एशियाई देश और विश्व कप हाकी

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अभी भुवनेश्वर से संपन्न 14 विश्व कप हाकी टूर्नामेंट में भारत छठे स्थान पर रहा। पिछले 43 साल में खेल गए 11 विश्व कप मुकाबलों में भारत एक बार भी सेमीफाइनल में प्रवेश नहीं कर पाया है। दूसरी ओर बेल्जियम जैसी टीम जो 1978 के ब्यून आयर्स विश्प कप में अपने पूल में छह में से मात्र एक मैच जीत पाई है, ने 2018 में विश्व कप पर कब्जा कर लिया। इस प्रकार 40 साल में यह टीम ‘फ र्श से अर्श’ पर पहुंच गई और भारतीय टीम जो 1971 में तीसरे स्थान पर रही थी और 1973 में विश्व कप जीतने से चूक गई थी लेकिन 1975 में कप जीत भी गई, पर उस विजय के क्रम को जारी नहीं रख पाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह के बदलाव हाकी में किए गए भारतीय हाकी के प्रबंधक उन बदलावों के अनुरूप टीम को ढाल नहीं पाए। हालांकि विश्वकप हाकी में कृत्रिम मैदान का इस्तेमाल 1986 (लंदन) से शुरू हुआ लेकिन भारतीय हाकी में गिरावट तो 1975 के बाद ही दिखने लगी थी। इसका परिणाम था कि भारतीय टीम 1978 में छठे और 1982 में पांचवें स्थान पर रही।

1986 में कृत्रिम मैदान आने के बाद भारत और पाकिस्तान दोनों की हालत और खराब हो गई। 1986 में लंदन विश्व कप में 1982 का विश्व चैंपियन पाकिस्तान पांच में से केवल एक ही पूल मैच जीत सका वह भी उस समय की सबसे कमज़ोर माने जाने वाली टीम न्यूजीलैंड से। न्यूज़ीलैंड ने इस मुकाबले में पाकिस्तान पर तीन गोल दाग कर उसकी कमज़ोर रक्षा पंक्ति की पोल खोल दी। यह बात अलग है कि पाकिस्तान ने पांच गोल कर 5-3 से यह मैच जीत लिया। पाकिस्तान को सोवियत यूनियन जैसी नई टीम ने भी 2-0 से हराया।

उधर पूल ‘बी’ में भारत भी पांच में से एक ही मैच जीत पाया, वह जीत थी कनाडा के खिलाफ। जिसने उसे 2-0 से पराजित किया। भारत को पोलैंड जैसी टीम ने भी 1-0 से परास्त किया। इसके अलावा भारत स्पेन से 1-2 से और आस्ट्रेलिया से 0-6 से हारा। पश्चिम जर्मनी के खिलाफ उसका मुकाबला 2-2 की बराबरी पर खत्म हुआ। कभी ओलपिंक खेलों के स्वर्ण पदक के मुकाबलों में उतरने वाले भारत-पाकिस्तान यहां अंतिम दो स्थानों यानी 11वें और 12वां स्थान के लिए खेले, जिसमें पाकिस्तान की टीम अतिरिक्त समय में 3-2 से विजयी रही।

1990 में भी भारत कोई अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाया और उसे 10वां स्थान मिला। लाहौर में खेले गए इस विश्व कप में पाकिस्तान ने ज़ोरदार सुधार किया और लंदन में 11वें स्थान पर रहने वाला पाकिस्तान यहां फाइनल में पहुंच कर उप विजेता बना। यहां पाकिस्तान ने पूल ‘बी’ में रहते हुए पांच में से तीन मैच जीत और एक ‘ड्रा’ खेल कर सात अंक हासिल किए। उसे एक मैच में हार का सामना करना पड़ा। यह हार उसे पश्चिम जर्मनी के खिलाफ मिली। जर्मनी ने मेजबान पाकिस्तान को एक संघर्षपूर्ण मुकाबले में 1-0 से परास्त किया।

