एक ऐसा मंदिर, जो बन गया हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

बरेली का लक्ष्मी-नारायण मंदिर हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। इस मंदिर में हिन्दू-मुस्लिम सभी जाते हैं और इसे उस समय के बरेली के सबसे बड़े सेठ फज़रुल रहमान उर्फ चुन्ना मियाँ ने बनवाया। इसकी कहानी बहुत दिलचस्प है। बता रही हैं मंजू मिश्रा

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दुनिया में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं, जो हमारे देश की एकता और अखण्डता का परिचय देते हैं। लेकिन धार्मिक स्थल अगर इस एकता की पहल करते हैं, तो नफरतें ऐसी एकता को तोड़ नहीं पातीं। भारत में आज भी बहुत-से ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहाँ हिन्दू, मुस्लिम जाकर एक साथ इबादत करते हैं। बरेली का लक्ष्मी-नारायण मंदिर ऐसे ही धार्मिक स्थलों में से एक है। इस मंदिर का नाम इसके मुख्य निर्माता चुन्ना मियाँ के नाम पर प्रसिद्ध है। आज लोग इसे लक्ष्मी-नारायण मंदिर के नाम से कम, चुन्ना मियाँ का मंदिर के नाम से ज़्यादा जानते हैं। यह मंदिर कैसे बना? एक मुस्लिम ने यह मंदिर क्यों बनवाया? बरेली के मुस्लिम-बहुल इलाके में बने इस मंदिर की पूजा  दुनिया में सैकड़ों ऐसे उदाहरण हैं, जो हमारे देश की एकता और अखण्डता का परिचय देते हैं। लेकिन धार्मिक स्थल अगर इस एकता की पहल करते हैं, तो नफरतें ऐसी एकता को तोड़ नहीं पातीं। भारत में आज भी बहुत-से ऐसे धार्मिक स्थल हैं, जहाँ हिन्दू, मुस्लिम जाकर एक साथ इबादत करते हैं। बरेली का लक्ष्मी-नारायण मंदिर ऐसे ही धार्मिक स्थलों में से एक है। इस मंदिर का नाम इसके मुख्य निर्माता चुन्ना मियाँ के नाम पर प्रसिद्ध है। आज लोग इसे लक्ष्मी-नारायण मंदिर के नाम से कम, चुन्ना मियाँ का मंदिर के नाम से ज़्यादा जानते हैं। यह मंदिर कैसे बना? एक मुस्लिम ने यह मंदिर क्यों बनवाया? बरेली के मुस्लिम-बहुल इलाके में बने इस मंदिर की पूजा में आज भी अनेक मुस्लिम भाई क्यों शामिल होते हैं? इन सवालों का उत्तर एक कहानी में छिपा है, जो चुन्ना मियाँ से जुड़ी है। यह कहानी है बरेली के एक सदी पहले के सेठ फज़रुल रहमान उर्फ चुन्ना मियाँ की। यह आज़ादी से पहले की बात है। फज़रुल जब महज कुछ ही साल के थे कि उनके माता-पिता गुज़र गये। घर चलाने वाला कोई बड़ा घर में था नहीं। आस-पड़ोस के सगे-सम्बन्धियों ने कुछ दिन तक तो उनकी परिवरिश पर ध्यान दिया, फिर िकस्मत के हवाले छोड़ दिया। एक रिश्तेदार उन्हें अपने साथ ले गये। लेकिन उन्हें वहाँ जी-तोड़ काम करना पड़ा। सो फज़रुल रहमान 11 साल की अवस्था में अपने टूटे हुए छप्पर वाले घर में वापस आ गये। अब उनका हाल पूछने वाला कोई भी नहीं था। वे कभी किसी का काम करा देते, कभी किसी का। इसके बदले में पेट भर जाता। मगर कभी-कभी उन्हें भूखे ही सोना पड़ता। इन दिनों लोग उन्हें फज़रू-फज़रू कहकर पुकारते थे। किवदंती है कि एक दिन उनके मोहल्ले के सेठ धर्मचन्द की नज़र उन पर पड़ी। वे फज़रू और उनके घर की स्थिति से अच्छी तरह वािकफ थे। उन्होंने पहले फज़रू को अपने बच्चों