कामयाब

‘कई बार सोचा, आना ही नहीं होता. सब खैरियत तो है न?’

‘मत पूछिए, आपका मकान तो बिजलीघर वाले कबाड़ी ने खरीद लिया. आजकल उसे पूरा गिरवा कर वहां मार्केट बनवा रहा है.’

हमारा जी धक से रह गया. पता नहीं क्यों हम सोच रहे थे वह वैसा का वैसा हमें मिलेगा, बस उसके छज्जे पर किसी और के कपड़े सूखते होंगे.

इसका मतलब यह हुआ कि हमारे खाली करते ही हमारे मकान मालिक के दत्तक पुत्र ने इसे हाथोंहाथ बेच डाला.

मन उखड़ गया. सोचा वापस चले जाएं, लेकिन नवाब हमें इसरार के साथ गली में ले आये, ‘हाफिज भाई भी आये हुए हैं आजकल, उनसे तो मिलते जाइए.’

जहां हमारा घर था वहां मशीनों से बहुत गहरा गड्ढा बनाया हुआ था. गली में चारों तरफ मलबा और गंदगी दिखा रही थी. हाफिज भाई की ड्योढ़ी पर एक सुरक्षाकर्मी कार्बाइन लिए तैनात था.

हम अंदर घुसने लगे ही थे कि उसने रोका. साथ का सामान अपने पास के रैक पर रखवाया तब आगे बढ़ने का इशारा किया.

अगली ड्योढ़ी में वही शैडो खड़ा मिला. उसने हमें पहचान कर नमस्ते की और कमरे के द्वार तक ले आया.

हाफिज, तीन-चार आगंतुकों से घिरे हुए थे. दिन के वक्त भी कमरे में तीन ट्यूबलाइट जल रही थीं. इतने रोशन कमरे में हाफिज भाई बुझे हुए लग रहे थे.

‘आइए भाभी, आइए राजेश भाई’ कह कर उन्होंने इस्तेकबाल तो किया लेकिन उनके चेहरे पर कोई चमक नहीं आई. आगंतुकों से वे गर्दन की हरकत से बतियाते रहे.

उनके चले जाने तक हमारा भी इरादा उठने का हो गया.

मैंने कहा, ‘मैं जरा अंदर जाकर बहनजी और बच्चों से मिल लूं.’

हाफिज ने जल्दबाजी में कहा, ‘लड़कियां तो मुंबई चली गई हैं. पढ़ाई करने और बेगम सईदा आपा के यहां गई हैं.

अरे सना-सुबूही दोनों चली गईं. कौन सा कोर्स पढ़ रही हैं वहां?

‘हमें कहां, याद रहता है. इतने मसले याद रखने पड़ते हैं. आप बताइये, कैसे आना हुआ? हाफिज भाई ने थोड़ी अधीरता दिखाई.

‘कुछ नहीं बस यहां से गुजर रहे थे तो आपका ख्याल आ गया.’  ‘बताइये साहब, दो साल में आपको एक बार हमारा ध्यान नहीं आया और आज आप चले आ रहे हैं कि हमारा खयाल आ गया.’

अब तक राजेश भी थोड़े खिंच गए, ‘मैं भी हैरान हूं कि मुझे कैसे खयाल आया.’

हाफिज भाई ने अपनी कुर्सी से उठाने की कोशिश की. वे उठ नहीं पाए. उन्होंने आवाज लगाई, ‘शैडो.’

शैडो ने अंदर आकर उन्हें खड़ा किया. उन्होंने शैडो से पूछा, ‘और कोई फरियादी है बाहर?’

‘जी नहीं.’

शैडो की मौजूदगी में ही हाफिज ने हमसे कहा, ‘कहिये आपकी क्या खिदमत करें. आपको अपना तबादला या तरक्की करवानी है तो कागज दे जाइए. बच्चे का दाखिला  हो तो अगली बार मिलना मुनासिब होगा. और भी दो एक केसेज हैं.’

राजेश का मूड पूरी तरह उखड़ चला.

‘हमें अफसोस है हम अपने पुराने दोस्त से मिलने चले आए. आप तो कोटा, परमिट, तबादला, तरक्की के दलदल में फंस गए हैं’

‘मियां देखना पड़ता है, हर तरफ देखना पड़ता है.’ हाफिज शैडो की तरफ मुखातिब हुए,  ‘हम आराम करने जा रहे हैं, कोई आए तो कहना हम घर पर नहीं हैं.’

खिन्न मन से हम बाहर आए. ‘बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले’ जैसे शेर की चोट समझ आ गई. पुराने घर के खुदे हुए गड्ढे की तरफ जरा भी न देख कर हम गंदगी से बचते-बचाते चलने लगे.

