कहीं अकाली दल का किसान आन्दोलन सियासी तो नहीं!

कहते हैं कि सियासत में हर क्षण समीकरण बनते-बिगड़ते रहते हैं। कब, कौन, किसके साथ हो जाए और कौन, कब, किसकी सींची हुई ज़मीन पर अपनी सियासी फ़सल पका ले? कुछ कहा नहीं जा सकता है। ऐसा ही हाल पंजाब की सियासत को लेकर भी है। बताते चलें कृषि क़ानूनों के विरोध में देश भर में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा चलाये जा रहे किसान आन्दोलन को लेकर केंद्र सरकार भी डरी हुई है। केंद्र सरकार से लेकर भाजपा शासित राज्य सरकारें तक किसान आन्दोलन को समाप्त करने के लिए कोई-न-कोई बीच का रास्ता निकालने में लगी हुई हैं। लेकिन अभी तक कोई समाधान न निकलने से सरकार सकते में है कि कहीं किसान आन्दोलन और उग्र रूप न ले ले।

किसान आन्दोलन में सबसे ज़्यादा किसान पंजाब से भाग ले रहे हैं। इस लिहाज़ा से पंजाब की सियासत में पंजाब के किसानों की भूमिका अहम है। किसान आन्दोलन के चलते दिल्ली की सीमाओं पर लगभग एक साल से हलचल तेज़ है। आये दिन किसानों के प्रदर्शन के चलते पुलिस द्वारा लाठीचार्ज जैसी घटनाएँ होती हैं, जिसमें किसानों की मौतें भी हुई हैं और कई घायल भी हुए हैं।

पंजाब के चुनाव को अभी छ: महीने से कम समय बचा है। इस लिहाज़ा से पंजाब में राजनीतिक ताना-बाना बनता-बिगड़ता रहा है। शिरोमणि अकाली दल (बादल) ने 17 सितंबर को किसानों के अधिकारों के ख़ातिर और कृषि क़ानूनों के विरोध में जो केंद्र सरकार के विरोध में प्रदर्शन किया है, उसके सियासी मायने किसानों के बीच ही नहीं, बल्कि पंजाब की सियासत में बख़ूबी अलग ही निकाले जा रहे हैं।

जानकारों का कहना है कि अकाली दल ने किसानों के समर्थन में जो दिल्ली की सीमाओं पर जो प्रदर्शन किया है, उससे एक साथ कई निशाने साधे गये हैं। एक तो यह कि वो किसानों के सच्चे हितैषी हैं और केंद्र सरकार के विरोध में हैं। साथ ही केंद्र सरकार और पंजाब की सियासत में यह बताया कि उनकी राजनीतिक ज़मीन को कोई भी कम न आँके। शिरोमणि अकाली दल (बादल) का मानना है कि भले ही आज किसान आन्दोलन को लेकर विपक्ष कृषि क़ानून की बात कर रहा है; लेकिन सबसे पहले अगर किसी ने किसानों के पक्ष में आवाज़ उठायी, तो वो है अकाली दल। किसानों के अधिकारों की ख़ातिर अकाली दल की हरसिमरन कौर ने केंद्रीय मंत्री पद इस्तीफ़ा दिया था, जबकि अकाली दल सालोंसाल से भाजपा की राजनीतिक सहयोगी पार्टी भी रही है।