की तरह ही मानते थे। सेठ को फज़रू का पेट के लिए इस तरह दर-दर भटकना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने पहले तो फज़रू को अपने यहाँ काम देने की सोची। लेकिन, पता नहीं उनके मन में क्या विचार आया, उन्होंने फज़रू को दो रुपये दिये और कहा कि वे अपना खुद का कोई काम करें। इन दिनों फज़रुल रहमान 13 साल के थे और दो रुपये की उन दिनों आज के कम-से-कम 20,000 रुपये के बराबर तो होगी ही। फज़रुल रहमान ने एक ठेला लिया और उसी पर बिसात खाने का काम फेरी लगाकर करने लगे। एक महीने बाद फज़रुल रहमान सेठ जी के दो रुपये लौटाने पहुँचे। तब सेठ ने उनसे दो रुपये लेने से इन्कार कर दिया और पूछा कि उन्होंने अभी तक कितने रुपये कमा लिये। फज़रुल ने बताया कि काम चल रहा है, उनके पास बेचने को सामान भी है और ये दो रुपये, जो वे लौटाने आये हैं। सेठ जी ने उन्हें डाँटा और कहा कि बस तू संतुष्ट हो गया? अभी और कमा, जब तेरे पास 10 रुपये हो जायें, तब मेरे पैसे लौटाना। फज़रुल रहमान श्रद्धा से सिर झुकाये, जी कहते हुए वहाँ से वापस आ गये। करीब तीन महीने बाद फिर सेठ के दो रुपये लौटाने गये। सेठ ने फिर पूछा कि कितने पैसे कमाये? फज़रुल रहमान ने कहा 10 रुपये। सेठ जी ने यह कहते हुए फिर से लौटा दिया कि जब 20 रुपये कमा लेना, तब मेरे पैसे लौटा देना। बताते हैं कि सेठ ने इस तरह फज़रुल रहमान से कभी पैसे नहीं लिये और उनका हौसला बढ़ाते रहे। धीरे-धीरे फज़रुल रहमान के पास काफी पैसा हो गया और उन्होंने बीड़ी बनाने की फैक्टरी खोल ली। शेर छाप बीड़ी सेठ फज़रुल रहमान की ही थी। इन दिनों उनकी हिंदू-मुस्लिम दोनों भी मज़हब के लोगों से दोस्ती थी। दोनों ही मज़हबों में मनाये जाने वाले त्योहारों को वे मनाते थे। कहने वाले तो यह तक कहते हैं कि वे रामायण और गीता पढ़ा करते थे। राधेश्याम रामायण के रचयिता कवि राधेश्याम जी से उनके बहुत गहरे सम्बन्ध थे और वे उनकी रामायण का पाठ भी कराते थे। हर किसी की मदद को दौड़ पडऩे वाले फज़रुल रहमान 21-22 साल की अवस्था तक सेठ चुन्ना मियाँ के नाम से पहचाने जाने लगे थे। कहा जाता है कि सन् 1960 में जब उन्होंने लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण कराया, तब उन्होंने न केवल एक लाख दस हज़ार एक रुपया इस मंदिर के निर्माण के लिए दान दिया था, बल्कि खुद के सिर पर ईंटें आदि भी ढोयी थीं। खुद ही जयपुर जाकर लक्ष्मी-नारायण की संगमरमर की मूर्ति लेकर आये थे और मंदिर में मूर्ति स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा के दौरान उपासना में शामिल भी हुए थे। लोग तो यहाँ तक बताते हैं कि चुन्ना मियाँ मांस, मदिरा तक का सेवन नहीं करते थे। 16 मई 1960 को चुन्ना मियाँ ने इस मंदिर का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कर-कमलों से कराया। खास बात यह है कि इस मंदिर की आधारशिला भी चुन्ना मियाँ ने राष्ट्रपति से ही रखवायी थी। आज यह कहते हुए गर्व होता है कि यह मंदिर हिन्दू-मुस्लिम एकता की जीती-जागती मिसाल है। चुन्ना मियाँ के जीवन के कुछ और पहलू भी हैं, जिन पर संक्षिप्त में ही सही, पर चर्चा ज़रूरी है।

