काले कानून ने कराई किरकिरी?

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jaipur vidhan sabha & jyoti nager t point pe kala kanoon ko lekar protest (38)

भ्रष्ट लोक सेवकों को बचाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला दंड (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2017 को लेकर जबरदस्त जनविरोध के आगे वसुंधरा सरकार के पैर कांप गए हैं। जनता के जेहादी रुख से घबराई सरकार ने शुतुरमुर्गी रवैया अख्तियार करते हुए ‘काला कानूनÓ से अभिशप्त हुए अध्यादेश को ‘ठंडे बस्तेÓ में डालते हुए पुर्नविचार के लिए प्रवर समिति को सोंप दिया है। बैकफुट पर आई सरकार के संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ की खिसियाहट इन शब्दों में प्रतिध्वनित हुई कि ‘अध्यादेश के बाद सत्र आ गया था, इसलिए विधेयक पेश करना आवश्यक था। अध्यादेश सत्र शुरू होने से 42 दिन तक अस्तित्व में रहेगा।Ó इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों को समझे ंतो,’अध्यादेश सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह तक वैध रहता है। इस दौरान सदन बुलाकर विधेयक पास कराना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर वह स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। अध्यादेश को पिछले 6 सितम्बर को मंजूरी मिली और अधिसूचना 7 सितम्बर को जारी हुई। बयालीस दिन की गणना 23अक्टूबर को सदन बुलाने के दिन से होगी। अत: 3 दिसमबर को अध्यादेश स्वत: ही खत्म हो हो जाएगा। यदि सरकार इससे पहले सत्र बुलाकर विधेयक पास कराती है या दोबारा अध्यादेश लाती है तभी ‘काला कानूनÓ बन सकेगा। ऐसा कानून लाने की कवायद को ‘अजूबाÓकरार देती हुई राजस्थान विधानसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा सिंह कहती है ‘ऐसे कानून की आवश्यकता ही क्या है?ÓÓ उनका कहना था,’राज्य में संभवत’ पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यादेश लाया गया और बाद में विधेयक लाने पर सरकार को उसे प्रवर समिति को भेजना पड़ा हो? ”उन्होंने कहा,’अब जबकि विधेयक प्रवर समिति को भेजा गया है तो उम्मीद की जा सकती है कि, नाम,पहचान उजागर करने की सजा का प्रावधान हटाया जा सकता है या फिर अभियोजन स्वीकृति के लिए 180 दिन की समय सीमा घटाई जा सकती है। कैसा भी बदलाव हो? लेकिन इस कानून से तो भ्रष्ट लोक सेवकों को संरक्षण ही मिलेगा।ÓÓ

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद चतुर्वेदी इसे आधी-अधूरी जीत बताते हैं। चतुर्वेदी कहते हैं, ‘बैकफुटÓ के इस फैसले में जनता का सम्मान कहां प्रतिध्वनित होता है? विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की कवायद में तो ”नाक का सवालÓ ही नजर आता है। चतुर्वेदी कहते हैं, सरकार के आचरण में लोकतंत्र के प्रति आस्था नहीं बल्कि जनता की आंखों में धूल झोकने की नाटकीयता परिलक्षित होती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि,’भ्रष्टाचार के संरक्षण का यह विराट दर्शन वसुंधरा राजे के प्रादेशिक सत्ता के सर्वोच्च पद पर पदार्पण से राजनीति के नैतिक मूल्यों के लिए भूचाल सिद्ध हुआ है। भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का परिणाम कई गुना भ्रष्टाचार पैदा होने की जमीन तैयार करने की बुनियाद को सींचने का काम करेगा। अध्यादेश को प्रवर समिति को सौंपे जाने की कवायद पर गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने खुलासा करते हुए मीडिया से कहा कि,’प्रवर समिति को विचारार्थ भेजे जाने के कारण अध्यादेश 42 दिन तक लागू रहेगा और इसके बाद खत्म हो जाएगा। इस बाबत विधेयक पर मीडिया और विधायकों की आपत्ति के बाद समिति खासतौर से दो बिन्दुओं पर अधिक विचार करेगी जिसमें मीडिया के खबर प्रकाशित करने का मामला और शिकायत की पड़ताल के लिए 180 दिन के समय को घटाकर 90 दिन कराने के सुझाव पर विचार कर सकती है। कटारिया ने कहा,’राजस्थान में धारा 156 (37) के तहत सबसे ज्यादा इस्तगासे दर्ज हो रहे हैं और इनमें 75फीसदी पर फाइनल रिपोर्ट लगाई गई।