दूसरी ओर भारत पूल ए में एक भी मैच नहीं जीत पाया। उसने सोवियत यूनियन के खिलाफ 1-1 से ड्रा खेला और आस्टे्रलिया, नीदरलैंडस, फ्रांस और अर्जेंटीना के खिलाफ मैच हारे। इस प्रकार वह अपने पूल में सबसे नीचे रहा। इतना ही नहीं नौवें स्थान के लिए मैच में अर्जेंटीना ने भारत को 1-0 से हरा दिया। देखने वाली बात यह है कि यदि पाकिस्तान कृत्रिम मैदान पर बेहतर प्रदर्शन कर सकता है तो भारत क्यों नहीं।

इस टूर्नामेट को भारत के साथ हुए बुरे बर्ताव के लिए भी जाना जाता है। कप्तान परगट सिंह की कप्तानी में लाहौर गई भारतीय टीम को बार-बार वहां के दर्शकों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। वहां के दर्शक भारतीय खिलाडिय़ों को गालियां निकालते और उन पर पत्थर और बोतलें फेंकते। इन हालात में भारत का प्रदर्शन काफी खराब रहा। इस पर टीम की ओर से चार गोल करने वाले जूड फेलिक्स ने कहा कि उन्होंने ऐसे वातावरण में भी अच्छा खेल दिखाया और चार गोल किए। फेलिक्स का कहना है कि यदि आप दिमागी तौर पर मज़बूत हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि दर्शक क्या कर रहे हैं।

सिडनी 1994

आस्ट्रेलिया के सिडनी में खेला गया यह विश्व कप भारत के लिए कुछ आस लेकर आया। यहां भारत अपने पूल बी में पांच में से दो मैच जीतने में और एक ड्रा खेलने में सफल हुआ। उसे दो मैचों में नीदरलैंडस और जर्मनी के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। इस टूर्नामेंट में भी भारत ने बेल्जियम को 4-2 से परास्त किया था। इसके बाद पांचवे से आठवें स्थान के लिए खेले गए मैचों में भारत ने शूट आउट में अर्जेंटीना को 4-1 से हराया। निर्धारित समय तक दोनों टीमें 2-2 गोल से बराबर थी। दूसरे मैच में भारत ने इंग्लैंड को 1-0 से परास्त कर पांचवा स्थान पाया। यहां पाकिस्तान का प्रदर्शन शानदार रहा। उसने पूल ए में खेलते हुए पांच में से चार मैच जीत कर आठ अंक हासिल किए। उसे एक मात्र पराजय इंग्लैंड के खिलाफ मिली जिसने उसे 2-0 से पराजित किया। इसके अलावा पाकिस्तान ने अर्जेंटीना को 3-0 से, स्पेन को 3-1 से, आस्ट्रेलिया को 2-1 से और बेलारूस को 2-0 से हराया था। फाइनल में पाकिस्तान की टक्कर नीदरलैंड्स के साथ थी। इस कांटे की टक्कर में निर्धारित समय तक दोनों टीमें 1-1 से बराबर थी। फिर शूट आउट में पाकिस्तान ने 4-1 से जीत दर्ज कर कप जीत लिया।

यह आखिरी मौका था जब किसी एशियाई देश ने विश्प कप जीता हो। इसके बाद खेले गए छह विश्व कप मुकाबलों में एक बार नीदरलैंड्स (1978), दो बार जर्मनी (2002, 2006), दो बार आस्ट्रेलिया (2010, 2014) और  एक बार बेल्जियम (2018) विजयी रहे। भारत का प्रदर्शन भी निराशाजनक ही रहा। वह 1998 में नौवें स्थान पर, 2002 में 10वें स्थान पर, 2006 में 11वें स्थान पर, 2010 में आठवें स्थान पर, 2014 में नौवें स्थान पर और 2018 में छठे स्थान पर रहा। पाकिस्तान की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं रही।

