कविता पर कुछ सवाल और समकालीन कविता | Tehelka Hindi

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कविता पर कुछ सवाल और समकालीन कविता

harsh bala sharma

हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में जो काम हुआ है वह दूसरी भाषाओं की तुलना में खासा विस्तृत,विविध और विद्वतापूर्ण है। यह इसलिए भी हुआ क्योंकि हिंदी भाषा का निर्माण लगातार लोक भाषाओं के विकास के साथ हुआ। आज की हिंदी में इनके शब्द और तेवर भी हैं। साथ ही नई मुहावरेदानी तैयार करने की क्षमता भी। उर्दू का हिंदी में मेल इसकी सरलता, सहजता और संप्रेषणीयता और बढ़ाने के लिहाज से होता रहा है। बोलचाल की भाषा हिंदी का साहित्य भी काफी विलक्षण हैै। इसकी समीक्षा समय-समय पर होती रही है। एक अर्से से युवाओं को आधुनिक हिंदी साहित्य का संक्षिप्त परिचय देने की ज़रूरत महसूस की जा रही थी। चर्चित कहानीकार और हिंदी भाषा साहित्य की अनुभवी प्राध्यापक डा. हर्षबाला शर्मा इस दिशा में  एक शुरूआत हिंदी कविता से कर रही हैं।

 

‘ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है

इच्छा क्यों पूरी हो मन की

एक दूसरे से मिल न सके

यही विडम्बना है जीवन की।Ó

 

जीवन की विडम्बनाएं वास्तव में बहुत अधिक हैं। यह कहने का जोखिम सिर्फ कविता ही उठाती है और जीने का सूत्र भी प्रदान करती है। कविता क्या है? इस विषय पर युगों-युगों से विचार चल रहा है। कविता मानवीय भावों के सहज प्रवाह का सहज उच्छलन है अथवा, समाज बोध की पीड़ा से उत्पन्न सम्वेदना! इस विषय पर मंथन सदैव ही किया जाता रहा। काव्यशास्त्रीय नियमों में ’कविता-कविता के लिएÓ अथवा ’कविता समाज के लिएÓ जैसे विषय भी चर्चा का विषय बनते रहे। संस्कृत आचार्यों ने ’काव्य यश अथ कृते व्यवहारविदे शिवेतर रक्षयेÓ का सूत्र देकर अर्थ से अधिक वरीयता यश को दी गई वहीं अंग्रेजी में ताकतवर अनुभव का निर्झर प्रवाह कह कर भाव पर बल दिया गया। ध्यान से देखें तो साहित्य के सफर में कविता अनेक रूप धारण कर चुकी है – दरबारी कविता, आध्यात्मिक कविता, राष्ट्रीय कविता, सांस्कृतिक कविता,सुधार कविता, निज कविता आदि। किसी ने कवि को वियोगी कहकर कविता का सूत्रपात ’आहÓ से माना तो किसी ने तुलसी बाबा की पंक्तियों का सहारा लेकर ’सत्य कहूँ, लिखी कागद कोरेÓ कहकर काव्य को विनम्रता पूर्वक निज से परे ठेल दिया। आचार्य शुक्ल ह्रदय की मुक्तावस्था से कविता का सम्बन्ध जोड़ते हैं - ’जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार ह्रदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। ह्रदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कवता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं।Ó

कविता ने अपने युग धर्म को धारण किया और निभाया भी युग से प्रभावित भी हुई। युग को प्रभावित भी किया। भक्तिकाल और रीतिकाल की कविता इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। भक्तिकाल में संस्कृत के विद्वानों के समक्ष रामचरितमानस को ’वन्दे वाणी विनायका….Ó पंक्ति से आरंभ करके नम्रतापूर्वक शिष्ट भाषा के ज्ञान का परिचय देकर तुलसीदास ’जनभाखाÓ को काव्य रचना के लिए चुनते हैं। राम का राजा के रूप में एक सम्पूर्ण रूपक, भक्ति के माध्यम से रच देते हैं जहां ’कोई दरिद्र न दुखी न दीना।Ó की पुकार लगाकर वे यूटोपिया नहीं रचते बल्कि तत्कालीन शासक की आँख में उंगली डालकर अपनी अपेक्षा कविता के प्रारू में जता देते हैं। कबीर जैसा क्रांतिकारी धर्मों को उस आवरण पर सीधे चोट करने का साहस करता हैं- कविता के माध्यम से-जिस पर चोट का साहस समस्त आधुनिक चेतना से लैस कवि भी नहीं कर सके। कविता दुनिया नहीं बदलती पर दुनिया को बदलाव की ज़रूरत और क्षमता समझाती है। प्लेटो के आदर्श राज्य में कवि के लिए कोई स्थान नहीं था जबकि उसी के शिष्य अरस्तू ने माना कि कवि ही उस सत्य को देख सकता है जिसे कोई नहीं देख पाता।

