केरल, बंगाल और त्रिपुरा में वामपंथ को भारी धक्का, माना माकपा ने

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1928

लोकसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 2014 के मुकाबले ज़्यादा सीटें मिली हैं। यह उनके पक्ष में निर्णायक जनादेश है। पिछले पांच साल के दौरानभाजपा ने जो दक्षिणपंथी हमला छेड़ा था उसे इस जनादेश ने पुख्ता किया है। यह बात माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी की तीन  दिन तक चली बैठकके बाद जारी विज्ञप्ति में कही गई है। पार्टी ने माना कि पुलवामा तथा बालाकोट के बाद भाजपा लोक आख्यान को रोजी-रोटी के उन अनेकानेक मुद्दों से दूर करने मेंसफल रही है जो एनडीए सरकार के पिछले पांच सालों ने थोपे थे।

सांप्रदायिक राष्ट्रवादी उन्मत्तता के इस आख्यान को बनाने में, अनेकानेक कारकों के योग से गढ़ी गयी मोदी की छवि ने मदद की थी। मीडिया के कुछ हिस्से इसतरह की प्रस्तुति के साझीदार बन गए। इस चुनाव में धनबल का अभूतपूर्व इस्तेमाल हुआ। चुनावी बांडों के जरिए भाजपा को भारी रकमें दी गयी थीं। चुनाव आयोगकी भूमिका ने इन सब को बढ़ाने वाले कारक का काम किया।

विपक्षी पार्टियां

अधिकांश विपक्षी पार्टियों  को इन चुनावों में भारी धक्का लगा है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा कुछ ही अन्य राज्यों की पार्टियां इसका अपवाद रही हैं।

विपक्षी पार्टियां खासतौर पर कांग्रेस, धर्मनिरपेक्ष विपक्षी पार्टियों की एकता कायम करने में विफल रहीं, जिसकी चुनाव की पूर्वबेला में बात हो रही थी। सांप्रदायिकहमले के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत करने के लिए अभियान नहीं चलाया गया। कट्टर हिंदुत्व का जवाब, नरम हिंदुत्व नहीं है। हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता केबीच विचारधारात्मक लड़ाई ताकत के साथ नहीं चलायी गयी।

सीपीआई(एम) और वाम को गंभीर धक्का

सीपीआई(एम) तथा वामपंथ को खासतौर पर अपने गढ़ केरल, पश्चिम बंगाल तथ त्रिपुरा में गंभीर धक्का लगा है।

पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा दोनों में भारी तनाव तथा हिंसा के वातावरण में चुनाव हुए थे। ऐसी हिंसा में बंगाल में सीपीआई(एम) के पांच और त्रिपुरा में एक कार्यकर्ताकी जान गयी है। त्रिपुरा पश्चिमी लोकसभाई क्षेत्र में तथा त्रिपुरा में डायमंड हार्बर लोकसभाई क्षेत्र में चुनाव में बहुत हद तक धांधली हुई थी जबकि अन्य अनेकलोकसभाई क्षेत्रों में भी चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए। चुनाव आयोग ‘स्वतंत्र तथा निष्पक्षÓ चुनाव कराने का अपना वादा पूरा नहीं कर सका।

केंद्रीय कमेटी ने तीनों  राज्य कमेटियों द्वारा की गयी आरंभिक समीक्षा पर चर्चा की। मतदान-केंद्रवार विस्तृत समीक्षा जारी है, जिसके आधार पर अंतिम रूप सेचुनाव के अनुभवों का आकलन किया जाएगा।

इन चुनावों में सीपीआई(एम) ने भाजपा तथा उसके सहयोगियों को हराने का, संसद में वामपंथ की ताकत बढ़ाने का और केंद्र में एक वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकारबनाने का आहवान किया था। इस जनादेश ने इन सभी लक्ष्यों को ठुकरा दिया है

केरल में मतदाताओं को लगा कि कंाग्रेस ही एक वैकल्पिक धर्मनिरपेक्ष सरकार बनाने के लिए बेहतर स्थिति में होगी। इसका नतीजा यह हुआ कि धर्मनिरपेक्षविचार के लोगों तथा अल्पसंख्यंकों के एक हिस्से ने उनके पक्ष में वोट डाला। हालांकि एनडीए की सरकार सबरीमाला के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लागूकरने के लिए बाध्य थी, फिर भी इस मामले में उसके सही रुख का इस्तेमाल कर भाजपा तथा यूडीएफ ने आस्थावानों के एक हिस्से के मन में शिकायतें पैदा कर दीं।पार्टी इन तबकों को फिर से अपने साथ लाने के सभी प्रयास करेगी।

