रहेगा. पर इसमें भी कुछेक कारणों से सेंध लग सकती है. पहली वजह हो सकती है मोदी से मिलने वाली चुनौती और दूसरी हाल के कुछ सालों में तैयार हुआ युवा वोट बैंक. यादवों में युवा वोटरों की एक बड़ी संख्या आज ऐसी है जो जात-बिरादरी से ज्यादा मोदी के बहाव में है. गोरखपुर की पिपराइच विधानसभा से आजमगढ़ की सभा में आए 20 वर्षीय महाबली यादव से हुई छोटी-सी बातचीत पर ध्यान दीजिए-

तहलका- मुलायम सिंह का भाषण सुना आपने. कैसा लगा?
महाबली यादव- ठीक था.
तहलका- तो अगले चुनाव में इन्हें वोट देंगे या नहीं?
महाबली यादव- वोट के बारे में अभी सोचा नहीं है.
तहलका- किसी को देने का मन तो होगा?
महाबली यादव- मोदी को भी दे सकते हैं. इस समय तो वही सबसे बढ़िया नेता है जो देश को बचा सकता है.
तहलका- क्यों मुलायम सिंह क्यों नहीं…
महाबली यादव- मोदी के सामने ये लोग कुछ नहीं हैं.

यह विचार पूर्वी उत्तर प्रदेश के उस युवा यादव वोटर का है जिसे अब तक मुलायम सिंह का घनघोर सहयोगी माना जाता था. इन्हीं के सहारे मुलायम सिंह ने ‘माई’ का अकाट्य फॉर्मूला ईजाद किया था. यादवों के मन में सपा के प्रति आई नाराजगी की एक वजह शरत प्रधान और बताते हैं, ‘जिस तरह से उत्तर प्रदेश में सरकार बनने के बाद परिवार को आगे बढ़ाने की कोशिश हुई है उससे भी यादवों में एक तरह की निराशा है. आम यादवों के काम बिना पैसा दिए हो नहीं पा रहे. उनमें तेजी से यह भावना पैठ बना रही है कि यह सरकार कहने को उनकी सरकार है पर बिना पैसे दिए किसी की सुनवाई यहां नहीं हो रही. इसके बावजूद ये नहीं कह सकते कि यादव मुलायम सिंह से पूरी तरह विमुख हो जाएगा.’

यादवों की नाराजगी और इससे हो सकने वाले नुकसान का इल्म मुलायम सिंह और पार्टी को है. लिहाजा मुलायम सिंह ने सामाजिक न्याय के फॉर्मूले को एक नई धार देने की कोशिश की है. केंद्र सरकार को भेजे गए एक संस्तुति पत्र के माध्यम से उत्तर प्रदेश सरकार ने ओबीसी में शामिल 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की मांग की है. इन जातियों में कहार, कश्यप, केवट, मछुआ, मल्लाह, निषाद, कुम्हार, प्रजापति, धीवर, बिंद, भर, राजभर, बियार, बाथम, गोंड, तैरहा आदि शामिल हैं. स्वयं मुलायम सिंह यादव ने इस राजनीति को धार देने के लिए पूरे प्रदेश में दो रथयात्राओं की शुरुआत की है. यह उसी तर्ज की राजनीति है जिसका प्रयोग बिहार में नीतीश कुमार ने महादलित के रूप में एक नया वोटबैंक अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए किया था. ये वे पिछड़ी जातियां हैं जो आम तौर पर सपा से दूर रही हैं और परंपरागत रूप से भाजपा-बसपा को वोट करती रही है. अगर मुलायम सिंह का यह दांव सफल रहता है तो निश्चित रूप से वे अपने और पार्टी के लिए एक नया वोटबैंक खड़ा करने में सफल रहेंगे. उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों में शामिल इन 17 जातियों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा ही है.

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