किसानों की आफत इधर से भी, उधर से भी

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इन दिनों देश में विभिन्न समस्याएँ चल रही हैं। इन समस्याओं में किसानों की अपनी कई समस्याएँ हैं, जिन पर सरकारें बहुत ही कम ध्यान देती हैं। हाल ही के कुछ वर्षों में किसानों की कर्ज़ माफी की बात चली, लेकिन किसानों के लिए ये योजना भी धोखा-सा साबित हुई, खासकर छोटे और मँझोले किसानों के लिए। इसी तरह फसल बीमा योजना भी सिवाय दिलासे के कुछ न दे सकी। खाद की बढ़ती कीमतों और सस्ते में जाते खाद्यान किसानों की हालत को बेहतर करने की बजाय बदतर बना रहे हैं। जबकि सरकार दावा कर चुकी है कि उसने किसानों की आय को दोगुना कर दिया; जबकि सच्चाई यह है कि किसानों की आय में दिनोंदिन कमी आ रही है। किसानों के जीवन में एक समस्या नहीं है, बल्कि ऐसी कई समस्याएँ हैं, जिनके चलते वह उबर नहीं पाता है। कभी उसे बाज़ार में फसल के सही दाम नहीं मिलते, कभी उसके गन्ने का पैसा समय पर नहीं मिलता, कभी उसे मौसम की मार तबाह कर देती है, तो कभी कोई अन्य आपदा। ऐसे में किसानों के पास सिवाय रोने के कोई चारा नहीं बचता। सही बात तो यह है कि जिस तरह केन्द्र और राज्य सरकारों को किसानों की मदद करनी चाहिए, वह कभी नहीं करतीं। बाज़ार में खाद्य सामग्री महँगी होती है, लेकिन किसानों के हाथ से बहुत ही सस्ते में उन्हें खरीद लिया जाता है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण प्याज की बढ़ती कीमतें हैं। आज प्याज बाज़ार में 120 से 160 रुपये प्रति किलो बिक रहा है; लेकिन यही प्याज महज छ: महीने पहले 50-60 पैसे प्रति किलो किसानों से नहीं खरीदा जा रहा था। ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर विस्तार से सरकारों के निठल्लेपन और मुनाफाखोरों की साज़िश को उजागर किया जा सकता है। िफलहाल एक और समस्या है, जो सदियों से किसानों के लिए मुसीबत और बर्बादी का सबब बनी हुई है। इस समस्या को मुंशी प्रेमचंद ने अपनी हल्कू नामक कहानी में बखूबी बयान किया है। आप समझ गये होंगे- यह समस्या है, आवारा पशुओं द्वारा फसलों को नष्ट किये जाने की। आवारा पशुओं द्वारा फसलों को नष्ट किये जाने पर न तो कोई बीमा योजना काम आ रही है और न ही सरकार इस नुकसान की भरपाई के लिए कोई कदम उठाती है। इस मामले को लेकर तहलका के स्वतंत्र पत्रकार ने बरेली के भौजीपुरा इलाके में कई किसानों से भी बातचीत की।

आवारा पशुओं का झुण्ड करता है हमला

बरेली के भौजीपुरा क्षेत्र के जालिम नगला गाँव के बड़े किसान नत्थू लाला ने बताया कि इन दिनों गेहूँ, मटर, सरसों, गन्ना, गोभी, साग, गाजर-मूली और अन्य मौसमी सब्ज़ियों की फसलें खेतों में खड़ी हैं। कड़ाके की सर्दी है और आवारा पशुओं के मन की फसलें हैं ये, जिन्हें वे किसी भी हाल में छोडऩा नहीं चाहते। इस सर्दी में किसानों द्वारा अपनी फसलों की रखवाली का संकट होता है। चट कर जाते हैं। अपनी गेहूँ की फसल को बचाने का असफल प्रयास किसान लगभग हर रोज़ करते हैं। लेकिन जहाँ उनकी नज़र खेतों से हटती है, वहीं आवारा पशुओं का झुण्ड उनके खेतों को तबाह करने पहुँच जाता है। किसानों की परेशानी यह है कि दिन में तो वह अपने खेतों की रखवाली कर लेते हैं, मगर रात की कडकड़ाती ठंड में किसान अपनी फसलों की रखवाली नहीं कर पाते। ऐसे में आवारा पशु बेखौफ होकर उनकी फसलों को रातोंरात पूरी तरह तबाह कर देते हैं। इससे किसान एक तरह से आधा मर जाता है। नील गायों और अन्य जानवरों के झुण्ड जिस तरह फसलों पर हमला करते हैं, उसे रोकने के लाख उपाय करने पर भी वह हमला रुकता नहीं है।