गृहमंत्री कटारिया ने चाहे अनमने मन से ही सही, लेकिन इस बात को माना है कि महाराष्ट्र की तुलना में हमारे यहां बनाए गए कानून में दो बड़ी खामियां हैं। महाराष्ट्र में अभियोजन स्वीकृति की मियाद 90 दिन है जबकि हमारे यहां 180 दिन। महाराष्ट्र के कानून में मीडिया में नाम उजागर करने पर सजा का प्रावधान नहीं है। हमाने कानून में इसे जोड़ा गया है। लेकिन कटारिया का यह रहस्योदघाटन स्तब्ध कर देने वाला था कि, ‘इन दो महत्वपूर्ण बातों की मुख्यमंत्री को जानकारी तक नहीं थी? उधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है कि, ‘कांग्रेस ने लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष किया,जिसका नतीजा यह रहा कि सरकार ने ‘काले कानूनÓ वाले विधेयक को प्रवर समिति को भेज दिया। लेकिन पायलट कहते हैं कि, ‘अहम जरूरत तो इसे निरस्त करने की है।

प्रसंगवश विधेयक लाने के दौरान सरकार का यह दावा भी सवालों के घेरे में है कि, 73 प्रतिशत मामले झूठे दर्ज कराए जाते हैं। जबकि लोकसेवकों की प्रतिष्ठा को धूमिल होने से बचाना ही विधेयक का मकसद है? तो फिर इस्तगासों के जरिए इन मामलों को दर्ज करवाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हेती? आईपीसी की धारा 193 में इस्तगासे के लिए झूठा शपथ पत्र देने पर सात साल की सजा और असीमित जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन आखिर क्यों सरकार ने झूठे मामलों में एक भी व्यक्ति को सजा नहीं दिलवाई? सरकार की ओर से लोकसेवकों को बचाने के लिए लाया गया विधेयक चौतरफा विरोध के बाद भले ही प्रवर समिति को सौंप दिया गया है। लेकिन इस विधेयक के दो पहलू सामने आ रहे हैं। सोमवार के जब गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने यह विधेयक सदन में रखा तो बताया था कि अफसर, नेताओं पर दर्ज होने वाले 73 फीसदी मामले झूठे होते हैं। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने आंकड़े भी पेश किए, लेकिन बुधवार 25 अक्टूबर को गृहमंत्री सदन में बोले,’भ्रष्टाचार को लेकर तीन साल में 60 आईएएस-आरएएस पर भ्रष्टाचार की कार्रवाई की गई। राजस्थान अफसरों के खिलाफ मामले दर्ज करने में अव्वल है। लेकिन यह सच और भी चौंकाने वाला है कि आरटीआई के तहत मांगी गई एक जानकारी में खुलासा हुआ है कि एसीबी को दो साल में अफसर-नेताओं के खिलाफ 16,278 भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली। एसीबी ने इनमें से सिर्फ 51 मामले ही दर्ज किए। इसके अलावा प्रारंभिक जांच के लिए 89 मामले स्वीकार किए। यह जानकारी एक जनवरी 2014 से एक मार्च 2016 तक दर्ज हुए मामलों की है।

वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी का कहना है कि,’क्या कोई राज्य सरकार न्यायालय को आदेश दे सकती है कि उसे किस मामले में सुनवाई करनी चाहिए और कब करनी चाहिए? क्या पुलिस जांच के बाद भी सुनवाई करने के लिए न्यायालय को सरकार से स्वीकृति लेना जरूरी है?क्या एसीबी अथवा अन्य जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपियों के नाम प्रकाशित नहीं करने से संविधान की धारा 19 (1) में प्रदत्त’स्वतंत्रता की अभिव्यक्तिÓ का क्या मंतव्य रह जाएगा? तब क्या जरूरत है मतदान की, चुनाव की और संविधान की? सरकार ने परोक्ष रूप से घोषणा कर दी है कि उसको भी जनहित और जनतंत्र में विश्वास नहीं है। कोठारी कहते हैं कि,’एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वसुंधरा सरकार के इन कदमों से बेखबर है?

क्या है अध्यादेश

पिछले सितंबर में दागी लोकसेवकों को संरक्षण देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में अध्यादेश के जरिए संशोधन कर चुकी राज्य सरकार इसे स्थायी बनाने के लिए सोमवार 23 अक्टूबर को शुरू हुए विधानसभा सत्र में विधेयक लाने की पूरी तैयारिंया कर चुकी थी। इसे संशोधन में आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया कि, सीआरपीसी की धारा 156 (3) और धारा 190 (1) (सी) के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और असीमित जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने से पहले उनका नाम तथा अन्य जानकारी का प्रकाशन और प्रसारण नहीं हो सकेगा। इसमें यह भी जोड़ा गया है कि 6 माह में अभियोजन स्वीकृति पर निर्णय करना होगा, अन्यथा स्वत: स्वीकृति मान ली जाएगी। अभियोजन स्वीकृति मिलने तक ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया जा सेकगा। इस विधेयक के मुताबिक सीआरपीसी की धारा 156 (3) और 190 के तहत मजिस्ट्रेट अभियोजन स्वीकृति से पहले ना तो जांच का आदेश दे पाएंगे और ना ही प्रसंज्ञान ले पाएंगे।

‘लाभ का पद’ बचाया?