कविता की विकास यात्रा से हुई पड़ताल से पहले दो प्रश्नों पर विचार आवश्यक है। पहला यह कि कविता लम्बे समय तक साहित्य के इतिहास के नज़रिये से एक केन्द्रीय स्वर का प्रतिनिधित्व करती रही। 1940-45 तक यदि – भारतेंदु युग, द्बिवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता। एक ही काल की चर्चा करंे तो कविता कथ्य अथवा शिल्प के स्तर पर कई महत्वपूर्ण प्रवृतियों का निर्वाह करती हैं। इसका एक कारण आधुनिक उस काल और युग की एक समान माँग, आज़ादी को माना जा सकता है पर यह सरलीकरण ही होगा। प्रयोगवादी कविता भी आज़ादी के स्वर से उस तरह नहीं जूझती जिस तरह प्रगतिवादी कविता। इसके अतिरिक्त एक ”अन्डर करंटÓÓ की तरह एक युग निजता तो दूसरा युग सामाजिकता को केन्द्रीय स्वर के रूप में चीन्हता भी दीखता है।

पर 1950 के बाद की कविता बहुत तेजी से बदलती हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज़ादी के कुछ ही वर्षों के भीतर मोहभंग की कविता दिखने लगती है – क्या आज़ादी का स्वप्न इतना क्षणिक था कि प्राप्ति के कुछ ही वर्षों के भीतर इस जद्दोजहद के भीतर से व्यर्थता बोध उभरा? स्वतंत्रता के साथ ही विभाजन ने कवि को बेचैन किया और कविता उत्सवधर्मिता के भीतर छिपी हजारों लोगों के बेघर होने की स्थिति का उत्सव न मना सकी। जिस कविता में आज़ादी का स्वप्न दिख रहा था, उसी के अगले चरण में व्यर्थता बोध भी स्पष्ट नज़र आने लगा।

हर युग और काल का जिस प्रकार केन्द्रीय स्वर था ठीक उसी तरह हर काल में कुछ व्यक्तियों के माध्यम से कविता की पहचान भी होती रही है जैसे – भक्तिकाल में तुलसी, कबीर या जायसी और आधुनिक काल में कवि भारतेंदु के नाम पर युग का नामकरण ही हैं, पर निराला, प्रसाद, अज्ञेय के बाद किसी युग विशेष का प्रतिनिधित्व कवि अथवा कवि समूह द्वारा दिखाई नहीं देता। यह प्रश्न आमतौर पर उपेक्षित ही रहा है पर यदि युगीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में देखा जाए तो 1950 के बाद की प्रवृतियों को निम्न रूपों में बाँटा जा सकता है – मोहभंग की कविता, निषेध की कविता, मिथकों की पुनप्र्रयोग की कविता, नवगीत (इसका स्वर-कथ्य और शिल्प भी भिन्न है) 1980 के बाद बढ़ते बाजारवाद के बाद प्रभाव स्वरूप (उपभोक्ता बन जाने की पीड़ा की कविता, पूंजीवाद के भयावह हमले की कविता, आपातकाल के सन्दर्भ में कविता, बाजारीकरण के कारण संवेदना के ह्रास की कविता, विस्थापितों की कविता, जंगल-जमीन छीने जाने पर विस्थापन और विद्रोह की कविता, नक्सलबाड़ी स्वर) विमर्शवादी कविता (स्त्री कविता, दलित कविता, आदिवासी कविता आदि) बाल मन की कविता।

यहां चिंता की बात है कि इतने भिन्न स्वरों का प्रतिनिधित्व करने वाली कविता को किसी एक व्यक्तित्व के जरिए पहचान पाना भी संभव नहीं हैं। ऊपर जिन विषयों को मात्र आधार के रूप में चुना गया, उनके अतिरिक्त आने वाले स्वरों की और लम्बी सूची बनाई जा सकती है। कई स्वर मद्धम हुए और फिर तीव्र। यही कारण है किसी व्यक्तित्व की अपेक्षा कविता अपनी संवेदना की तीखी धार से ज्य़ादा पहचानी जा सकती है।

