कंगना ने तोड़े बालीवुड में महिलाओं के भ्रम | Tehelka Hindi

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कंगना ने तोड़े बालीवुड में महिलाओं के भ्रम

तहलका ब्यूरो 2018-03-15 , Issue 05 Volume 10

कंगना रानौट पिछले साल करण जौहर के काफी कार्यक्रम में बुलाई गई थी। उसने करण जौहर को भाई भतीजावाद का झंडाबरदार कहा। इसे सुनकर वहां मौजूद सैफ अली खान देखते ही रह गए।

यह पहली बार नहीं था जब कंगना ने जोर से ऐसा कहा। बॉलीवुड में ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं जो दशकों से ऐसा कहने की महज सोचते रहे हैं। लेकिन कंगना ने खुद को आज ’फायर ब्रांडÓ बना लिया है। वे बालीवुड में बाहरी कलाकार के तौर पर खुद अपनी तस्वीर बना रही हैं। सवाल यह नहीं है कि उसने क्या कहा बल्कि यह है कि उसने ऐसा कहा कैसे। कितनी सहजता से उसने कहा था। कहीं कोई तनाव नहीं। उसे जो कहना था उसने साफ तौर पर कह दिया। स्टूडियों के कमरे में बैठे दोनों सिने कलाकार उसे क्षण भर अवाक देखते रहे।

उनकी प्रतिक्रिया से लग रहा था कि कंगना की टिप्पणी एक बड़ी वजह को लेकर है। वे सकपका से गए थे। एक के पास तो शब्द ही नहीं थे और दूसरे ने अपनी हथेलियां मुंह पर रख ली थी। दोनों खिसियाई हंसी हंसते दिखे क्योंकि वे जानते थे कि जो उसने कहा वह सच है। एक जमाने में दोनों ही उस भाई भतीजावाद के चलते ही कमाते भी रहे जिसके बारे में उसने कहा था। एक वाक्य जो उसने कहा वह पत्थर की लकीर बन कर सामने आ गया। सभी के सामने यह जग-जाहिर हो गया कि फिल्म उद्योग में कितने तरह के अन्याय होते रहे हैं। वह भी उन बड़े कलाकारों द्वारा। उसे बालीवुड के सबसे खराब महोत्सव में बुलाया गया था। जिसकी गूंज पूरे साल रही।

जब भी कंगना को मौका मिला उसने फिल्मी उद्योग के उन तमाम लोगों के नाम लिए उसी बिदांस तरीके से। इनमें अध्ययन सुमन, आदित्य पंचोली और ऋतिक रोशन थे। उसकी तुलना में इनका काफी अच्छा जुड़ाव फिल्म उद्योग में है। उसने खुल कर साक्षात्कारों में उनसे अपने संबंधों के बारे में बताया। कंगना ने खासे जोर-शोर से, गुस्से में और नाटकीय लहजे में अपनी दास्तां सुनाई। वह अपनी बातों से उन लोगों को प्रभावित नहीं कर रही थी जो उसके आसपास थे। लेकिन इस देश में जैसा हो रहा है लोगों ने उसे एक ऐसा कैनवस मान लिया जिस पर जहां फंतासियां ही फंतासियां है।

कंगना एक ऐसी युवती है जो अच्छा बुरा जानती समझती है और उसमें खुलकर बोलने की भी हिम्मत है। उसकी पहली प्रतिक्रिया तब सामने आई जब अंग्रेजी शब्दों कें उसके देसी उच्चारण और उसके बोलने के अंदाज और वरिष्ठों के प्रति आदर न दिखाने पर हुआ। उसकी आलोचना करने में वे महिला और पुरूष थे जिन्होंने चुप्पी और दमन की नशीली ऊँचाइयों से लाभ उठाया।

मज़ेदार बात तो यह है कि अपनें लहजे पर ध्यान देने की बात उसे उनसे सुननी पड़ी जिन्होंने अपने प्रतीकों के ज़रिए अपनी जिंदगी को और आरामदेह बना लिया। इन हालातों में वे उस जीवन से दूर नहीं होना चाहती। कंगना की पीड़ा पारिवारिक फिल्मी पृष्ठभूमि की वे युवतियां नहीं समझ सकतीं जिन्हें खुद-व-खुद इस क्षेत्र में कामयाब होने का विशेषाधिकार मिल जाता हे। वे सहजता से कंगना को खारिज कर सकती हैं।

अमूमन यह माना जाता है कि वे महिलाएं जो अपने गुस्से और नाराज़गी को दबाती हैं। ऐसे में यह फैसला करना कि उनकी यह नाराज़गी वैध है या नहीं। यह अलग मुद्दा है। लेकिन यह एक काबिलियत है जिसमें नाराज़गी सामने आती है। ऊब और थकी हुई और बात-बात में नाराज़ होने वाली महिलाओं को पहले तो हाथों-हाथ लिया जाता है। फिर उन्हें एक किनारे फेंक दिया जाता है।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 05, Dated 15 March 2018)

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