कभी मिले तो पूछिएगा !

हम आगे बढ़े. वह बोली, ‘चलो एक चीज दिखाती हूं!’ उसने इशारा किया और मैंने मोटरसाइकिल उस ओर मोड़ दी. अब हम हाल ही में बनी एक सड़क के ऊपर थे. उस सड़क का नाम एक साहित्यकार के नाम पर रखा गया था. इससे पहले कि मैं कुछ पूछता वह बोली, ‘चुपचाप देखते जाओ!’ वह सड़क के जैसे गले मिली. नवनिर्मित सड़क बोली, ‘मैं नीर भरी दुख की बदली/ उमड़ी कल थी मिट आज चली’ माहौल काफी भावुक हो गया था. बरसात को मैंने वहां से चलने के लिए इशारा किया. वहां से निकलते वक्त मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मुड़कर उस सड़क को दोबारा देख लूं.

हम दोनों काफी देर तक बेसबब इधर-उधर घूमते रहे. मैं अब उकता चुका था. मैंने उसे वापस घर चलने को कहा. उसने अपनी सहमति सहर्ष दे दी. मैं गाड़ी मोड़ने लगा. वह बोली, ‘उधर से चलो न!’ ‘नहीं उधर से नहीं, इधर से ही चलते है!’ ‘क्या दिक्कत है! उधर से ही चलो!’ ‘तुम जानती नहीं बहुत कूड़ा है उधर! बरसात के महीने में बहुत बदबू आती है!’ मेरे यह कहते ही वह गायब हो गई. जैसे आई थी वैसे ही चली गई. अचानक!

इस समय बरसात हो रही है. मगर कह नहीं सकता कि वह बरस रही है या रो रही है! कभी आप को मिले तो पूछिएगा!

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