एक नदी का मर्सिया

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यमुना की मौत का एक और साइड इफेक्ट है. सालों साल से हम अपना मल-मूत्र, कचरा, प्लास्टिक जैविक-अजैविक जो यमुना में बहाते आ रहे हैं तो क्या नदी वैसे ही बनी रहती. नहीं. विशेषज्ञ बताते हैं कि धीर-गंभीर और अपनी गहराई के लिए मशहूर यमुना उथली हो गई है. मानसून के दौरान इसमें जो पानी आता भी है वह भूगर्भीय जल को रीचार्ज करने से पहले ऊपर ही ऊपर आगे बढ़ जाता है. जल्द ही हमें इसकी भी कीमत चुकानी पड़ेगी. खैर, अपना सब कुछ गंवा कर और जमाने का नरक लाद कर यमुना आगे बढ़ जाती है. दनकौर के पास गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और बुलंदशहर का कचरा समेटे हिंडन नदी यमुना की बची-खुची सांस भी छीन लेती है. एक समय में यह नदी यमुना को जीवन देती थी.

यमुना का अगला पड़ाव है भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा. मथुरा से पहले यमुना वृंदावन आती है. यहां चीर घाट पर भक्त ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का नारा लगाते हुए मिलते हैं. समय की मांग है ‘नदी सेवा, नारायण सेवा,’ जिसे कोई नहीं सुनना चाहता. कृष्णभक्त रसखान ने कभी लिखा था कि जो खग हौं तो बसेरो करौं, मिलि कालिंदी-कूल-कदम्ब की डारन. उनकी कामना थी कि यदि ईश्वर अगले जन्म में उन्हें पक्षी बनाए तो उनका बसेरा कालिंदी यानी यमुना किनारे खड़े कदंब के पेड़ों पर हो. आज की तारीख में रसखान निश्चित पुनर्विचार करते.

वृंदावन में हमारा सामना अव्यवस्थित घाट, काम चलाऊ सुविधाओं और सड़क की जगह तीन किलोमीटर लंबी धूल भरी पगडंडी से होता है. इन सबसे पार पाकर जब हम चीर घाट पहुंचते हैं तो वहां नदी की धार के समानांतर पूरे वृंदावन का सीवर समेटे एक नाला भक्तों का स्वागत करता दिखता है. ठीक उसी जगह, जहां श्रद्धालु स्नान करके पुण्य कमा रहे हैं वहीं यह नाला भी खुद को यमुना में विसर्जित करके पापमुक्त हो रहा है. आंध्र प्रदेश के किसी गांव से आए श्रद्धालुओं का पूरा जत्था यहां कर्मकांड में लीन है. एक भक्त से यह पूछने पर कि यहां स्त्रान-पूजा करने पर आपको दिक्कत नहीं होती है, उनका जवाब धर्म की ध्वजा बुलंद करने वाला होता है. वे कहते हैं, ‘यमुना माता को कोई क्या गंदा करेगा. ये सब इसमें आकर पवित्र हो जाते हैं.’ यानी चीर घाट पर भी यमुना के चीर हरण की किसी को परवाह नहीं थी. यमुना में फूल-धूप-दीया बत्ती चढ़ाने वाले खुद को पापमुक्त मानकर आगे बढ़ जा रहे थे यह मानकर कि नदी तो खुद ही देवी है, उसे कोई क्या गंदा करेगा.