जान जोखिम में डालकर करनी पड़ती है फसलों की रखवाली

वहीं भोजीपुरा क्षेत्र के छोटे किसान नन्हें ने बताया कि रात को खेतों में जाने की हिम्मत नहीं होती। क्योंकि रात फसल की रखवाली करके सुबह वापस घर लौटना मौत के मुँह में जाकर लौटने से कम नहीं होता। किसानों के पास एक डंडे के सिवाय कोई हथियार नहीं होता। ऐसे में अगर किसान पर जानवर हमला कर दें, तो उसका बचना मुश्किल हो जाए। उसके अलावा ज़हरीले जीवों का भी डर रहता है। ऐसे में फसल की रखवाली के चलते किसान को अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता है। इतने पर भी रात को 12-1 बजे तक और सुबह 3-4 बजे से जाकर खेती की रखवाली करनी पड़ती है, जो कि काफी जोखिम भरा और कष्टदायक काम है। नन्हें बताते हैं कि एक बार वे अपने खेत की रखवाली करने गये थे, तभी नील गायों का झुण्ड उनके खेत में आ घुसा। उन्होंने उस झुण्ड को बचाने का प्रयास किया, तो झुण्ड उन पर उलटा हमलावर हो गया और उन्होंने भागकर अपनी जान बचायी। फिर गाँव से वे मसालें लेकर कई लोगों के साथ गये और नील गायों को भगाकर आये। लेकिन महज एक घंटे के अंतराल में नील गायें कई किसानों की फसलों के काफी हिस्से नष्ट कर चुकी थीं।

सरकार को करनी चाहिए भरपाई

एक अन्य बड़े किसान हरि सिंह का कहना है कि आवारा पशुओं से हुए नुकसान की भरपाई सरकार को करनी चाहिए। हाल ही में बीमा योजना शुरू हुई है, लेकिन अगर किसी किसान की फसल नष्ट होती है, तो उसे वह लाभ नहीं मिलता। कुछ किसानों को तो फसल बीमा की जानकारी भी नहीं है, तो कुछ किसान पैसे के अभाव में बीमा करा भी नहीं पाते। वहीं अगर कोई किसान किसी भी तरह नष्ट हुई अपनी फसल की भरपाई के लिए बीमा लेने की कोशिश कर भी ले, तो उसे रिश्वत खाने वाले अफसरों-कर्मचारियों की जेबें पहले भरनी पड़ती हैं। ऐसे अधिकतर किसान तो बीमा का भूत ही दिमाग से निकाल देते हैं।

गो-रक्षा ने बढ़ा दी आवारा पशुओं की संख्या

भोजीपुरा क्षेत्र के आयुर्वेद पशु चिकित्सक और बड़े स्तर के किसान सुखदेव गंगवार ने बताया कि गो-रक्षा का सरकार ने जिस तरह से नारा दिया, वह अच्छी बात है; गोवंश की रक्षा होनी भी चाहिए। लेकिन इससे किसानों की मुसीबत बहुत बढ़ गयी है। सुखदेव बताते हैं कि अब किसानों को गाय और गोवंश की बकरी-बकरे के बराबर भी कीमत नहीं मिलती। यहाँ तक बछड़ों (गाय का नर बच्चा) को तो मुफ्त में भी कोई लेने को तैयार नहीं होता। गोरक्षा का ऐसा जुनून कुछ लोगों में चढ़ा है कि अगर किसी को गाय या गोवंश को ले जाता देख लें, तो बिना कोई कारण जाने सीधे पीटने लगते हैं। सरकार ऐसे अराजक तत्त्वों पर रोक नहीं लगाती, पुलिस में रिपोर्ट लिखाओ, तो पुलिस पीढि़त पर पर ही हावी हो जाती है। ऐसे में तबेला मालिक भी गायों को लेने और उनके मांस का व्यापार करने से बचने लगे हैं। अब किसान क्या करे? वह अधिक पशु रख भी नहीं सकता, क्योंकि उसके खुद के खाने का ठिकाना नहीं होता, तो बिना दूध की गायों और गोवंश को कैसे पाले? इसलिए अधिकतर किसान बिना दूध की गायों और बछड़ों को जंगल में छोड़ रहे हैं, बल्कि मैं कहूँगा कि छोडऩे के लिए मजबूर हो रहे हैं। इसकी ज़िम्मेदार कहीं न कहीं सरकार अधिक है। ऐसे में जंगलों में अवारा जानवरों की संख्या लगातार बढ़ रही है और किसानों के लिए अपनी फसलों को बचाना बहुत मुश्किल हो गया है। अगर सरकार को गो रक्षा की इतनी ही चिन्ता है, तो वह हर किसान से उस गोवंश को खरीदती क्यों नहीं, जिसे किसान पालने में असमर्थ है?