पश्चिम बंगाल में ये चुनाव बहुत ही ध्रुवीकृत माहौल में हो रहे थे।  मीडिया ने एक द्विध्रुवीय आख्यान रचने में बहुत भारी भूमिका अदा की और इसने तृणमूल कांग्रेसऔर भाजपा के बीच ऐसे ध्रुवीकरण में मदद की। सांप्रदायिक रंग से रंगे चुनाव अभियान ने मतदाताओं का और ज़्यादा ध्रुवीकरण कर दिया। तृणमूल कांग्रेस केखिलाफ बहुत भारी शासक विरोधी भावना थी। सीपीआई(एम) तथ वामपंथ के लोग विकल्प की तरह नहीं देख पा रहे थे और इसके चलते हमारे परंपरागतमतदाताओं का एक हिस्सा खिसक गया। भाजपा विरोधी और टीएमसी विरोधी वोट को एक जुट किए जाने के वामपंथ के प्रस्ताव को स्वीकार करने से कांग्रेस केइंकार ने इस ध्रुवीकरण और बल दिया।

त्रिपुरा में दो में से एक सीट मोटे तौर पर धांधली का शिकार हुई। अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित दूसरी सीट पर जिस पर भाजपा को जीत मिली है, कांग्रेस दूसरेनंबर पर आयी है।

 इन दोनों राज्यों में भी पार्टी कमेटियां हमारे परंपरागत समर्थन आधर में गिरावट का ईमानदारी से आकलन कर रही हैं और इन तबकों को दोबारा पार्टी के साथलाने के लिए फौरन उठाने वाले कदम तय करेंगी। इन मजबूत गढ़ों के बाहर, तमिलनाडु में सीपीआई(एम) ने डीएमके पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन के हिस्से के तौरपर लड़ी दोनों सीटें  स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा था। महाराष्ट्र में डिंडोरी  में सीपीआई(एम) को 1,09,570 वोट मिले हैं जो अन्य राज्यों में उसकी लड़ी दूसरी सभी सीटोंमें से सबसे ज़्यादा हैं।

ओडिशा राज्य विधानसभा के चुनाव में सीपीआई(एम) ने बोनाई सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा है। इस बार उसे पिछले चुनाव से 20 हजार ज़्यादा वोट मिले हैं।

केंद्रीय कमेटी ने दर्ज किया है कि पार्टी की स्वतंत्र शक्ति और उसकी राजनीतिक हस्तक्षेप की क्षमतााओं में गिरावट जारी है। केंद्रीय कमेटी ने इस  तरह के रुझानको गहरा करने में योग दे रहे विभिन्न कारकों पर चर्चा की और इस गिरावट को रोकने तथा पलटने के लिए पार्टी द्वारा उठाए जाने वाले फौरन ज़रूरी सांगठिनकतथा राजनीतिक कदम तय किए।

चुनाव के बाद आने वाली चुनौतियां

केंद्रीय कमेटी इस निष्कर्ष पर  पहुंची कि देश और जनता को, भाजपा की इस निर्णायक जीत से निकलने वाली सिर पर आने वाली चुनौतियों का सामना करने केलिए खुद को तैयार करना चाहिए। केंद्रीय कमेटी ने ऐसी चार चुनौतियों को दर्ज किया।

भाजपा ने यह निर्णायक जीत पैसे की अभूतपूर्व ताकत और अंतरराष्ट्रीय तथा घरेलू कार्पोरेट के पूर्ण समर्थन के आधार पर हासिल की हैं। बड़ी पूंजी तथा अमीरो जानातय है। पार्टी, ऐसे आर्थिक हमलों के खिलाफ संघर्षों में जनता के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सों को गोलबंद करने के लिए पहल करेगी।

हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सुदृढ़ीकरण , धार्मिक तथ भाषायी अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले और उनकी सुरक्षा चिंताओं के तथा आजीविका के हालातबदतर होने की ओर ले जाएगा। हमारे संविधान में प्रतिष्ठापित धर्मनिरपेक्षता की हिफाजत करने तथा उसे मजबूत करने को पार्टी हाथ में लेगी और इन संघर्षों मेंजनता के बड़े तबकों को खींचेगी।