आगे बढ़ते हुए हम मथुरा पहुंचते हैं. यहां हमारा सामना मसानी नाले से होता है. गर्मी के इस मौसम में अनुमान लगाना मुश्किल है कि मसानी नाला बड़ा है या यमुना बड़ी है. श्मशान के किनारे से बहने के कारण शायद इस नाले का नाम मसानी नाला पड़ गया है. पास ही चाय की दुकान पर बैठे पुरुषोत्तम यादव यमुना की दुर्दशा पर चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘यमुना तो सूखती-भीगती रहती है. मसानी बारहमासी है.’ मथुरा का नाम भगवान कृष्ण और यमुना के रिश्तों की अनगिनत कथाओं से जुड़ा हुआ है. लेकिन यहां भी हमें यमुना की वही दशा देखने को मिलती है जैसी बाकी जगहों पर है, कहीं कोई अंतर नहीं. भगवान कृष्ण की जन्मस्थली का गर्व रखने वाले मथुरावासियों को विचारने का वक्त नहीं है कि उनकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही यमुना नाला क्यों बन गई है. कुरेदने पर वे सरकार को कोसते हैं और जब अपनी जिम्मेदारियों को निबाहने की बात छिड़ती है तो टाल-मटोल करने लगते हैं. यमुना की दुर्दशा में मथुरा कुछ योगदान औद्योगिक कचरे से भी देता है. यहां सस्ती साड़ियों की रंगाई का बड़ा कुटीर उद्योग है.

रंगाई-पुताई के बाद सारा रसायन यमुना के हवाले कर दिया जाता है. यह शहर निकिल से बनने वाले नकली आभूषणों का भी बड़ा उत्पादक है. इनके निर्माण से लेकर घिसाई और चमकाई में बहुत सारे रसायनों का इस्तेमाल होता है और ये सब बेचारी यमुना को ही समर्पित किए जाते हैं. 

आगे महाबन है. कृष्ण भक्त रसखान की चार सौ साल पुरानी समाधि यहीं यमुना के किनारे बनी है. यहीं गोकुल बैराज भी बना है. यमुना यहां से बढ़ती हुई आगरा पहुंचती है जो इसके तट पर बसा दूसरा सबसे बड़ा शहर है. यहां भी नदी के साथ बाकी शहरों वाली कहानी दोहराई जाती है. दीपक की तली से लेकर सिर तक अंधेरा हमें आगरा में देखने को मिलता है. यमुना पर बने नयापुल से सटा हुआ यमुना एक्शन प्लान का दफ्तर है और उसके ठीक बगल से शहर का एक बड़ा-सा नाला बिना रोक-टोक के यमुना में मिल रहा है. नदी के उस पार ताजमहल है. ताजमहल के ठीक पीछे महज सौ मीटर की दूरी पर शहर का एक और बड़ा नाला नदी में खुल रहा है. यमुना और ताजमहल के बीच मरे हुए जानवर की लाश चील-कौए नोच रहे हैं. विदेशी खूब प्यार से इस मनमोहक दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे हैं. ताजमहल से ही सटा हुआ दशहरा घाट है. यहां एक पुलिस अधिकारी खुद ही घाट की साफ-सफाई में लगे हुए मिलते हैं. हम हैरान हैं. पूछने पर पता चलता है कि वे आगरा के पर्यटन थाने के एसओ सुशांत गौर हैं. उनसे बातचीत में पुलिस विभाग की अलग ही तस्वीर सामने आती है. अपने देश, अपने शहर और अपने लोगों की पहचान के प्रति बेहद जागरूक और चिंतित सुशांत किसी वीआईपी के आगमन से पहले खुद ही व्यवस्था की कमान अपने हाथ में लिए हुए हैं. वे कहते हैं, ‘ये विदेशी हमारे बारे में क्या छवि लेकर जाते होंगे. हर दिन मैं लोगों को समझाता रहता हूं कि अपना कचरा यहां न डालें. मैं खुद हाथ में झाड़ू लेकर खड़ा हो जाता हूं. शायद मुझे देखकर लोगों पर कुछ असर पड़े.’

