केंद्र बनाम ममता, दावा अपनी-अपनी नैतिक जीत का

देश की सर्वोच्च अदालत ने पश्चिम बंगाल में तनाव को फिलहाल खत्म कर दिया। वहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र के बीच तकरार चल पड़ी थी जब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई और राज्य पुलिस के बीच टकराव हो गया था। इस पर पेश है अदिती चहार की रिपोर्ट

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आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय के दखल से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र सरकार के बीच चल रही जंग कम से कम अभी के लिए खत्म हो गई। इसके साथ ही पुलिस आयुक्त एक तटस्थ स्थान पर सीबीआई जांच में शामिल हो गए है। इससे दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी नैतिक जीत का दावा करने का अवसर प्राप्त हो गया है। इसके साथ ही ममता ने भी अपना आक्रमक रूख खत्म करते हुए धरना खत्म कर दिया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कोलकता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार को सीबीआई के साथ एक तटस्थ स्थान शिलांग में पूरा सहयोग करने का आदेश दिया और साथ ही सीबीआई को भी उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करने से रोक दिया।

ममता बनर्जी और केंद्र के बीच जंग तीन फरवरी 2019 को उस समय शुरू हुई जब लोकसभा चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं। इस समय सर्वोच्च न्यायालय हर उस स्थान पर चल रही सीबीआई जांच पर ध्यान दे रहा है जहां इस प्रकार का तनाव हो।

कोलकता में गुस्से से भरी ममता ने ‘संविधान बचाओ’ के नाम पर रात्रि से ही धरना शुरू कर दिया। इसके कारण भाजपा नेताओं को मौका मिल गया राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करने का। उधर विपक्षी नेता ममता के साथ आ गए। एक झटके में यह कार्रवाई विपक्षी एकता की धुरी बन गई और ममता इसका केंद्र बिंदु। क्या यह केंद्र का ‘स्वंय गोल’ था या उसकी जीत? इस प्रश्न पर लंबे समय तक बहस चलती रहेगी। इसका लाभ निश्चित तौर पर ममता को मिला है। कांग्रेस, आप, समाजवादी पार्टी, बीएसपी, एनसीपी और यहां तक कि नेशनल कांफ्रेस ममता की मदद के लिए आ गए। दुख की बात है कि लोगों की स्मृति कमज़ोर होती है, पर इतनी भी नहीं कि ऐसी घटना को भूल जाए जिसने समूचे विपक्ष को एक कर दिया। ममता ने इसे ‘संविधान का पूरी तरह टूटना बताया। उन्होंने सीबीआई से सवाल उठाया – ”आपने बिना वारंट पुलिस आयुक्त के घर जाने की जुर्रत कैसे की?’’

ममता ने कहा  कि यह सत्यग्रह है और मैं इसे जारी रखूंगी। तब तक जब तक देश सुरक्षित नहीं हो जाता। वे केंद्रीय कोलकता के प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थान पर पूरी रात बैठी रहीं। उनके साथ शहर के पुलिस प्रमुख राजीव कुमार थे। उन्होंने रात का खाना नहीं खाया और पूरी रात जाग कर बिताई। उन्होंने ताना मारते हुए कहा,”हमें न्यायापालिका, मीडिया और लोगों पर पूरा भरोसा है। यदि वे राष्ट्रपति शासन लगाना चाहते हैं तो लगाएं । हम इसके लिए तैयार हैं’’।

इस झगड़े की जड़ उस जांच में है जो जांच राजीव कुमार ने शारदा और रोज़ वैली पोंजी के मामलों में की थी। आरोप है कि बाद में उनके कई दस्तावेज़ गायब हो गए। छानबीन करने के लिए राजीव कुमार को बुलाया भी गया था। अदालत ने राजकुमार की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और उन्हें आदेश दिया कि वे जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करें। यह सब उस झगड़े के बाद हुआ जिसमें ममता ने कोलकता में राजीव से बात नहीं करने दी थी। तृणमूल कांग्रेस मेघालय के समन्यवक और राजीव कुमार के वकील विश्वजीत देव ने बताया कि राजीव सीबीआई के साथ पूरी तरह सहयोग कर रहे हैं।

कुमार की भूमिका पर इसलिए सवाल उठे क्योंकि वे विशेष जांच दल (एसआईटी) के प्रमुख थे जिसने उपरोक्त दोनों मामलों की जांच की थी। बाद में यह जांच सीबीआई को दे दी गई। सीबीआई का कहना है कि जब जांच उन्हें दी गई उस समय राजीव ने कई दस्तावेज उन्हें नहीं दिए थे। भाजपा का आरोप है कि उन दस्तावेजों में सत्ताधारी दल के लोगों के नाम शामिल थे।इनमें कुछ ऐसे भी थे जो मुख्यमंत्री के भी काफी नज़दीक थे। इस समय सीबीआई कुणाल घोष के 91 पन्नों के पत्र के आधार पर जांच कर रही है। घोष को तृणमूल कांग्रेस ने बर्खास्त कर दिया था।

 कोलकता में झगड़ा उस समय शुरू हुआ जब सीबीआई की टीम पुलिस आयुक्त के पास गई लेकिन स्थानीय पुलिस ने उन्हें अंदर नहीं घुसने दिया। इसके बाद वह दल थाने गया। ममता का कहना है कि समस्या उस समय शुरू हुई जब उनकी  23 विपक्षी दलों की एक ज़ोरदार रैली पिछले महीने कोलकता में हुई। इससे केंद्र सरकार घबरा गई। उधर प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल सरकार ‘ट्रिपल – टी’ – तृणमूल, तोलबाजी, टैक्स के द्वारा मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को कुचल रही है। इसके बाद बाबुल सुप्रीयो ने राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की थी।

ममता और केंद्र की लड़ाई का नतीजा यह निकला कि विपक्षी नेता अरविंद केजरीवाल, तेजस्वी यादव, लालू यादव, उमर अब्दुल्ला, और एख्डी देवगौड़ा ने अपना खुला समर्थन ममता को दे दिया।