और गरमाया मौसम,बाज़ार से गायब शरबत

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हर बार गर्मी प्रचंड होने के साथ ही बाज़ार से गायब हो जाते हैं तमाम तरह के देसी शरबते-आजम। अगर कहीं मिले भी तो कीमत भी गर्मी के तापमान के अनुरूप बढ़ी हुई। उधर दिल्ली मिल्क स्कीम (डीएमएस), मदर डेयरी और अमूल की लस्सी दही भी सहज नहीं मिलती।

लोगों की मांग के अनुसार भारत देश मेें सप्लाई नहीं है इसलिए हो रही बिचौलियों की कमाई। फिर, देश मेें चुनावी सरगर्मी है। न दफ्तरों में कहीं नौकरशाह हैं जो कुछ कर सकें।

अलबत्ता आफिस के बार भिनभिनाती मक्खियों के साथ बर्फीला शरबत, कटे खीरे-तरबूज-ककड़ी मिल जाती हैं। कहीं-कहीं आम, बेल, नींबू के शरबत बिकते दिखते हैं। दोपहर की छुट्टी हो तो लोग पेड़ों की छांव तले इन ठेलों के इर्द-गिर्द ठहरे नज़र आते हैं।

इन दिनों रमजान-उल-मुबारक का मुकद्दस(रमादान) का महीना चल रहा है। बाज़ारों में रौनक है। लेकिन देश में सुशासन की जिम्मेदारी निभाने वाले नौकरशाह भी बेखबर हैं। पार्टियां जिताने में लगे हैं। उन्हें इसकी भी परवाह नहीं कि गर्मी में लोग प्यासे तो न रहें। लेकिन सुनना किसे है? पहले शाम को रूह-अफजा का एक ठंडा ग्लास जब हलक के नीचे उतरता था तो जान में जान आती थी। उसकी नकल मेें आई ठंडे शरबत की कई कंपनियों का अपना धंधा ज़रूर चोखा है इस गर्मी में लेकिन वे उस गुणवत्ता को हासिल नहीं कर सकीं।

एक दौर था जब देश में गंगा-जमुनी तहजीब थी। संस्कृत-अरबी-फारसी और हिंदी-उर्दू में आपसी मेल और सद्भाव था। खान-पान में भी तब खासा मेल-जोल था। आज़ादी की लड़ाई में दोनों कौमों ने मिल कर आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी। आपस में खूब दिल्लगी भी होती रहती थी। हिंदुस्तानी मसाले और इत्र की पेरिस, इटली में खासी धूम थी। आज घर-घर में दीवारें खड़ी हैं। जहां हवा भी सहमी-सहमी रहती है। गंगा और यमुना नदियां भी अब तेज़ धूप में और ज्य़ादा तेज़ी से सिकुड़ती जा रही हैं। बेइंतहा गाद और गंदगी के बावजूद बनारस में बड़े एसी स्टीयर जहाज तस्वीरों में तैरते दिखते हैं। लगता है आने वाले पांच सालों में समुद्री ठगों और डकैतों के नए अवतार यूपी, बिहार, बंगाल की पट्टी पर हावी दिखेंगे। भारत में मास विकास के दौर में सौ साल पुरानी भारतीय हमदर्द कंपनी मांग के अनुरूप रूह-अफजा की सप्लाई न कर पा रही है। शासन के बस का तो नहीं, लेकिन सिविल सोसाइटी के लोगों को ज़रूर हमदर्द पर दबाव बनाना चाहिए कि रमजान के महीने में लोगों के हलक सूखे न रहें।

रूह ऐ अफजा बाज़ार से गायब है। कहते हैं इसे बनाने वाली कंपनी ‘हमदर्द’ के मालिकों में संपत्ति को लेकर-अनबन है इसका असर उत्पादन पर पड़ा है। हालांकि कंपनी इसे अफवाह बता कर खारिज करती है। उसका कहना है कि रूह अ$फजा की ऑनलाइन बिक्री जारी है लेकिन वहां इसकी कीमत आसमान छू रही है।

पाकिस्तान की हमदर्द कंपनी के एमडी उसामा कुरैशी ने ट्विटर पर लिखा है ‘रमजान में भारत को रूह अ$फजा और रूह अफजा गो मुहैया करा सकते हैं। भारत सरकार इजाज़त दे तो बाघा बोर्डर से रूह अफजा ट्रक से भेज सकते हैं।’

दरअसल 1906 में यूनानी चिकित्सक हाफिज अब्दुल मजीद ने पुरानी दिल्ली में ‘हमदर्द’ नाम का दवाखाना खोला। बाद में यूनानी तरीके से पुराने जमाने में बनने वाले शीतल पेय की उन्होंने तलाश की। उन्होंने इसे खुद बनाया और पाया कि लोगों को यह रास आ रहा है। 1947 में देश का बंटवारा हुआ। हाफिज अब्दुल मजीद की मौत के बाद उनके छोटे बेटे पाकिस्तान चले गए। कराची से हमदर्द की शुरूआत हुई। आज वहां रूह अ$फजा और रूह अफजा गो दोनों ही शीलत पेय उत्पाद खासे लोकप्रिय हैं।