काशी हिंदू विश्वविद्यालय: गुंडों पर नहीं, छात्राओं पर लगती है रोक | Tehelka Hindi

आवरण कथा, उत्तर प्रदेश A- A+

काशी हिंदू विश्वविद्यालय: गुंडों पर नहीं, छात्राओं पर लगती है रोक

2017-10-15 , Issue 19 Volume 9

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय को जरूरत है ऐसे उपकुलपति की जिसके मन में छात्रों के प्रति चिंता हो। एक ऐसा प्रशासक जो छात्र-छात्राओं की जरूरतों को आधुनिक जीवन की चुनौतियों के लिहाज से समझता हो। देश में विकास रूप ले रहा है उसी लिहाज से छात्र-छात्राओं की अपनी मांगे भी हैं जिन पर बहुत ही मानवीयता से सोचने की जरूरत है।

उन पर उनकी अनसुनी, बल प्रयोग अनुचित है।

वाराणसी में अपने निर्वाचन क्षेत्र में प्रधानमंत्री गए थे। तब से काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में महिला छात्राएं असुरक्षा के माहौल में हैं और वहां का प्रशासन उसकी शिकायतों पर हाथ पर हाथ धरे बैठा है। उसका नमूना विरोध प्रदर्शन में सड़क पर दिखा। पुलिस ने नवरात्र के बावजूद उन पर लाठीचार्ज किया। जिस में कई अध्यापक, छात्र और पत्रकार घायल हुए। उपकुलपति के पास भी प्रदर्शनकारी छात्राओं से मिलने का समय नहीं था।

प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में काशी हिंदू विश्वविद्यालय मेें अब न तो पढ़ाई का माहौल है और न कोई कानून-व्यवस्था। देवी पूजन समारोह के दौरान आंदोलनकारी छात्राओं पर पुलिस बल ने अति उत्साह में जो ज्य़ादती हुई। उस पर प्रधानमंत्री ने भी दुख जताया। तब कार्रवाई थमी।

शनिवार को देर रात में काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कई छात्राओं को पुलिस ने पीटा। छात्राओं का आरोप था कि परिसर में छेड़छाड़ और बलात्कार अब परिसर में आम है। आंदोलनकारी छात्राएं कला संकाय की उस छात्रा की शिकायत पर सुनवाई के लिए दबाव डाल रही थी जिसके साथ गुरूवार की शाम मोटर साईकल पर सवार तीन लोगों ने छेड़छाड़ की। छात्रा अपने छात्रावास लौट रही थी तब उसके साथ यह हरकत हुई। वहां तैनात सुरक्षा गार्ड ने शिकायत सुन कर भी कुछ नहीं किया। उसने आरोपियों को भी नहीं रोका। विश्वविद्यालय उपकुलपति ने भी नहीं सुनी। विद्यालय के सुरक्षा प्राक्टर ने कहा्र रात में आई क्यों। छात्राएं इस पर भड़की।

विरोध प्रदर्शन तब हिंसक हो उठा जब परिसर की संपत्तियों की आगजनी होने लगी। पुलिस ने लाठीचार्ज कर विरोध प्रदर्शन कर रहे युवाओं को उपकुलपति आवास से खदेड़ा। छात्रों का कहना है जब यह हुआ तो वहां महिला पुलिस नहीं थी। कई वीडियों में पुलिस वाले छात्राओं पर लाठियां चलाते दिख भी रहे हैं। ’हम बड़ी ही शांति से अपनी सुरक्षा के सुमचित प्रबंध का मांग करते हुए उपकुलपति आवास में बैठे थे। उपकुलपति ने आवास मेें होकर भी हमसे मिलने से इंकार कर दिया। पुलिस को आदेश दिया गया कि लाठियां चला कर आवास खाली कराओ,बताया, निवेदिता ने जो कला संकाय की छात्रा है।

उसने  बताया कि ’पुलिस के पुरुष जवानों ने लाठियों से लड़कियों को मारा। कुछ को घसीटा भी। घायल पत्रकारों में मतेश श्रीवास्तव और आलोक पांडे हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विशाल परिसर में सेक्सुअल छेड़छाड़ आम बात है। क्योंकि कहीं भी मुस्तैद सुरक्षा गार्ड नहीं हैं। छात्राओं के इस मुद्दे पर प्रॉक्टर (सुरक्षा) और शासन से पूछताछ ऊँचे स्तर पर की जानी चाहिए थी। इसके विपरीत शिकायतकर्ताओं पर लाठियां बरसाई गई। उन्हें जमीन पर घसीटा गया। प्राक्टर (सुरक्षा) का तर्क हमेशा यही रहता कि आप छात्रावास देर रात में क्यों लौट रही थीं। और भी देर हो जाती तो क्या कुछ हो जाता?