यही कारण हैं कि समकालीन कविता के लिए किसी तयशुदा नाम का अभाव भी दिखता है। जगदीश गुप्त ने लगभग 44 आंदोलनों की सूची बनाई जो नई-कविता के साथ ही आरम्भ हुए थे परन्तु उनके विकास के कोई निश्चित चिह्न नहीं मिलते। समकालीन कविता कभी सही आदमी के तलाश की कविता कही जाती है तो कभी विसंगति और विद्रोह की। एक ओर अश्लीलता और विदू्रपता इस काव्य में नज़र आती है तो दूसरी और प्रेम तथा प्रकृति बोध।

डॉ. विशम्भर नाथ उपाध्याय लिखते हैं - ”समकालीन कविता अपने समय के मुख्य अंतर-विरोधी और द्वंद्वों की कविता है, समकालीन कविता में जो हो रहा है (बिकमिंग) का सीधा खुलासा है। इसे पढ़कर वर्तमान कला का बोध हो सकता है क्योंकि उसमें जीते, संघर्ष करते, लड़ते, बौखलाते, तड़पते, गरज़ते तथा ठोकर खाकर सोचते हुए वास्तविक आदमी का परि²श्य है।ÓÓ

समकालीन कविता के महत्वपूर्ण रचनाकारों में है – केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, लीलाधर जगूड़ी, विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी, श्रीकांत वर्मा, चंद्रकांत देवताले से लेकर नीलाक्षी सिंह, अनामिका, मंगलेश डबराल,अरुण कमल, वीरेन्द्र डंगवाल, ओम प्रकाश वाल्मीकि आदि कविता के लिए 1962,1965, 1971, 1984, 1990के दशक महत्वपूर्ण रहे हैं। कविता के बदलाव की पृष्ठभूमि के रूप में इन कालों के इतिहास को खंगाला जा सकता है। इनमें विषयों के मध्य भी दो स्वर केन्द्रीय प्रवृति की तरह दिखाई देते हैं – व्यवस्था के प्रति विरोध का स्वर तथा सामान्य जन के प्रति संवेदना का स्वर जिसे जनवादी स्वर भी कहा जा सकता है। एक अन्य स्वर – आस्था का है कई बार जिसका उपहास बनाया जाता। यह समझ भी ज़रूरी है कि आस्था एक शक्ति है जो काव्य ही नहीं, मनुष्य को भी जीवित रखती हैं। आस्था के इस केन्द्र में कोई भी हो सकता है, पर यहां मनुष्य है – केवल मनुष्य।

समकालीन कविता का आरम्भ कब से माना जाए – अशोक वाजपेयी 1980 को कविता की वापसी का वर्ष घोषित करते हैं। इस वर्ष अनेक कविता संगृह प्रकाशित हुए। ’पूर्वग्रहÓ पत्रिका में अशोक वाजपेयी ने सन67-68 का वर्ष पत्रिकाओं के प्रकाशन का काल घोषित किया और इसी आधार पर 1980 को कविता की वापसी का वर्ष माना। क्या इसे स्वीकार किया जाए? अथवा मैनेजर पाण्डेय की इस बात से सहमति जताई जाए जहां वह कहते हैं - ’कविता की वापसी का नारा समानांतर कहानी के नारे से भी अधिक निरर्थक हैÓमें हिन्दी कविता के सन्दर्भ में रचनाशीलता के स्तर पर ऐसा कुछ घटित नहीं हुआ, जिसके आधार पर1980 के वर्ष को कविता के वापसी का वर्ष कहा जा सकेÓ।

वास्तव मेें यह अत्यंत दुष्कर कार्य है और विद्वानों में इस विषय पर कहीं सहमति दिखाई नहीं देती। अनेक विद्वान रघुवीर सहाय के ”लोग भूल गए हैंÓÓ नामक काव्य संग्रह

(1982) से समकालीन कविता के आरम्भ की प्रस्तावना देते हैं रघुवीर सहाय जिसकी भूमिका में कविता के चारों ओर बिखरे होने की चर्चा करते हैं।

