क्या नहीं बाज़ार में

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बाजार में तरह-तरह के आकर्षण हैं। कइयों के भाग्य के साथ दिया तो तकदीर भी बदल सकती है। लोगों को नीचे गिराने और उठाने का काम भी बाजार में उस्ताद लोग करते ही हैं। एक तरह से दुनियादारी की एक झलक पाने के लिए बाजार को देखना-जानना बहुत ज़रूरी है।

भारत में बाजार उस तरह विकसित नहीं है जिस तरह अमेरिका या यूरोप में। अंग्रेजी में हालीवुड की एक फिल्म वह इसी नाम से कभी आई थी उसी अंदाज में पर काफी अलग सी यह फिल्म है। दोनों फिल्मों में एक शब्द एक सा है वह है लालच। रु पयों, हसीनाओं, कारों आदि आदि की जीवन में बहुलता इस फिल्म से दर्शकों को बांधती है। इस जबर्दस्त फिल्म मेें भी गरीब के अमीर होने और फिर अमीर से टकराव की दिलचस्प कहानी है। इसमें तेज भागती कारें, आपको अदाएं दिखलाती हसीनाएं हैं और फिर है धूम-धड़ाक।

स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव की तरह जि़ंदगी को काफी करीब से जान-परख रहे सैफ अली खान हैं। जो दांव पर पैसा लगाते हैं। उनका फिल्मी नाम शगुन कोठारी है। वहीं इलाहाबाद से आया एक युवा नौजवान रोहन मेहरा है। उसमें हौसला है अपनी मुट्ठी में दुनिया को करने का। उसे अनुमान है कि क्या होती है भूख। दर्शक भी चाहता है कि टकराव हो। ऐसे हालात फिल्म में कहानी के अनुसार बनते जाते हैं।

धंधा या कारोबार, शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव के अनुसार पुश्तैनी से आधुनिक होते जाते हैं। वैसे ही सारे तौर-तरीके भी। रेस में दौड़ते घोड़ों की तरह भ्रष्ट राजनीतिक खुद को धन बल व चाणक्य नीति से लैस मानते हुए सड़क किनारे चित हो जाते हैं और चैंपियन होता है वही जो धन-धान्य से परिपूर्ण है। यह फिल्म ज़रूर देखें और बाजार में अपनी आस्था रखें।