सरकार ने उठाया है यह कदम

उत्तर प्रदेश सरकार की बात करें, तो कुछ समय पहले सरकार ने एक कदम उठाया था, जिसके अंतर्गत नगर पंचायतों को प्रस्ताव भेजे गये हैं कि जो किसान गोवंश को पालेंगे, उन्हें सरकार प्रति पशु 900 रुपये महीने देगी। हालाँकि यह योजना अभी तक लागू नहीं हुई है, जबकि उत्तर प्रदेश सरकार को इसकी घोषणा किये हुए कई महीने बीत गये। इस मामले में एक मझोले किसान रामकरन बताते हैं कि पहले तो सरकार दावों और वादों पर अमल करने से रही। अगर मान लो कि वह किसानों को गोवंश पालने के एवज़ में पैसा देती भी है, तो उसे सोचना चाहिए कि इतने कम पैसे में पशु कैसे पलेगा? रामकरन ने कहा कि एक पशु को पालने के लिए कम से कम 2000 रुपये महीने की ज़रूरत होती है; ऐसे में 8-9 सौ रुपये से क्या होगा? उन्होंने यह भी कहा कि सरकार खाली के ड्रामे कर रही है, अगर उसे किसानों के हित की इतनी ही चिंता होती, तो सबसे पहले किसानों का कर्ज़ माफ करती।

नीलगायों से कैसे करें बचाव?

नीलगायों से बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने कुछ सामान्य और सस्ते से उपाय बताये हैं। इन उपायों में एक है- हर्बल घोल फसलों पर छिडक़ना। इस हर्बल घोल में- गोमूत्र, 1/4 मट्ठा (छाछ), 1/3 लालमिर्च, 1/8 राख मिलाना चाहिए। इस घोल को फसलों पर छिडक़ें, इससे न केवल आवारा पशुओं से, बल्कि कीटों से भी फसलों की रक्षा होती है। इसके अलावा मट्ठे और लहसुन से तैयार घोल भी फसलों पर छिडक़ने से आवारा पशुओं से फसलों की रक्षा की जा सकती है। इसके अलावा गोमूत्र, नीम की पत्ती, धतूरा, मदार, तम्बाकू, लहसुन, लाल मिर्च पाउडर आदि सामग्री मिलाकर भी घोल बनाकर फसलों पर छिडक़ाव करने से आवारा पशु फसल पर हमला नहीं करते। इस घोल में 1/4 गोमूत्र 1/4 नीम की पिसी पत्ती, 1/5 धतूरे की पिसी पत्ती और फल, 1/5 मदार (आक) की जड़, 1/8 तम्बाकू, 1/9 लहसुन, 1/16 लाल मिर्च पाउडर का घोल बनाकर धूप में ढककर रख दें। ध्यान रहे इस घोल में हवा नहीं लगनी चाहिए। फिर शाम को फसलों पर इस घोल का छिडक़ाव कर दें। आवारा पशुओं के साथ-साथ कीट भी फसलों को नुकसान नहीं पहुँचा पाएँगे। यह सभी घोल फसलों पर रक्षक दवा और खाद का भी काम करेंगे।