एक मात्र हथियार

धर्मों (मज़हबों) के बीच झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके कारण कई हैं; लेकिन मुख्य कारण सियासत है। जबसे धर्मों के सहारे सियासत होनी शुरू हुई है और धर्मों के कट्टरवादी समर्थक सियासत में आये हैं, तबसे सियासत क्रूर हुई है। यही वजह है कि सभी धर्मों के अुनयायियों के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसे रोका नहीं जा सकता? इसका सीधा सा जवाब है- बिल्कुल रोका जा सकता है। इसके लिए शिक्षा ही एक मात्र हथियार है।

लेकिन शिक्षा का मतलब यह भी नहीं है कि पढ़-लिखकर लोग ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दें। यहाँ शिक्षा का मतलब लोगों का पढ़ा-लिखा होने के साथ-साथ संस्कारवान और सदाचारी होने से भी है। इससे इंसान का घमण्ड मरता है और जब इंसान में घमण्ड नहीं होता, तभी वह ईश्वर और दूसरों का अस्तित्व स्वीकार करता है। इतिहास में ऐसे अनेक लोगों का ज़िक्र है, जिन्होंने घमण्ड के चलते ईश्वर का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं किया। इनमें कइयों ने तो ख़ुद को ही ईश्वर बता डाला। लेकिन उनका हश्र क्या हुआ? वही मौत! ईश्वर तो है ही; और उसका अस्तित्व हम सबको स्वीकार करना भी चाहिए। ईश्वर के अस्तित्व को तो विज्ञान तक को स्वीकार करना पड़ा। अगर ईश्वर नहीं होता, तो बहुत कुछ आश्चर्यचकित कर देने वाला हमारे सामने नहीं घटता। बहुत कुछ हमसे छिपा हुआ नहीं होता। हमारी समझ से कुछ भी परे नहीं होता।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि वह अलग-अलग है अलग-अलग नामों के चलते उसको बाँटा नहीं जा सकता; जैसा कि लोग करते हैं। यह तो महामूर्खता है। अलग-अलग भाषाओं में जैसे हम एक ही अर्थ वाले शब्दों का उच्चारण अलग-अलग करते, सुनते हैं; ठीक इसी प्रकार ईश्वर के भी अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम होते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि ईश्वर बँट गया या सबका ईश्वर ही अलग-अलग है। ईश्वर के एक होने का दावा दुनिया का हर धर्म करता है। लेकिन बावजूद इसके हममें से कितने ही लोग मज़हबों की दीवारों में ख़ुद को बँटा हुआ मानते हैं और इसी के चलते ईश्वर को भी बँटा हुआ मानते हैं।

फिर झगड़ा किस बात का? झगड़ा इसलिए है, क्योंकि हर धर्म में कट्टरपंथी लोग हैं, जो एक-दूसरे को दुश्मन मानकर एक-दूसरे पर आक्रामक रहते हैं। सियासत यही चाहती है। क्योंकि सियासतदानों को सत्ता सुख चाहिए। जबकि सत्ता का मक़सद समाजसेवा होना चाहिए। लेकिन अब सत्ताधारी स्वपोशी, परजीवी और अत्याचारी होते जा रहे हैं। सवाल यह है कि अब उसकी निरंकुशता पर कोई अंकुश लगाने वाला क्यों नहीं है? धर्म है। लेकिन इसके ठेकेदार अब भोग-विलासी हो चुके हैं। पहले सत्ताएँ धर्म से डरती थीं। लेकिन पहले साधु, सन्त, सन्यासी, पीर, फ़क़ीर तपस्वी, सिद्धिधारी, निष्कामी और निष्पाप होते थे। राजा-महाराजा न सिर्फ़ उनका सम्मान करते थे, बल्कि उनसे डरते भी थे। यही वजह है कि सत्ताधारी धर्म के रास्ते को सर्वोपरि मानते थे और अपने कर्तव्यपालन से मुँह नहीं फेर पाते थे। लेकिन अब साधु, सन्त और फ़क़ीर ही आलीशान बंगलों में रहते हैं। ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी जीते हैं। और यह सब उन्हें सत्ताओं के रहम-ओ-क़रम पर ही हासिल होता हैं; क्योंकि अब धर्मों का चोला ओढ़े बहुत-से लोग ख़ुद गुनाहों की दलदल में धँसे हुए हैं और सत्ताओं के गुनाहों में बराबर के शरीक़ बने हैं। आज दर्ज़नों ऐसे नाम हैं, जो देखने और कहने भर के लिए साधु, सन्त, फ़क़ीर हैं; लेकिन वास्तव में कामी, क्रोधी, अत्याचारी, लोभी और भोगी-विलासी हैं। सब ऐसे नहीं हैं। लेकिन जो ऐसे नहीं हैं, उनका जीवन कठिन है। उन्हें सत्ताएँ न पसन्द करती हैं और न ही उनका सम्मान करती हैं। स्वर्गीय स्वामी अग्निवेश इसका एक बड़ा उदाहरण हैं। उनके साथ सत्ताओं ने वही किया, जो एक अपराधी के साथ किया जाता है। लेकिन उन्होंने एक तपस्वी सन्त की तरह ही सत्ता के आगे घुटने नहीं टेके और वही कहा, जो निरंकुश सत्ता से एक सन्त को कहना चाहिए। लेकिन आज बहुत-से साधु, सन्त, फ़क़ीर और समाजसेवी असल में अपराधी हैं।