राज्य सरकार लोकसेवकों को संरक्षण की आड़ में जनता की आवाज दबाने में तो कामयाब नहीं हो पाई, लेकिन विधायकों के लिए ‘लाभ का पदÓ बचा लिया है। सरकार ने राजस्थान विधानसभा सदस्य (निरर्हता-निवारण) विधेयक 2017 पारित करवा लिया। इसके तहत संसदीय सचिव, बोर्ड, निगम, समिति प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या निदेशक के पद पर बैठा विधायक लाभ के पद के आधार पर अयोग्य नहीं होगा। भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने कहा,’विधेयक के रूप में यह चोर दरवाजे से मंत्री बनने का रास्ता है। दिल्ली या असम के मुख्यमंत्री संसदीय सचिव नियुक्त नहीं कर सकते तो हमारी ‘सीएमÓ के कौन से तारे लगे हुए हैं? तिवाड़ी ने कहा कि, ‘पिछली 26 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। उन्होंने कहा,’मुख्यमंत्री को विधायकों में से संसदीय सचिव, या बोर्ड-निगम का अध्यक्ष बनाने का अधिकार नहीं है। देश के आठ हाईकोर्ट भी इस तरह का निर्णय दे चुके हैं।Ó जवाब में संसदीय मंत्री राजेन्द्र राठौड़ का कहना था कि यह विधेयक संसदीय सचिव पद पर नियुक्ति के लिए नहीं है। यह केवल घोषित करता है कि, ‘कोई विधायक संसदीय सचिव, नियुक्त हो जाता है तो वह अयोग्य नहीं हो जाता है। उन्होंने कहा, सरकार की मंशा पुराने विधेयकों को एक करने की थी जो किया है।

 तिवाड़ी ने कहा,’थूक कर चाट लिया’!

भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने के भाजपा सरकार के दांव-पेच के धुर्रे उड़ाने के घमासान में गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया और भाजपा के तेज तर्रार विधायक घनश्याम तिवाड़ी पूरी तरह एक दूसरे के निशाने पर रहे। विधेयक को लेकर बेकफुट पर आई सरकार पर करारे तंज कसने में तिवाड़ी ने कोई कसर नहीं छोड़ी। कटारिया और तिवाड़ी के बीच करीब 15 मिनट तक चली शाब्दिक तीरंदाजी में तिवाड़ी ने तो यहां तक कह डाला कि,’पहले थूका क्यों? और अब थूक कर चाटा क्यों? तिवाड़ी को दूसरे दिन भी विधेयक पर बोलने का मौका नहीं दिया, इसी दौरान गृहमंत्री कटारिया बोल रहे थे तो तिवाड़ी भी तीखे अंदाज में बोलते रहे। कटारिया का कहना था कि,’मैं भी तेज बोल सकता हूं, मेरे फेफड़ों में भी काफी दम है।ÓÓ सदन से बाहर तिवाड़ी का कहना था,’बिना सदन में चर्चा के विधेयक प्रवर समिति को कैसे भेजा गया? गृहमंत्री से हुई तनातनी को लेकर तिवाड़ी बोले, ‘तेज बोलने का अंदाज पुलिसिया ढंग से गालिब कर रहे थे।ÓÓ तिवाड़ी ने कहा,’उन्हें पता होना चाहिए कि गृहमंत्री धमकाने के लिए नहीं जनता की रक्षा करने के लिए होता है। तिवाड़ी ने सदन से दो बार वाकआउट किया। इसके बाद भी उन्हें नहीं सुना गया तो उन्होंने कहा,’सदन में धरने पर बैठ जाऊंगा।ÓÓ विधेयक पर विधायको ंका चौंकाने वाला सच भी उजागर हुआ। 74 प्रतिशत विधायकों को तो यह भी पता नहीं था कि आखिर विधेयक में था क्या? कई विधायक तो यह कह कर रह गए कि पार्टी का फैसला सर्वोपरि है।ÓÓ इससे एक दिन पहले तिवाड़ी पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत के जन्म दिवस पर सुंदर सिंह भंडारी चेरिटिबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित सम्मान समारोह का यह कह कर बहिष्कार कर चुके थे कि,’काले कानून का विरोध करूंगा, पुरस्कार नहीं लूंगा।

विवादित विधेयक के विरोध प्रदर्शन में भाजपा के वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी भी साथ थे। गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया और संसदीय मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने भरोसा दिलाया कि चर्चा के दौरान शंकाओं का समाधान होगा। इसके बावजूद कांग्रेस, नेशनल पीपुल्स पार्टी और भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने वाक आउट कर दिया। तिवाड़ी ने दो बार वाकआउट किया। कांग्रेस ने विधेयक के विरोध में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी की अगुवाई में पैदल मार्च निकाल कर विरोध प्रदर्शन किया।