ऐ भाई जरा देख के चलो… चले गए कवि नीरज

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मानव कवि बन जाता है
तब मानव कवि बन जाता है!
जब उसको संसार रुलाता,
वह अपनों के समीप जाता,
पर जब वे भी ठुकरा देते
वह निज मन के सम्मुख आता,
पर उसकी दुर्बलता पर जब मन भी उसका मुस्काता है!
तब मानव कवि बन जाता है!
– गोपालदास “नीरज”

प्रख्यात हिंदी कवि गोपाल दास नीरज नहीं रहे। लंबी बीमारी के बाद गुरुवार शाम वे इस नश्वर संसार को अलविदा कह गए। लेकिन वे मरे नहीं हैं, अपने शब्दों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।

नीरज ९३ साल के थे। पिछले मंगलवार तबबयत ज्यादा खराब होने के बाद उन्हें आगरा के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वे वेंटिलेटर पर थे और गंभीर होने के बाद उन्हें दिल्ली ”एम्स” में भर्ती किया गया जहाँ उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया। लंबे समय से नीरज की सेहत खराब चल रही थी।

लिखे जो ख़त तुझे, वो तेरी याद में, हज़ारों रंग के, नज़ारे बन गए जैसे सदाबहार गीत रचने वाले नीरव ने आज मदहोश हुआ जाए रे, मेरा मन मेरा मन मेरा मन, बिना ही बात मुस्कुराए रे, मेरा मन मेरा मन मेरा मन जैसा गीत भी लिखा। और शोखियों में घोला जाये, फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलायी जाये, थोड़ी सी शराब, होगा यूं नशा जो तैयार, हाँ…होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है भी नीरज ने ही लिखा।

उनका पूरा नाम था गोपाल दास नीरज। देश का तीसरा बड़ा सम्मान ‘पद्मभूषण’ उनके रचनाकर्म के लिए उन्हें साल 2007 में मिला। इससे पहले उन्हें 1991 में ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उत्तर प्रदेश का ‘यश भारती’ पुरस्कार भी उन्हें मिला।

नीरज का जीवन भी गज़ब का रहा। क्या नहीं देखा उन्होंने जीवन में। सुख-दुःख सब देखे। पुरावली (इटावा) में जन्में नीरज ने पान और बीड़ी बेची और रिक्शा तक चलाया। धर्म समाज कॉलेज में नौकरी के लिए जब अलीगढ़ आये तब तक एक कवि के रूप में जाने जाने लगे थे। अलीगढ़ उनका स्थाई ठिकाना बन गया। फिर शोहरत का जीवन शुरू हो गया।