धर्मशाला के सामने वाले घर से नवाब साहब की आवाज आई, ‘हमारे गरीबखाने को भी रौशन करें भाईजान’

हम ठिठक गए. नवाब बड़े इसरार से हमें अंदर ले गए. शरारा कुरती के ऊपर शोख सुर्ख दुपट्टा ओढ़े उनकी बेगम, बारां ने हमें आदाब किया और चाय बनाने चली गईं.

नवाब साब ने हमारी नस पर उंगली रख दी, ‘एमपी साहब से मुलाकात हो गई?’

राजेश के मुंह से निकाला, ‘एमपी होकर क्या इंसान इंसान नहीं रहता! वे तो पहचान में नहीं आए.’

‘उनके ऊपर जलजला हो कुछ ऐसा आया. आपको पता है राजेश भाई, उनकी दोनों बेटियां घर छोड़ कर चली गईं.’

अब चौंकने की बारी हमारी थी, ‘अरे, कब, कैसे, कहां?

सुबूही का तो किसी से अफेयर था, ‘मेरा इतना बोलना था कि राजेश ने मुझे घुड़का, ‘तुम्हे बीच में जरूर बोलना है. नवाब साब, बड़ी हैरानी की बात है, इतने पहरे के बीच से लड़कियां चली गईं. हाफिज भाई कह रहे थे वे पढ़ाई करने मुंबई गई हैं.’

‘और क्या कहें. उनकी इज्जत का तकाजा है चुप रहें. उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई.’

तभी बारां चाय की ट्रे लेकर आ गईं. साथ में वेबे, मिठाई और नमकीन था.

बारां ने कहा, ‘सना तो संजीदा लगती थी, सुबूही के रंग-ढंग अजीब थे. मैंने तो एक बार तहमीना आपा से कहा भी था पर वे उलटे मुझ पर ही बिगड़ने लगीं.’

‘हमारे यहां भी उसके फोन आया करते थे’, मैंने कहा. ‘फोन आने से कोई भाग नहीं जाता’,  राजेश ने टोका. ‘उसकी अलग दास्तान होगी.’

नवाब साब ने कहा, ‘देखिये भाईजान जब बाप घर से दूर रहे और मां बावर्चीखाने में, तो बच्चों के भटकने में देर नहीं लगती. कई बार हमारे घर भी ये लड़कियां आतीं. बेगम से कहतीं, ‘आप कितनी खुशकिस्मत हैं बिना पर्दे आती-जाती हैं. हमारे ऊपर तो बंदिशें ही बंदिशें हैं.’

‘लेकिन बंदिशें उन्होंने मानी कहां. सना का तो पता नहीं पर सुबूही-’ जैसे ही मैंने इतना कहा राजेश फिर बमक गए, ‘तुम बीच में फतवे क्यों दे रही हो, क्या जानती हो तुम उनके बारे में?’

बारां ने कहा, ‘आपा तो अपना खयाल बता रही हैं. हम सब हैरान हुए. मुश्किल यह है कि हाफिज भाई इस हादसे की पूरी जिम्मेवारी आंटी पर डाल रहे हैं.’

‘एक तरह से बनती तो है. आखिर बेटियां उन्हीं के पास रहती थीं.’

‘आंटी की तबीयत बड़ी खराब रहती थी. वे बेचारी रात को नींद की गोली लेकर सो जातीं. उन्हें क्या पता बेटियां क्या कर रही हैं?’

‘क्या हो गया उन्हें?’

‘एंग्जायटी न्यूरोसिस,’ बारां ने बताया, ‘उन्हें हर वक्त दो फिक्रें खाए जातीं. पहली यह कि उनके शौहर दूसरी शादी न कर लें, दूसरी यह कि इन लड़कियों की शादी कैसे होगी.’

‘इतनी खूबसूरत और जहीन लड़कियों की शादी में क्या दिक्कत थी?’

‘आप नहीं जानते, हमारे सैयदों में पढ़े लिखे, नई रौशनी वाले लड़के ढूंढ़ना आसान नहीं, ऊपर से हाफिज भाई की मसरूफियत. भाभी साहब को हर वक्त तनाव रहता.’

‘मुंबई कोई इतनी दूर भी नहीं, वहां जाकर पता किया जा सकता है’.

सब किया राजेश भाई पर कोई सुराग नहीं मिला फिर मुंबई तो लड़कियों के मामले में मगरमच्छ है.’

बारां ने धीरे से कहां, ‘यह भी पक्का नहीं पता कि सन्ना और सुबूही मुंबई गईं या कहीं और?’

बड़े भारी मन से हम वहां से वापस आए. मेरे मन में रह-रहकर यही सवाल टक्कर मारता रहा, हाफिज भाई अपने को क्या समझते होंगे, कामयाब या गैर- कामयाब इंसान!

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