आगरा में यमुना की कुछ और मौतें हैं. हाथीघाट पर शहर का सबसे बड़ा धोबीघाट है. यहां सीवर के पानी में लोगों के कपड़े चकाचक करने का कारोबार चलता है. इसके लिए कपड़े धोने वालों ने बड़ी-बड़ी भट्टियां लगा रखी हैं. इन भट्टियों में नदी का पानी गर्म करके उसका इस्तेमाल किया जाता है और उसे फिर नदी में बहा दिया जाता है. गर्मी, डिटरजेंट और दूसरे रसायनों से भरपूर यह पानी जलीय जीवन के ऊपर कहर बनकर टूटता है. एक धोबी, जो पहले कैमरा और साथ में पुलिस का एक जवान देखने के बाद भागने लगा था, काफी मान-मनौव्वल के बाद सिर्फ इतना कहता है, ‘पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे हैं. दूसरा काम क्या करेंगे. हमें कोई और जगह दिला दीजिए, हम चले जाएंगे.’

इतनी मौतों के बाद यमुना में कुछ बचता नहीं. लेकिन नदी जो सदियों से बहती आई है वह आगे बढ़ती है. आगरा के बाद यमुना उस इलाके में पहुंचती है जहां इंसानी विकास की रोशनी थोड़ी कम पड़ी है. आगरा से लगभग 80 किलोमीटर आगे बटेश्वर है. यह मंदिरों और घंटे-घड़ियालों का नगर है. नदी की बीच धारा में मंदिरों की पंक्ति बिछी हुई है. कहते हैं एक समय में इन मंदिरों की संख्या 101 हुआ करती थी. फिलहाल बीच धारा में 42 मंदिर आज भी देखे जा सकते हैं. यहां घंटे चढ़ाने का रिवाज है. मेला भी लगता है और चंबल के मशहूर डाकुओं में यहां घंटा चढ़ाने की स्पर्धा भी अतीत में खूब होती रही है. हम राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या दो पर चलते हुए इटावा पहुंचते हैं. शहर से करीब 25 किलोमीटर आगे राष्ट्रीय राजमार्ग से अलग उत्तर दिशा की तरफ एक पतली सड़क भीखेपुर कस्बे तक जाती है. भीखेपुर से लगभग बीस किलोमीटर और आगे बीहड़ में यमुना का चंबल नदी के साथ संगम होता है. यहां दोनों नदियां मिलने के बाद जुहीखा गांव पहुंचती हंै. जुहीखा पहुंच कर रास्ता खत्म हो जाता है. आगे जाने के लिए पीपे का पुल हर साल बनता है जो बरसात में टूट जाता है. पिछले साल की बरसात में कुछ पीपे बह गए थे, इसलिए इस बार पुल नहीं बन पाया है.

इस इलाके को पंचनदा कहा जाता है. इसकी वजह यह है कि यहां थोड़ी-थोड़ी दूर पर यमुना में चार नदियां मिलती हैं- चंबल, क्वारी, सिंधु और पहुज. इस तरह पांच नदियों के संगम से मिलकर बनता है पंचनदा. लेकिन हम पंचनदा तक नहीं पहुंच सके. जुहीखा में जहां सड़क खत्म होती है वहां से लगभग एक किलोमीटर रेत में आगे बढ़ने पर यमुना की पतली धारा बह रही है. पानी साफ है क्योंकि चारों नदियों ने मिलकर यमुना को नया जीवन दे दिया है. इनमें सबसे बड़ी चंबल है. देश और दुनिया की कुछेक सबसे साफ-सुथरी नदियों में चंबल का नाम शुमार है. जहां चंबल यमुना में मिलती है वहां यमुना और चंबल के पानी का अनुपात एक और दस का है.

