क्या वाकई है राहुल फोबिया?

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राहुल गांधी जनसभाओं में अब बहुत अच्छा बोलते हैं। मुद्दों को असरदार तरीके से रखते हैं। हिंदू समाज में खुद के हिंदू होने पर फैलाए भ्रम को दूर करने के ढ़ेरों जतन करते हैं। देश की जनता को याद दिलाते हैं आज़ादी की लड़ाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का योगदान बताते हैं। साथ ही हौसला देते हैं देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए, वे नया भारत, नया हिंदुस्तान बनाएंगे।

राहुल गांधी को लोग बड़े ध्यान से सुनते हैं। क्योंकि वे देश के भविष्य हैं। उस देश के जो हजारों साल से सभी जातियों, वर्गों और संप्रदायों का रहा है। राहुल उसे वैसा ही बनाए रखते हुए देश की अर्थव्यवस्था और विकास के बीच तालमेल बनाना चाहते हैं। मुद्दों की कमी के चलते विपक्ष बार-बार उन्हें हिंदू होने का प्रमाण देने और देश के सबसे बड़े कुनबे का उत्तराधिकारी होने के नाते उन सवालों में घसीटता है जिनसे उनका कोई लेना देना नहीं। यह देखना अनोखा है कि राहुल किस तरह से एक पुरानी पार्टी में नए और पुरानों को संग लेकर एक नई पहल कर रहे है, वह बेजोड़ है।

कांग्रेस में नई जान फूंकने वाले राहुल गांधी ने तीन साल पहले अपनी कोशिशों से भूमि अधिग्रहण बिल को रुकवा दिया था। गुजरात चुनावों के ऐन पहले उन्होंने जीएसटी के गलत कानूनों में बदलाव करने पर सरकार को बाध्य कर दिया था। वे कांग्रेस के ऐसे बड़े नेता हैं जो जनहित में फैसले लेते हैं। उनके काम को जनता में सराहना भी मिलती है। लेकिन उनकी अपनी पार्टी के नेताओं में परिवार के लोगों को टिकट दिलवाने की होड, मौका मिलते ही दल बदल का जो इंतजार दिखता है वह बताता है कि राहुल के अच्छे प्रयासों को जनता के बीच वरिष्ठ नेता ज़्यादा पहुंचना नहीं चाहते। जबकि जीएसटी, रोजगार में कमी, रोज-व-रोज पेट्रोल -डीजल की दरों में बढ़ोतरी, देश के विभिन्न राज्यों में बिगड़ती कानून व्यवस्था और बढ़ती महंगाई ऐसे मुद्दे हैं जो जनता में कांग्रेस की याद को जिंदा रखते हैं।

देश में 1947 से 2014 तक 296 अरब डालर का कजऱ् था। चार साल के अंदर 2018 में अब यह 486 अरब डालर हो गया है। भारत का यह विकास है। पिछले चार साल में अयोध्या में राम मंदिर, लव जिहाद, मॉब लिंचिंग और सांप्रदायिक दंगों की बातें सुनाई देती रही हैं। जो भी विकास घोषणाएं हुई है वे पिछली सरकारों के राज में बनी योजनाएं हैं जिनका श्रेय सत्ता पार्टी ने लिया।

बहत्तर साल का एक गरीब देश जब अपने देश की बुनियादी ज़रूरतों मसलन आर्थिक बदहाली, अशिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य शिक्षा पर ज़रूरी खर्चों की बजाए देश की सीमाओं की रक्षा के नाम पर भारी खर्च करता है तो लोकतांत्रिक देश मेें सवाल उठने लाजिमी है।

राहुल गांधी ने राफेल सौदे का मुद्दा उठा कर सत्ता पक्ष को काफी बेचैन कर दिया है। बोफर्स मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उठाया था। उसे उठाती रही है सत्ता पार्टी लेकिन मुख्यधारा की मीडिया के साथ के बावजूद बात बन नहीं रही। क्योंकि बोफर्स सौदे से कहीं बड़ा मामला है राफेल सौदे का। यह तथ्य जनता भी जानती है।

सत्ता पार्टी का अब कथित तौर पर बड़े व्यावसायिक घरानों के साथ जबरदस्त राजनीतिक आर्थिक समझौता हो गया है। इसके चलते उसे पैसों की आज कोई कमी नहीं है। जबकि कांग्रेस के पास आज पैसों की कमी है और इसे अपनी जनसभाओं में धनसंग्रह भी करना पड़ रहा है। जनसभाओं और चुनाव रैलियों से धनसंग्रह में कांग्रेस पहले की तुलना में आज जनमानस के ज़्यादा करीब है। इसके साथ जनता की सहानुभूति है।

कांग्रेस ने महिलाओं उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व देने की घोषणा कर एक बड़ी राजनीतिक चल चली है। सत्ता पार्टी के पास बड़ी तादाद में महिलाएं तो है पर पार्टी अभी हिम्मत नहीं कर पा रही है कि उनके जरिए चुनावी रण में उतरना ठीक है या नहीं। यह ऊहापोह जताती है कि सत्ता पार्टी किस हद तक महिलाओं पर भरोसा कर पाती है।

राहुल गांधी निजी तौर पर अमरनाथ यात्रा पर गए। वे कहते हैं कि यह उनका निजी मामला है। हालांकि वे ब्राहमण और हिंदू परिवार के है। उनके आराध्य देव महादेव हैं और इसलिए वे उनके धाम भी गए। उनके इस फैसले से सत्ता पार्टी को इतनी बेचैनी हुई कि उनके अपने रणनीतिक सांसद अब उत्तरप्रदेश में हिंदू स्वाभिमान रैली पर निकल रहे हैं। अब ‘सबका साथ, सबका विकासÓ सिर्फ शब्दिक जाल सा जान पड़ता है क्योंकि सारी कोशिशें पूरे देश को सांप्रदायिक रंगों में बांट कर चुनाव लडऩे की हैं।

अमरनाथ यात्रा से लौटते ही राहुल को दक्षिण में तेलंगाना , मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में जाड़ों में कांग्रेसी शिविरों में गर्माहट पैदा करनी होगी। परिवर्तन की पुकार में अपनी बूढ़ी होती टीम और नई युवा टीम को सक्रिय करना होगा। तब कहीं ये नया भारत, नया हिंदुस्तान सब समान को सत्ता कीे ओर बढ़ा हुआ दिखा सकेंगे।