किल्वेनमनी हत्याकांड

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भाimgरत के दक्षिणी राज्यों में तमिलनाडु का इतिहास जातिगत खूनी संघर्षों के लिए सबसे ज्यादा कुख्यात रहा है. यहां पंद्रहवीं शताब्दी तक के इदांकी और वालांकी जातियों के बीच हिंसक संघर्षों से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज मिलते हैं. हालांकि आज से तकरीबन साढ़े पांच दशक पहले का किल्वेनमनी हत्याकांड न सिर्फ इस राज्य बल्कि स्वतंत्र भारत में भी इस तरह की घटनाओं की शुरुआत माना जाता है.

किल्वेनमनी नाम का यह कस्बा तंजावुर जिले में है. 1960-70  के दशक में यहां कम्युनिस्ट आंदोलन काफी मजबूत था. यह आंदोलन उन हजारों दलित मजदूरों और भूमिहीन किसानों की बुनियाद पर टिका था जिनकी आजीविका बड़े किसानों, जो ज्यादातर सवर्ण थे, के यहां काम करके चलती थी. कम्युनिस्ट आंदोलन की वजह से ये एकजुट थे और समय-समय पर अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए आंदोलन करते रहते थे. इन्हीं सालों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं की मौत के बाद यह आंदोलन कमजोर पड़ गया. लेकिन इसी दशक में 1966-67 में तंजावुर और आस-पास के क्षेत्रों में आंशिक सूखा पड़ा और एक बड़ी आबादी, जिनमें सभी मजदूर शामिल थे, की आजीविका पर संकट आ गया.

वे बड़े किसानों द्वारा कम मजदूरी दिए जाने की वजह से पहले से आक्रोशित थे लेकिन इस समय उनकी हालत और खराब हो गई. सीपीआई की सोच थी कि इन लोगों के बीच पैठ बढ़ाने का यह एक अवसर है, इसलिए वह इन लोगों को एकजुट करने लगी. इसी दौरान एक बड़े किसान की हत्या हो गई. इस घटना ने अचानक बड़े किसानों को एकजुट कर दिया.

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