अशोक की लाट से सजा है मंदिर

चुन्ना मियाँ भारत भूमि से बहुत ही प्यार करते थे और इसके सम्मान के प्रतीकों का भी। वे इंसानियत को सच्चा धर्म मानते थे। जब लक्ष्मी-नारायण मंदिर का निर्माण हो रहा था, तब चुन्ना मियाँ ने इसके प्रवेश द्वार पर अशोक की लाट लगवायी और स्वयं मंदिर का निर्माण पूरा होने तक एक मज़दूर की तरह काम करते रहे।

उन दिनों सबसे बड़े सेठ थे चुन्ना मियाँ

कहा जाता है कि चुन्ना मियाँ उन दिनों बरेली शहर के सबसे बड़े सेठ हुआ करते थे। मंदिर निर्माण के लिए उन्होंने न केवल सबसे अधिक धन दान किया, बल्कि श्रमदान भी दिया।

सनातन धर्म पंजाबी फ्रंटियर सभा का कराया पंजीकरण

मंदिर निर्माण के बाद चुन्ना मियाँ ने सनातन धर्म पंजाबी फ्रंटियर सभा का पंजीकरण कराया। इस संस्था के लिए उन्होंने 20,700 रुपये का अनुदान दिया। दान के मामले में चुन्ना मियाँ का उन दिनों कोई सानी नहीं था। कहा जाता है कि चुन्ना मियाँ ने अपने समय में अनेक गरीबों की दिल खोलकर मदद की थी। गरीब कन्याओं के विवाह में वे दान दिया करते थे। उनके पास मदद के लिए हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही मज़हबों के लोग आया करते थे और वे बिना किसी भेद-भाव के सबकी हर सम्भव मदद करने को हमेशा तैयार रहते।

गुरुद्वारे के लिए दान कर दी ज़मीन

कहा जाता है कि देश का जब विभाजन हुआ, तो पाकिस्तान से कुछ सिख लोग बरेली में आकर बस गये थे। वे लोग जहाँ बसे उसी के बराबर में चुन्ना मियाँ की ज़मीन थी। सिखों नें गुरुद्वारा बनाने के लिए उस ज़मीन को चुन लिया। चुन्ना मियाँ ने उन पर मुकदमा दायर कर दिया। लेकिन बाद में खुद ही सिख समुदाय को वह जगह दे दी और कोर्ट की पैरवी में हुआ ख़र्च भी सिखों को अपनी जेब से दिया। पुराने लोगों की मानें, तो चुन्ना मियाँ में यह परिवर्तन गुरु ग्रन्थ साहिब की पवित्रता और महिमा के बारे में जानने के बाद आया।

माथे पर लगाते थे तिलक

चुन्ना मियाँ एक ऐसे शख्स थे, जो सनातन पूजा-पाठ के दौरान न केवल उसमें भाग लेते थे, बल्कि अपने माथे पर तिलक भी लगाते थे।

मंदिर से जुड़े हैं चुन्ना मियाँ के परिजन

चुन्ना मियाँ के जाने के बाद उनकी इंसानियत की धरोहर को उनके बच्चे आज भी सँभाल रहे हैं। आज भी उनके पौत्र-प्रपौत्र चुन्ना मियाँ के मंदिर में सेवा-भाव से लगे हुए हैं। उनके पौत्र-प्रपौत और घर की महिलाएँ आज भी मंदिर के कार्यों में हिस्सा भी लेती हैं। पूरा शहर आज भी उनके परिवार का सम्मान करता है और इस परिवार पर फख्र करता है।