वहीं धूमिल अपनी कविता में घोषणा करते हैं-

चंद खेत हथकड़ी पहने खड़े हैं। और विपक्ष में सिर्फ/कविता है…

जगदीश गुप्त लघु मानव की पीड़ा को काव्य में स्वर देते हैं। चंद्रकांत देवताले आदिवासी महिलाओं पर होने वाले अत्याचार से तिलमिलाते हैं और कविता को हथियार मानते हैं- बदलाव का। मानवीयता के क्षरित होने से उनमें क्रोध और आक्रोश दीखता है। वे लिखते हैं - ”आग हर चीज मेें बताई गई थी। पानी, पत्थर, अन्न/घोड़ों तक में/…. मनुष्यों में आग होती ही है और होनी ही थी पर आज आग का पता नहीं चल रहा है जीवित आत्माएँ, बुझी हुई राख।ÓÓ

इस त्रासदी से आधुनिक कवि गुज़रता है। मध्यकाल तक अनास्था के वातावरण में भी ईश्वर एक शक्ति की तरह मौजूद था। कवि अपनी समस्त भावनाओं तथा पीड़ा के लिए भी उसी को सर्वस्व समर्पित करता था। यहां तक कि 1960 के दशक तक भी ’आस्था तुम लेते हो, लेगा अनास्था कौनÓ कहकर आस्था और अनास्था दोनों ही ईश्वर को समर्पित कर दी गई (त्वमेव वस्तु गोविन्दम् , त्वमेव समर्पयते) पर आधुनिक कवि तो यह कार्य भी नहीं कर सकता।

आधुनिक होने की शर्त आँख-कान खुले रखना भर ही नहीं, बल्कि कथनी और करनी दोनों में समन्वय भी है।

आज का कवि जनता का कवि है। नागार्जुन जिस जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रान्ति के नारे का समर्थन करते हैं, कविता के माध्यम से उसे ’खिचड़ी विप्लवÓ की संज्ञा भी देते हैं। असल में भक्ति, दरबार और राजतन्त्र के समानांतर और विरोध में लिखी कविता के बाद कविता स्वप्न भंग और मोहभंग की त्रासदी से गुज़रती है। ’दुखरन मास्टरÓ ने जिन आदम के सांचों को गढ़ा, वे साँचें ही रह गए। न तो दुखरन मास्टर को रोटी मिली, न ही उन आदमकद सांचों को। कवि ही नहीं हम सब भी सोचने के लिए विवश हो गए कि ’गोरे साहब गए और ब्राउन साहब आ गएÓ क्या साहबों की इस अदला-बदली भर के लिए ये सारी लड़ाई लड़ी गई थी? जब रामराज्य का स्वप्न टूटा तो कविता भला कैसे वही बनी रहती? धूमिल की ’पटकथाÓ और मुक्तिबोध की ’अंधरे मेंÓ इस युग की बड़ी कविताएं हैं जो आज़ादी के रंगों की आँतों के काले धब्बे मेें बदलने का पूरा चित्र और चरित्र दिखाती हैं साथ ही उस आदर्शवादी मन के मरने और विक्षप्त होते जाने की भयावक यातना को दर्शाती है, जो उसकी तय नियति है। बिना विराम के इतनी लम्बी कविता की ही टेक है - ’ओ मेरे आदर्शवादी मन… अब तक क्या किया/जीवन क्या जिया।Ó राजेश जोशी लिखते हैं - ’अंधेरे में केवल स्वाधीनता के बाद के समय या नेहरू युग की ही आलोचना नहीं है, वह जैसी अनतांत्रिक संरचना हमने रची है या प्राप्त की है उसके मूल अंतविरोधों और खतरों का एक आख्यान भी है।Ó

इस आख्यान मेें बदलने के लिए कविता अभिशप्त हैं। कवि कैसे स्वप्न गीत गाए जब स्वप्न बचे ही नहीं। निजता से उठकर कविता अब जन की कविता बनती है। सुन्दर कविता की नहीं। सही कविता की तलाश कवि कर रहा हैं। रघुवीर सहाय की चर्चा यहां अप्रासंगिक नहीं होगी। इसलिए नहीं कि वे आधुनिक कवि हैं बल्कि इसलिए क्योंकि उनके संग्रह से ही समकालीन कविता के बदलते मुहावरे को जोड़ा जाता है। जनतांत्रिक मूल्यों के हनन के खिलाफ वे आवाज उठाते हैं। लोकतंत्र के दमन को स्वीकार नहीं करते और आपातकाल की यातना को व्यक्त करते हैं। आपातकाल की ठंडी क्रूरता उनकी कविता में स्पष्ट दिखती है। एक पत्रकार के रूप में वे ’आपकी हँसीÓ लिखते हैं जो सत्ता की हँसी है और उस हँसी के मायने अनेक हैं। मुक्तिबोध की भूलगलती के सामने ही उनकी कविता राजा के जिरह बख्तर को पहचान लेती हैं जो प्रजा के पक्ष में कभी खड़ा नहीं होगा-