विरोध पर उतरे युवाओं की मांग थी कि सभी रास्तों पर अच्छी प्रकाश व्यवस्था हो। हर तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे हों। छात्राओं पर शाम छह बजे छात्रावास लौटने पर से पाबंदी हटे। जो भी लोग परिसर में आते हैं उन पर नजर रखी जाए। छात्राओं का कहना है कि छह बजे शाम को ही छात्रावास लौटने की बाध्यता गलत है। यह कानून तो बाहरी लोगों के लिए होना चाहिए।

महिला महाविद्यालय (एमएमवी) छात्रावास की सह संयोजक नीलम अत्री ने कहा कि आंदोलन का रु ख बदला जा चुका है। प्रशासन नहीं सुन रहा है और छात्राओं की सुरक्षा पर कॉलेज प्रशासन मांग नहीं आ रहा है। छात्रावास की वार्डन के अनुसार रात ग्यारह बजे तो पुलिस ने छात्र-छात्राओं के पीछे लाठी मांजती हुई दौड़ी थी। लाठीचार्ज की चपेट में कुछ अध्यापक भी आ गए। कई छात्र-छात्राओं और अध्यापकों के सिर, बाहों, पीठ पर चोटें भी आई। पुलिस ने आंसू गैस भी छोड़ी।

उपकुलपति के पास छात्रों के लिए समय नहीं है। वे राजनीति में रु चि लेते हैं। एक बुजुर्ग लल्लन भैया ने बताया कि जब से वे आए है उसकी प्राथमिकता में प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री वगैरह ही रहते हैं। विश्वविद्यालय नहीं। एक अर्से से विश्वविद्यालय में गुंडागर्दी का बोलबाला है। प्राक्टर (सुरक्षा) भी कोई ध्यान नहीं दे पाते। यहां के तमाम सुरक्षा गार्ड बेहद निष्क्रय और सिफारिशी हैं। लड़के-लड़कियों को पुस्तकालय में कम से कम रात आठ बजे तक पढऩे का मौका देना चाहिए। लेकिन सूरज ढलते ही कमरे में लौटने का निर्देश क्या उचित हंै?

काशी में सदर के सर्किल अधिकारी निवेश कटियार ने बताया कि पुलिस ने रबड़ बुलेट्स भी चलाईं। वह भी रात साढ़े दस बजे। जब उपकुलपति आवास पर छात्रों ने धरना दिया। कुछ देर बाद ही पथराव शुरू हुआ पुलिस को निशाना बनाया गया। पुलिस की तीन गाडिय़ों को फंूक दिया गया और पंद्रह गाडिय़ां तोड़ी फोड़ी गई। सब इंस्पेक्टर महेश ने दावा किया कि छात्रों ने पंट्रोल बम भी फेंके।

उपकुलपति इस बात से इंकार करते हैं कि छात्र-छात्राओं पर लाठीचार्ज हुआ जबकि तमाम वीडियो में यह स्पष्ट दिखता है। अब विश्वविद्यालय दो अक्तूबर तक बंद कर दिया गया है। कुछ पुलिस कर्मियों पर कार्रवाई की गई है। पिछले साल आठ लड़कियों पर धरना देने के कारण विश्वविद्यालय ने रोक लगा दी थी।

इस विश्वविद्यालय के एकेडेमिक, प्रशासनिक लोगों पर जेंडर, रंग और जाति के आधार पर छात्र-छात्राओं ने उत्पीड़त की शिकायतें हैं। अजीबों गरीब नियम हैं जिसमें मांसाहार न करने की भी बात है, और इंटरनेट इस्तेमाल करने पर रोक है। इसके खिलाफ आठ लड़कियों ने सुप्रीम कोर्ट में शिकायत की और यहां के आतंक के माहौल के बारे में लिखा। नए नियमों के तहत छात्रावास के कमरों की बिजली रोक दी जाती है। रविवार को छात्र-छात्राओं ने पूरे शहर में जुलूस निकाल कर प्रदर्शन किया।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 9 Issue 19, Dated 15 October 2017)

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