1998 में यह खिताब नीदरलैंड्स के पास चला गया। इसमें स्पेन उपविजेता रहा। जर्मनी को तीसरा स्थान मिला। पाकिस्तान अपने पूल बी में तीसरे स्थान में रह गया। उसने पांच में से तीन मैच जीते और दो हारे। अंत में पाकिस्तान पांचवें स्थान पर रहा।

2002 के विश्व कप में पाकिस्तान पूल ए में आठ टीमों में से चौथे स्थान पर रहा। जर्मनी, नीदरलैंड्स और अर्जेंटीना, पाकिस्तान से ऊपर और स्पेन, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और बेल्जियम पाकिस्तान से नीचे रहे। 2018 का विश्व चैंपियन बेल्जियम 2002 में अपने पूल में एक भी अंक अर्जित नहीं कर पाया था। उसने खेले सभी सात मैच हारे थे। 2002 के विश्व कप में पाकिस्तान फिर से पांचवे स्थान पर रहा।

2006 में पाकिस्तान का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। वह अपने पूल ए की छह टीमों में चौथा स्थान पा सका। आस्ट्रेलिया, स्पेन और न्यूज़ीलैंड की टीमें पाकिस्तान से ऊपर रहीं। अंत में पाकिस्तान की टीम इंग्लैंड से परास्त हो कर इस मुकाबले में छठे स्थान पर रही।

2010 का ट्रर्नामेंट पाकिस्तान के लिए सबसे निराशाजनक रहा। इन मुकाबलों में जहां भारत को आठवां स्थान मिला वहीं पाकिस्तान 12वें और अंतिम स्थान पर रहा। 2014 में पाकिस्तान विश्व कप में भाग नहीं ले सका। 2018 में उसका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा। चार टीमों के पूल डी में रह कर वह क्रास ओवर मैच में बेल्जियम से 0-5 से हार कर प्रतियोगिता से बाहर हो गया।

हाकी के खेल में यदि एशियाई देशों की बात करें तो व्यवहारिक रूप से वह बात भारत और पाकिस्तान के बारे में ही होती है। हालांकि मलेशिया, दक्षिण कोरिया और चीन ने भी बीच-बीच में चमक दिखाई है पर मुख्य मुकाबला भारत और पाकिस्तान के बारे में ही होता है। विश्वकप की शुरूआत पाकिस्तान के एयरमार्शल नूर खान ने की थी। यह विचार भी उन्हीं का था। एफआईएच ने ब्रसन्स मेें 12 अप्रैल 1970 को हुई बैठक में इस अपना लिया और पहला विश्व कप 1971 में बार्सिलोना (स्पेन) में खेला गया। यहां पाकिस्तान विजयी रहा। यदि आंकड़ों में जाए तो पता चलेगा कि पहले पांच विश्वकप जो घास के मैदान पर खेले गए उनमें से चार एशियाई देशों पाकिस्तान (तीन), और भारत (एक) ने जीता। यूरोपीय देश एक ही बार जीत पाया। वह था 1973 का एम्सट्रडम में खेला गया विश्व कप जिसे नीदरलैंड्स ने भारत को 3-2 से कर जीता था।

वह एक यादगारी फाइनल था। इस मैच ने नीदरलैंड्स ने अपने पेनाल्टी कार्नर विशेषज्ञ की मदद से पहले पांच मिनट में एक गोल की बढ़त ले ली। पर भारत के सुरजीत सिंह ने अगले दो पेनाल्टी कार्नर गोल कर भारत को 2-1 से आगे कर दिया। पर टी क्रूज़ ने नीदरलैंड्स को फिर बराबरी दिला दी। इस तरह मैच 2-2 की बराबरी पर खत्म हुआ।

