किसान आन्दोलन कोरोना से नहीं डिगेंगे किसान

कोरोना वायरस का संक्रमण जिस तेज़ी से फैल रहा है, उसी तेज़ी से किसान आन्दोलन की ख़बरें दबी हैं। लेकिन किसान आन्दोलन क़रीब नौ महीने से दिल्ली के सभी सीमाओं पर जारी है। पिछले साल से अब तक कोरोना वायरस का भय भी किसानों के मज़बूत इरादों को नहीं डिगा सका है और वो लगातार कृषि क़ानूनों के ख़लाफ़ आन्दोलन कर रहे हैं। पिछले दिनों यह ख़बरें भी उड़ी थीं कि किसान आन्दोलन ख़त्म हो गया है। यह भी कहा गया कि किसान कृषि क़ानूनों का विरोध नहीं कर रहे हैं, विरोध करने वाले बिचौलिये हैं, जिनकी काली कमायी इन क़ानूनों से बन्द हो जाएगी। लेकिन किसानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर बारिश, सर्दी और गर्मी झेली है और आज भी अपनी जान पर खेलकर दिल्ली के सिंघु बॉर्डर, टीकरी बॉर्डर, बहादुरगढ़ बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर शान्तिपूर्वक धरना दे रहे हैं। किसानों की साफ़-साफ़ माँग है कि सरकार जब तक तीनों कृषि क़ानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक आन्दोलन ख़त्म नहीं होगा। अब किसान आन्दोलन पर युवती से दुष्कर्म की आँच पड़ रही है। पहले लाल क़िला मामला और अब टीकरी बॉर्डर मोर्चे पर आयी पश्चिम बंगाल की युवती मामले को लेकर किसानों को बदनाम किया जा रहा है। कोरोना संक्रमण से मृत्यु को प्राप्त युवती के अन्तिम संस्कार के कई दिन बाद अब उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म की बात किसानों की बदनामी का हिस्सा हो गयी है। सवाल है कि जब अनिल व अनूप नामक युवकों के नाम सामने आ रहे हैं, तो उनकी गिरफ़्तारी में देरी क्यों हो रही है? किसान भी दोनों आरोपियों की गिरफ़्तारी के पक्ष में हैं। राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव ने भी पुलिस पूछताछ में यही बात कही है।


सर्वोच्च न्यायालय ने भी किसान आन्दोलन के मामले में सुनवाई की थी और सरकार से हल निकालने की बात कहते हुए एक समिति गठित की थी। लेकिन समिति टूट गयी और उसके बाद किसानों के मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई। आख़र सर्वोच्च न्यायालय किस बात का इंतज़ार कर रहा है? सरकार किस बात का इंतज़ार कर रही है। कृषि क़ानूनों को किसान हित में बदलने का कोई प्रयास क्यों नहीं किया जा रहा है? देश के कई राज्यों के किसान दिल्ली के सीमाओं पर अहिंसक आन्दोलन कर रहे हैं और सरकार से लगातार नम्र निवेदन कर रहे हैं कि वह उनकी सुने और कृषि क़ानूनों को वापस ले। क्या सरकार का यह दायित्व नहीं कि वह कोरोना-काल में किसानों को भी उनके घर ससम्मान भेजे?
अब तक सभी सीमाओं पर 300 के क़रीब किसान शहीद हो चुके हैं, मगर सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। किसान सरकार से कोई दौलत नहीं माँग रहे हैं। वे केवल तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने की माँग कर रहे हैं; जिन्हें सरकार उन पर जबरन थोपने पर तुली हुई है।
एक सीधी-सी बात यह है कि अगर किसान अपना हित नहीं चाहते, तो सरकार जबरन क्यों उनकी भलाई में लगी है? और अगर सरकार को किसानों का हित ही करनी है, तो वह किसानों का क़र्ज़माफ़ कर दे, जिसका वह 2014 में सत्ता में आने से पहले वादा भी कर चुकी है। इससे सरकार का वादा भी पूरा हो जाएगा और किसान भी ख़ुश हो जाएँगे। कुछ लोग कहते हैं कि अगर कृषि क़ानून लागू नहीं हुए तो किसानों की आय 2022 तक दोगुनी नहीं हो सकेगी। लेकिन ऐसे लोगों से जब क़ानून में शामिल बिन्दुओं के बारे में पूछो, तो उसका ठीक जवाब किसी के पास नहीं होता। जहाँ तक सवाल किसानों की आय दोगुनी करने का है, तो उसका सीधा सा तरीक़ा यही है कि किसानों को कृषि के लिए ज़रूरी ची•ों सस्ती दी जाएँ। उन्हें उद्योगपतियों की तरह मामूली ब्याज पर या बिना ब्याज के क़र्ज़दिया जाए। उनकी फ़सलों को निर्धारित मूल्य से नीचे नहीं ख़रीदा जाए और हर साल जिस तरह से महँगाई भत्ता बढ़ता है, उसी तरह से फ़सलों के दाम भी बढ़ाया जाए।