खैर, यमुना के प्रदूषण की मार से देश की सबसे साफ-सुथरी नदी चंबल भी नहीं बच सकी है. चंबल अपने अनोखे और समृद्ध जलीय जीवन के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध है. इसमें मीठे पानी की डॉल्फिनें मिलती है. चंबल का सबसे विशिष्ट चरित्र है भारतीय घड़ियाल. घड़ियाल सिर्फ चंबल में पाए जाते हैं. 2008 में अचानक ही ये घड़ियाल मरने लगे. दो महीने के भीतर सौ से ज्यादा घड़ियालों की मौत हो गई. इस आपदा के कारणों को जानने और रोकने के लिए वरिष्ठ सरीसृप विज्ञानी रौमुलस विटेकर के नेतृत्व में एक टीम ने जांच रिपोर्ट तैयार की थी. रौम कहते हैं, ‘शुरुआती सारे सबूत एक ही तरफ इशारा करते हैं- यमुना. इस नदी को हमने जहर का नाला बना दिया है. बहुत ईमानदारी से कहूं तो मौजूदा हालात में घड़ियालों और डॉल्फिनों के ज्यादा दिन तक बचे रहने की संभावना नहीं है. मौजूदा कानूनों के सहारे नदी को प्रदूषित कर रहे सभी जिम्मेदार लोगों को रोका नहीं जा सकता. एक अरब की भीड़ से कैसे निपटेंगे आप?’ घड़ियालों की मौत में यमुना की भूमिका पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने वाले घड़ियाल कंजरवेशन अलायंस के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर तरुन नायर कहते हैं, ‘हमारे टेलीमिट्री प्रोजेक्ट में यह बात सामने आई कि 2008 में बहुत-से घड़ियालों ने अपने घोंसले यमुना-चंबल संगम के बीस किलोमीटर के दायरे में बनाए थे. इसी बीस किलोमीटर के इलाके में ही सारी मौतें हुई थीं.’

घड़ियालों की मौत का दाग अपने सिर पर लेकर यमुना बीहड़ से आगे एक बार फिर खुले मैदानों की ओर बढ़ जाती है. बुंदेलखंड (काल्पी, हमीरपुर) के कुछ इलाकों को छूती हुई यह इलाहाबाद पहुंचती है. हजार मौतें मरने के बाद यह अपना अस्तित्व अपनी सहोदर गंगा में समाहित कर देती है. लोग इसे प्रयाग का विश्वप्रसिद्ध संगम कहते हैं. इतना सब जानने के बाद कोई पूछेगा कि आखिर यमुना की समस्या का उपाय क्या है. हमने यह यात्रा उपाय बताने के लिए नहीं की थी, हमारा मकसद सिर्फ यमुना की दशा खुद जानना और अपनी आंखों देखी लोगों के सामने रखना था. उपाय के सवाल पर जल-थल- मल विषय पर शोध कर रहे वरिष्ठ पत्रकार सोपान जोशी कहते हैं, ‘हम नदी से सारा पानी निकाल लेना चाहते हैं और अपनी गंदगी उसी में बहाना चाहते हैं. आज विकसित उसे माना जाता है जिसके पास नल में पानी हो और बाथरूम में फ्लश. यमुना कभी देवी रही होगी, आज तो बिना पानी के शौचालय जैसी है, जिसमें फ्लश करने के लिए कुछ भी नहीं है.’

तो क्या कोई रास्ता नहीं है? जवाब में अनुपम मिश्र कहते हैं, ‘हमारे समाज ने बरसात में गिरने वाले पानी के हिसाब से अपनी अर्थव्यवस्था, इंजीनियरिंग तय की थी न कि बांधों और दूसरे के हिस्से का पानी छीन लाने की कला के आधार पर.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘विकास के नए विचार ने उस व्यवस्था को भुला दिया है. हम अपने शहर-गांव जल स्रोतों के रास्ते में बनाने लगे हैं. दूसरे शहरों और गांवों के हिस्से का पानी छीन लाने के मद में ऊपर से गिरने वाले पानी का मोल भूल गए हैं. जमीन और नदी से जितना लेना है उतना ही उसे बरसात के महीनों में लौटाना है, यह फार्मूला दरअसल हम भूल गए हैं. पानी के लिए जमीन छोड़ना भूल गए हैं. इसे ही आप चाहें तो उपाय मान सकते हैं.’

 

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