अतिरिक्त समय के जब 31 सेकेंड बचे थे तो भारत के पास विश्वकप चैंपियन बनने का एक सुनहरा अवसर आया जब उसे पेनल्टी स्ट्रोक मिला। टीम में काफी विचार विमर्श के बाद बिलीमोगा पुट्टास्वामी गोविंदा को यह स्ट्रोक लेने के लिए बुलाया। हालांकि गोविंदा पूल मैच में जर्मनी के खिलाफ पेनाल्टी स्ट्रोक गंवा चुका था। गोविंदा ने स्ट्रोक लिया पर एक बार फिर असफल रहा। नीदरलैंड्स के गोल रक्षक मार्टिन सिकिंग ने उसे बचा लिया। इसके बाद ‘टाईब्रेकर’ में भी गोविंदा गोल नहीं कर पाया। ऐसा ही हरचरण सिंह से हुआ। दूसरी ओर नीदरलैंड्स ने अपने पहले चारों स्ट्रोक गोल में बदल कर 4-2 पर मैच और विश्वकप जीत लिया।

पाकिस्तान के हिसाब से देखें तो 1971 का विश्व कप विजेता 1973 में चौथे स्थान पर पिछड़ गया। इसका मुख्य कारण था प्रमुख पाकिस्तानी खिलाडिय़ों पर ‘बैन’ लगना। 1972  म्युंनिक  ओलंपिक खेलों के फाइनल में जर्मनी से 0-1 से हार कर पाकिस्तानी खिलाडिय़ों ने ‘मैडल’ दिए जाने के अवसर पर जो हंगामा किया उसके कारण उसके ‘टॉप’ के 20 खिलाड़ी इस विश्वकप में नहीं खेल सकते थे। इसे देखते हुए पाकिस्तान ने अपने पुराने कप्तान और ‘राईट विंगर’ खालिद मेहमूद को बुला लिया। इसके साथ ही तनवीर दर को भी टीम में लिया जो कि पूरी तरह फिट नहीं था। पर तनवीर ने अपनी प्रतिभा दिखाई और ‘लीग मैचों’ में वह सर्वाधिक गोल करने वाला खिलाड़ी बना। इनके साथ आज़म को ‘राईट इन’ रखा गया। 1971 का शानदार खिलाड़ी सली मुल्लाह और मंज़ूर सीनियर और मंज़ूर जूनियर को भी टीम में डाला गया। इनके अलावा कई और पुराने खिलाड़ी भी टीम डाले गए। इस प्रकार देखा जाए तो यह पाकिस्तान की ‘ बी’ टीम थी। पर फिर भी जो खेल इस टीम ने दिखाया वह काबिले तारीफ रहा।

1986 में विश्व कप मेंकृत्रिम टर्फ के आने से नतीजे एकदम बदलने लगे। 1986 के लंदन विश्व कप में 12 टीमों में पाकिस्तान 11वें और भारत 12वें स्थान पर रहा। इस तरह 1986 से 2018 तक खेले गए नौ विश्व कप मुकाबलों में एशियाई देश (पाकिस्तान) केवल 1994 में विजयी हो पाया। आज की हाकी में यदि एशियाई देशों को विश्व में अपनी जगह बनाती है तो उन्हें अपनी गति और दमखम के साथ फुर्ती पर भी काम करना होगा।

यदि 2018 के विश्वकप को देखें तो पाएंगे कि नीदरलैंड्स ने भारत के खिलाफ जो बराबरी का गोल पाया था वह उस समय हुआ जब पहला क्र्वाटर खत्म होने में मात्र पांच सेकेंड बचे थे। नीदरलैंड्स के खिलाड़ी ने 23 मीटर की लाइन के पास से फ्री हिट भारत की ‘डी’ में फेंकी और वहां खड़े ‘डच’ खिलाड़ी की स्टिक से उछली गेंद गोल कीपर के दाएं हाथ के तरफ से गोल में चली गई। कारण यह था कि गोल कीपर समेत सभी खिलाड़ी यह मान बैठे थे कि क्र्वाटर तो खत्म ही है। तभी तो एक ‘डच’ खिलाडी ने बाद में टिप्पणी की थी कि भारतीय खिलाडिय़ों को पता होना चाहिए कि हाकी मैच मेें एक क्र्वाटर 15 मिनट का होता है 14 मिनट 55 सैकेंड का नहीं।