काले कानून ने कराई किरकिरी? | Tehelka Hindi

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काले कानून ने कराई किरकिरी?

लोकतंत्र की ताकत क्या है यह राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से ज्यादा कौन जानता होगा। जनाक्रोश के आगे राज्य की भाजपा सरकार को घुटने टेकने पड़े। वह अध्यादेश फिर विधेयक जिसमें भ्रष्ट नौकरशाहों और लोकसेवकों को बचाने की कोशिश की थी उसे आखिरकार ठंडे बस्ते में डाल ही दिया है। एक रपट

2017-11-15 , Issue 21 Volume 9

jaipur vidhan sabha & jyoti nager t point pe kala kanoon ko lekar protest (38)

भ्रष्ट लोक सेवकों को बचाने और मीडिया पर पाबंदी लगाने वाला दंड (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2017 को लेकर जबरदस्त जनविरोध के आगे वसुंधरा सरकार के पैर कांप गए हैं। जनता के जेहादी रुख से घबराई सरकार ने शुतुरमुर्गी रवैया अख्तियार करते हुए ’काला कानूनÓ से अभिशप्त हुए अध्यादेश को ’ठंडे बस्तेÓ में डालते हुए पुर्नविचार के लिए प्रवर समिति को सोंप दिया है। बैकफुट पर आई सरकार के संसदीय कार्य मंत्री राजेन्द्र राठौड़ की खिसियाहट इन शब्दों में प्रतिध्वनित हुई कि ’अध्यादेश के बाद सत्र आ गया था, इसलिए विधेयक पेश करना आवश्यक था। अध्यादेश सत्र शुरू होने से 42 दिन तक अस्तित्व में रहेगा।Ó इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों को समझे ंतो,’अध्यादेश सत्र शुरू होने के 6 सप्ताह तक वैध रहता है। इस दौरान सदन बुलाकर विधेयक पास कराना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर वह स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। अध्यादेश को पिछले 6 सितम्बर को मंजूरी मिली और अधिसूचना 7 सितम्बर को जारी हुई। बयालीस दिन की गणना 23अक्टूबर को सदन बुलाने के दिन से होगी। अत: 3 दिसमबर को अध्यादेश स्वत: ही खत्म हो हो जाएगा। यदि सरकार इससे पहले सत्र बुलाकर विधेयक पास कराती है या दोबारा अध्यादेश लाती है तभी ’काला कानूनÓ बन सकेगा। ऐसा कानून लाने की कवायद को ’अजूबाÓकरार देती हुई राजस्थान विधानसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा सिंह कहती है ’ऐसे कानून की आवश्यकता ही क्या है?ÓÓ उनका कहना था,’राज्य में संभवत’ पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि अध्यादेश लाया गया और बाद में विधेयक लाने पर सरकार को उसे प्रवर समिति को भेजना पड़ा हो? ”उन्होंने कहा,’अब जबकि विधेयक प्रवर समिति को भेजा गया है तो उम्मीद की जा सकती है कि, नाम,पहचान उजागर करने की सजा का प्रावधान हटाया जा सकता है या फिर अभियोजन स्वीकृति के लिए 180 दिन की समय सीमा घटाई जा सकती है। कैसा भी बदलाव हो? लेकिन इस कानून से तो भ्रष्ट लोक सेवकों को संरक्षण ही मिलेगा।ÓÓ

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद चतुर्वेदी इसे आधी-अधूरी जीत बताते हैं। चतुर्वेदी कहते हैं, ‘बैकफुटÓ के इस फैसले में जनता का सम्मान कहां प्रतिध्वनित होता है? विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की कवायद में तो ”नाक का सवालÓ ही नजर आता है। चतुर्वेदी कहते हैं, सरकार के आचरण में लोकतंत्र के प्रति आस्था नहीं बल्कि जनता की आंखों में धूल झोकने की नाटकीयता परिलक्षित होती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि,’भ्रष्टाचार के संरक्षण का यह विराट दर्शन वसुंधरा राजे के प्रादेशिक सत्ता के सर्वोच्च पद पर पदार्पण से राजनीति के नैतिक मूल्यों के लिए भूचाल सिद्ध हुआ है। भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का परिणाम कई गुना भ्रष्टाचार पैदा होने की जमीन तैयार करने की बुनियाद को सींचने का काम करेगा। अध्यादेश को प्रवर समिति को सौंपे जाने की कवायद पर गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने खुलासा करते हुए मीडिया से कहा कि,’प्रवर समिति को विचारार्थ भेजे जाने के कारण अध्यादेश 42 दिन तक लागू रहेगा और इसके बाद खत्म हो जाएगा। इस बाबत विधेयक पर मीडिया और विधायकों की आपत्ति के बाद समिति खासतौर से दो बिन्दुओं पर अधिक विचार करेगी जिसमें मीडिया के खबर प्रकाशित करने का मामला और शिकायत की पड़ताल के लिए 180 दिन के समय को घटाकर 90 दिन कराने के सुझाव पर विचार कर सकती है। कटारिया ने कहा,’राजस्थान में धारा 156 (37) के तहत सबसे ज्यादा इस्तगासे दर्ज हो रहे हैं और इनमें 75फीसदी पर फाइनल रिपोर्ट लगाई गई।