बातचीत से सरकार ने क्यों फेरा मुँह?
किसानों से बातचीत करके हल निकालने को लेकर सरकार ने उनसे 12 दौर की बातचीत की और फिर 22 जनवरी को आख़री 12वीं बातचीत के बाद से इससे मुँह फेर लिया। इसके बाद से सरकार और किसानों की बातचीत बन्द है।
हालाँकि इसका ठीकरा भी केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के सिर पर ही फोड़ते हुए कहा था कि हमने 12 दौर तक बैठकें कीं। जब यूनियनें क़ानूनों की वापसी पर अड़ी रहीं, तो हमने उन्हें कई विकल्प दिये। इतने दौर की बातचीत के बाद भी नतीजा नहीं निकला। इसका हमें ख़ेद है। फ़ैसला न होने का मतलब है कि कोई न कोई ताक़त है, जो इस आन्दोलन को बनाए रखना चाहती है और अपने हित के लिए किसानों का इस्तेमाल करना चाहती है। ऐसे में किसानों की माँगों पर फ़ैसला नहीं हो पाएगा। इसके बाद अभी हाल ही में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों से आन्दोलन ख़त्म करने को कहते हुए उन्हें चेतावनी भी दे डाली थी। लेकिन किसान डरे नहीं और साफ़ कह दिया था कि जब तक कृषि क़ानूनों को सरकार वापस नहीं कर लेती, वह पीछे नहीं हटने वाले।

क़ानून रद्द क्यों नहीं हो सकते?
फ़िलहाल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद तीनों क़ानूनों पर रोक लगी हुई है। सरकार भी इस रोक को हटवाने की कोशिश नहीं कर रही है। इसका मतलब यह भी है कि सरकार किसानों को एक ढील देकर उन पर नकेल कसना चाहती है। सरकार अच्छी तरह जानती है कि अगर एक बार किसान आन्दोलन टूट गया, तो फिर उसे किसान संगठन भी 2020 की तरह बलशाली तरीक़े से खड़ा नहीं कर पाएँगे। पहले सरकार ने हर तरह के बल प्रयोग से किसानों को सीमाओं से खदेडऩा चाहा और जब किसान टस-से-मस नहीं हुए और अपनी माँगों पर अड़े रहे, तो सभी सीमाओं पर पाकिस्तान की सीमा की तरह कटीले तार और कीलों से घेराबंदी करायी। लेकिन जब इसकी निंदा पूरी दुनिया में होने लगी, तो सरकार को पीछे हटना पड़ा। अब सरकार ने कृषि बिलों को सीधे-सीधे वापस न लेकर उन्हें कुछ समय के लिए रोककर किसानों एक तरह की ढील दी है, ताकि वे थक हारकर अपने-अपने घरों को लौट जाएँ। लेकिन किसान सरकार की इस चाल को भी समझ गये हैं और इसका भी मुक़ाबला करने को पूरी तरह से तैयार हैं। सवाल यह है कि सरकार इन क़ानूनों को रद्द क्यों नहीं करना चाहती?

किसान विरोधी रवैये का नतीजा
यह देखने वाली बात है कि सरकार को भी किसान विरोधी रवैया का नतीजा धीरे-धीरे चुनावों में देखने को मिल रहा है। पाँच राज्यों के बाद उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए पंचायत चुनावों के नतीजे इसका बड़ा उदाहरण हैं। हालाँकि भाजपा की कई राज्यों के चुनावों में करारी हार की एक बड़ी वजह कोरोना संक्रमण के दौरान अस्पतालों की अव्यवस्था और पिछले दिनों डीजल-पेट्रोल के दाम भी बढ़े हैं। लेकिन किसान आन्दोलन सबसे बड़ा प्रभाव इसलिए पड़ा है। क्योंकि देश की अधिकतर आबादी कृषि से जुड़ी है और किसानों के साथ सहानुभूति रखती है। यही वजह रही कि इन चुनावों में भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज भी हार गये।
मेट्रो मैन ई.श्रीधरन जैसे दिग्गज ने भी किसान आन्दोलन के विरोध का परिणाम देखा है। वह इस बार भाजपा के टिकट से केरल से चुनाव भी लड़े थे, मगर हार गये। तो क्या वह किसान आन्दोलन के विरोध के कारण हारे थे? वैसे तो कहा जाता है कि केरल में भाजपा की दाल ही नहीं ग़लती; पर यह भी कहा जाता है कि मेट्रो मैन को केरल के लोग, विशेषकर उनके क्षेत्र के लोग बहुत मानते हैं। लेकिन उन्होंने किसानों के ख़लाफ़ खड़े होकर अपनी छवि ख़राब की है।