 पिछले पांच साल में सभी संवैधानिक संस्थाओं में आरएसएस की जो घुसपैठ हुई है, उसका अब और तेज किया जाना तय है। यह ऐसी संस्थाओं को कमजोर किएजाने की ओर ले जाएगा ताकि ”हिंदू राष्ट्र” की आरएसएस की विचारधारात्मक परियोजना में, हमारे संवैधानिक गणराज्य के रुपांतरण को सुगम बनाया जा सके।सीपीआई(एम) इन संघर्षों में साथ आने को तैयार दूसरी सभी ताकतों को साथ लेकर, सभी संवैधानिक सत्ताओं की हिफाजत तथा उन्हें मजबूत करने की अगुआईकरेगी।

 भारत में एक ”सीक्योरिटी” स्टेट कायम करने की मांग भाजपा इस जीत के केंद्र में थी। व्यक्तिगत अधिकारों पर और खासतौर पर असहमति के अधिकार परहमला तेज हो जाने वाला है। इसके अनिष्टकर संकेत अभी से सामने आने शुरू हो गए हैं। इस या उस बहाने से दलितों तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ निजीसेनाओं के हमले और तेज  हो जाने वाले हैं। यह खोज-खोज कर उत्पीडऩ की ओर ले जाएगा। इन चुनौतियों का सीधे-सीधे सामना करने के लिए सीपीआई(एम) हमारी जनता के उन व्यपकतम हिस्सों को गोलबंद करने के लिए पहल करेगी जो जनतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं से प्यार करते हैं।

फौरी काम और कदम

केंद्रीय कमेेटी ने पार्टी को लगे इस धक्के से पैदा हुए गंभीर हालात का सामना करने के लिए अनेक कदमों तथा कामों को तय किया है।

जनता के साथ रिश्तों को गहरा करने के लिए ओर विभिन्न मोर्चों की गतिविधियों को मजबूत करने के लिए ठोस कदम तय किए गए हैं।

रोजीरोटी के मुद्दों के संघर्षों को अनुसूचित जातियों, जनजातियों अल्पसंख्यकों तथा महिलाओं के सामाजिक उत्पीडऩ के खिलाफ संघर्षों के साथ जोडऩे पर खासध्यान दिया जाएगा।

पार्टी संगठन तथा उसके काम-काज के संबंध में 2015 में कोलकाता में हुए पार्टी प्लेनम में जो महत्वपूर्ण फैसले लिए गए थे। उनके अमल की पार्टी समीक्षा करेगी।इस समीक्षा के आधार पर जिसे राज्यों द्वारा अगस्त के आखिर तक पूरा कर लिया जाएगा, पार्टी को मज़बूत करने और उसके कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने केलिए ,आगे का रास्ता तय किया जाएगा।

इन चुनावों का अनुभव दूरगामी चुनाव सुधारों की ज़रूरत दर्शाता है। इसमें चुनाव आयोग में सुधार तो तत्काल ज़रूरी है। सीपीआई(एम) राजनीतिक इंद्रधनुष केसाथ आने को तैयार सभी रंगों को यह सुनिश्चित करने के लिए गोलबंद करेगी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक कोलीजियम द्वारा कीजाए, न कि तत्कालीन सरकार द्वारा।

ईवीएम की निष्पक्षता के संबंध में विभिन्न शिकायतों और इन मशीनों के साथ संभव छेड़छाड़ के संदेहों के सिलसिले में सीपीआई(एम) संबंधित रिपोर्टों का अध्ययनकरेगी और अन्य राजनीतिक पार्टियों के साथ परामर्श कर भविष्य की कार्य दिशा तय करेगी।

केंद्रीय कमेटी ने चुनाव के बाद धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी डा. राम पुनियानी को दी गयी धमकियों की निंदा की।

केंद्रीय कमेटी ने अनुसूचित जनजाति  की युवा पोस्ट ग्रेजुएट मैडीकल छात्रा डा. पायल तडवी की आत्महत्या पर शोक जताया। वह जातिगत उत्पीडऩ के चलतेआत्महत्या करने पर मज़बूर हो गयी। महाराष्ट्र सरकार को दोषियों के खिलाफ और इस तरह के घृणा अभियानों को पैदा करने वाले के खिलाफ कड़ी कार्रवाईकरनी चाहिए।