मैं आया हूँ पूरा राज्य घूमकर/प्रजा के दु:ख का वर्णन करूँगा नहीं/राजा ने प्रजा को बरसों से देखा नहीं।

इस सही कविता की तलाश के क्रम में कविता कई बार भ्रम का शिकार होती है। अकविता के क्रम में नकार और विरोध इनता प्रबल हो उठा कि कविता अपने स्वरूप को खो बैठी। नकारात्मकता अराजकता की वाहक भी बनी। सौमित्र मोहन ने अपनी कविता ’यहां पेशाब करना मना हैÓ में पेशाब करने को सिगरेट कुचलने से बेहतर मानकर आक्रोश का अच्छा तरीका माना। पर नग्नता को आक्रोश का वाहक कविता में लम्बे समय तक नहीं माना जा सकता। ऐसे में अकविता की यात्रा से कविता आगे बढ़ी और 21वीं सदी तक लम्बी यात्रा सम्पन्न हुई।

‘वागर्थÓ पत्रिका ने ’लॉन्ग नाइंटीजÓ नाम से एक बहस शुरू की जो कविता की ऐतिहासिक यात्रा को सूचित करती है। यहां Ó90 के दशक के रचनाकारों के अवदान की चर्चा की गई। सबाल्टर्न की पक्षधरता और स्वर के उभरते और विकसित होने के सन्दर्भ में Ó90 के दशक के अवदान को महत्व दिया गया।

इस लिहाज से तीन बड़े रूपों में समकालीन कविता समझी जा सकती है-

1. विरोध और जन समर्थन की कविता

2. समानांतर काव्य संसार का सृजन

3. दलित एवं स्त्री कविता

उदाहरण के रूप में आलोक धन्वा की कविता व्यवस्था के विरोध में स्वर बुलंद करती है। उनके लिए कविता-कविता नहीं ’गोली दागने की तमीज है।Ó आलोक धन्वा सामाजिक और मानवीय प्रतिबद्धता का जि़क्र करते हुए वाल्ट ह्विटमैन, टॉलस्टॉय, गोर्की, कामू से लेकर त्रिलोचन, मुक्तिबोध और केदारनाथ अग्रवाल का उल्लेख करते हैं। वे कविता को ’एक बिलकुल नई बन्दूक की तरहÓ याद करते हैं जो शब्दों के फेफड़ों में नए मुहावरों का ऑक्सीजन भरती है-

 

अब मेरी कविता एकली रही जन की तरह बुलाती है,

भाषा और लय के बिना, केवल अर्थ में उस गर्भवती औरत के साथ-

जिसकी नाभि में सिर्फ इसलिए गोली मार दी गई-

कि कहीं एक ईमानदार आदमी पैदा न हो जाए।

 

अरु ण कमल व्यक्ति और समाज दोनों को अभिन्न मानते हैं। नए इलाके में वे लिखते हैं– ’कविता निर्बलों का बल है। कविता उसका पक्ष है जिसका कोई नहीं, जो सबसे कमज़ोर और सबसे आशय है, जिस पर बाकी सबका बोझ है।Ó जीवन के छोटे छोटे उदाहरण लेकर साधारण आदमी के जीवन में होने वाले कष्टों और निर्बल के बलहीन होने की त्रासद कथा को वे कविता के माध्यम से दिखाते हैं। जीवन की विवशता को वे सपाटबयानी से दिखाते हैं-

‘कहते हैं एक चोर सेंधमार घर में घुसा/इधर उधर टो-टा किया और जब कुछ न मिला/तब चुहानी में रक्खा बासी भात और साग खा/थाल वहीं छोड़ भाग गया/वो तो पकड़ा ही जाता यदि दबा न ली होती डकार।Ó