गृहमंत्री कटारिया ने चाहे अनमने मन से ही सही, लेकिन इस बात को माना है कि महाराष्ट्र की तुलना में हमारे यहां बनाए गए कानून में दो बड़ी खामियां हैं। महाराष्ट्र में अभियोजन स्वीकृति की मियाद 90 दिन है जबकि हमारे यहां 180 दिन। महाराष्ट्र के कानून में मीडिया में नाम उजागर करने पर सजा का प्रावधान नहीं है। हमाने कानून में इसे जोड़ा गया है। लेकिन कटारिया का यह रहस्योदघाटन स्तब्ध कर देने वाला था कि, ‘इन दो महत्वपूर्ण बातों की मुख्यमंत्री को जानकारी तक नहीं थी? उधर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है कि, ‘कांग्रेस ने लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष किया,जिसका नतीजा यह रहा कि सरकार ने ’काले कानूनÓ वाले विधेयक को प्रवर समिति को भेज दिया। लेकिन पायलट कहते हैं कि, ‘अहम जरूरत तो इसे निरस्त करने की है।

प्रसंगवश विधेयक लाने के दौरान सरकार का यह दावा भी सवालों के घेरे में है कि, 73 प्रतिशत मामले झूठे दर्ज कराए जाते हैं। जबकि लोकसेवकों की प्रतिष्ठा को धूमिल होने से बचाना ही विधेयक का मकसद है? तो फिर इस्तगासों के जरिए इन मामलों को दर्ज करवाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं हेती? आईपीसी की धारा 193 में इस्तगासे के लिए झूठा शपथ पत्र देने पर सात साल की सजा और असीमित जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन आखिर क्यों सरकार ने झूठे मामलों में एक भी व्यक्ति को सजा नहीं दिलवाई? सरकार की ओर से लोकसेवकों को बचाने के लिए लाया गया विधेयक चौतरफा विरोध के बाद भले ही प्रवर समिति को सौंप दिया गया है। लेकिन इस विधेयक के दो पहलू सामने आ रहे हैं। सोमवार के जब गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने यह विधेयक सदन में रखा तो बताया था कि अफसर, नेताओं पर दर्ज होने वाले 73 फीसदी मामले झूठे होते हैं। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने आंकड़े भी पेश किए, लेकिन बुधवार 25 अक्टूबर को गृहमंत्री सदन में बोले,’भ्रष्टाचार को लेकर तीन साल में 60 आईएएस-आरएएस पर भ्रष्टाचार की कार्रवाई की गई। राजस्थान अफसरों के खिलाफ मामले दर्ज करने में अव्वल है। लेकिन यह सच और भी चौंकाने वाला है कि आरटीआई के तहत मांगी गई एक जानकारी में खुलासा हुआ है कि एसीबी को दो साल में अफसर-नेताओं के खिलाफ 16,278 भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली। एसीबी ने इनमें से सिर्फ 51 मामले ही दर्ज किए। इसके अलावा प्रारंभिक जांच के लिए 89 मामले स्वीकार किए। यह जानकारी एक जनवरी 2014 से एक मार्च 2016 तक दर्ज हुए मामलों की है।

वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी का कहना है कि,’क्या कोई राज्य सरकार न्यायालय को आदेश दे सकती है कि उसे किस मामले में सुनवाई करनी चाहिए और कब करनी चाहिए? क्या पुलिस जांच के बाद भी सुनवाई करने के लिए न्यायालय को सरकार से स्वीकृति लेना जरूरी है?क्या एसीबी अथवा अन्य जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए आरोपियों के नाम प्रकाशित नहीं करने से संविधान की धारा 19 (1) में प्रदत्त’स्वतंत्रता की अभिव्यक्तिÓ का क्या मंतव्य रह जाएगा? तब क्या जरूरत है मतदान की, चुनाव की और संविधान की? सरकार ने परोक्ष रूप से घोषणा कर दी है कि उसको भी जनहित और जनतंत्र में विश्वास नहीं है। कोठारी कहते हैं कि,’एक बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष वसुंधरा सरकार के इन कदमों से बेखबर है?

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 9 Issue 21, Dated 15 November 2017)

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