दूसरी ओर पर्यावरणीय सरोकार, प्रेम की इच्छा और बच्चों के प्रति चिंता भी इस कविता के केंद्र में है। पिता के प्रेम और माँ को पत्र न लिख पाने की पीड़ा भी मौजूद है। मंगलेश डबराल की कविता में ’पहाड़Ó का दर्द मौजूद है, ठेठ स्थानीयता भी। राजेश जोशी वृक्षों का प्रार्थना गीत सुनते हैं, चाँद की आदतों की बात करते हैं,नन्ही मुनिया की गुनगुनाहट पर कविता लिखते हैं। कामगार बच्चों पर लिखी उनकी कविता का दर्द हर जगह बयां हुआ है-

कितना भयानक होता, अगर ऐसा होता/भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह/कि सारी चीज़ें है हस्बेमामूल/पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुज़रते हुए/बच्चे, बहुत छोटे बच्चे, कम पर जा रहे हैं।

असल में दुनिया चाह कर भी सरोकारों से अलग नहीं हो सकती। कभी कभी कविता ’पानी की प्रार्थनाÓ भी सुनती है और बाबूजी का दर्द भी पर उसके मूल में भी मानवीय संवेदना ही है। केदारनाथ सिंह की कविता में पानी स्वयं को पृथ्वी का सबसे प्राचीन नागरिक बताते हुए बाज़ार में बिकने की पीड़ा को व्यक्त करता हैं और उस पर भी तकलीफ यह कि दुनिया से पानी लुप्त होने और सिर्फ बाज़ार में मिलने में ईश्वर की सहमति है—

‘पर अपराध क्षमा हो प्रभु/और यदि मैं झूठ बोलूँ /तो जलकर राख हो जाऊँ/कहते है इसमें—/आपकी भी सहमति हैं।Ó

स्त्री कविता ने घर की देहरी के भीतर छिपे दर्द को कविता के भीतर उकेरा। निर्मला पुतुल ’अखबार बेचती लड़कीÓ या ’गजरे बेचती लड़कीÓ के माध्यम से लड़की के बिकने की तकलीफ बयाँ करती हैं-

 

वह इस बात से अंजान है कि वह अखबार नहीं

अपने आप को बेच रही है

क्योंकि अखबार में उस जैसी

कई लड़कियों की तस्वीर छपी है

जिससे उसका चेहरा मिलता है!

 

अनामिका ’चौकाÓ के बहाने औरत के गुँथ जाने और आटे के भीतर खुद को सानते जाने की भावना को स्वर देती हैं। रजनी तिलक स्त्री और दलित स्त्री के बीच के फर्क को भी कविता का विषय बनाती है- जहाँ वह मानती है और बताती है कि एक जाति की स्त्री पायलट बनती है तो दूसरी शिक्षा से भी वंचित है…

बंटी वह भी जातियों में/औरत औरत मेें अंतर है…

असल में समकालीन कविता के विषयों में बहुत अधिक वैविध्य है। रघुवीर सहाय की कविता का ठंडा क्रोध समकालीन है तो मुक्तिबोध की परम अभिव्यक्ति की खोज भी। राजकमल चौधरी का ’मुक्ति प्रसंगÓसमकालीन है और राजेश जोशी की आठवें दशक की कविता भी। नौवें दशक की बाजार से संघर्ष की कविता भी समकालीन है और दलित कविता और स्त्री कविता भी। कुंवर नारायण की ’प्रेम का रोगÓ कविता भी समकालिक है जहां कवि किसी धर्म से नफरत नहीं कर पाता क्योंकि कहीं से गालिब याद आते हैं तो कहीं शेक्सपियर…. कविता अपने युग धर्म का निर्वाह लगातार कर रही है और दायरों का विस्तार भी। अब महाकाव्य भले ही नहीं लिखे जा रहे, कविताओं की प्रकृति बदली है। कविताएँ लघु भी हुई और सपाटबयानी से युक्त भी, पर यह समझना होगा कि कविता जन के और अधिक निकट आ गई है। अब यह मुक्तिपथ नहीं दिखाती, स्वयं अपना मुक्ति दाता बनना सिखाती है। कविता ’हरी भई भूमि सीरी पवन चलन लागीÓ से आगे बढ़कर ’मोचीरामÓ से गुज़र कर ’नए इलाके मेंÓ प्रवेश कर चुकी है जहां देहरी लांघें की कविताएं भी हैं,बदलाव और प्रतिबद्धता भी है, नए और अछूते विषय भी हैं और बाजारवाद के विरोध में कविता की उर्वरता भी है। कविता की इस लम्बी यात्रा को एक लेख में समेटना मुश्किल है पर अनेक संकेत यहां उसकी एक झलक प्रस्तुत करते हैं।

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