एक अंतहीन इंतज़ार

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क्रिस्मिस के अगले दिन हमारी मुलाकात बस्ती के एक अधनंगे बच्चे के साथ हो गई। हमारी बिरादरी में तो नंगापन कोई बुरी बात नहीं होती क्योंकि हम तो नंगे पैदा हो कर, नगें बोझा ढो कर नंगे ही मर जाते हैं। पर मानव का बच्चा अधनंगा हो वह भी कड़कती सर्दी में, यह बात दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो और क्या है। खासतौर पर तब जब कि क्रिस्मिस पर सांता क्लाॅस दुनिया भर के बच्चों को न जाने कितने मंहगे-मंहगे तोहफे देकर गया हो यूरोप, अमेरिका आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत जैसे देशों में तो सांता क्लाॅस का सबसे अधिक इंतजार रहता है।

इस ठुठरती सर्दी में उस अधनंगे  बच्चे को देखकर बड़ी हैरत हुई। सोचा कहीं सांता क्लाॅस भी किसी सरकारी योजना जैसा तो नहीं है, जो ज़मीनी स्तर तक पहंुचती ही नहीं। ऊपर बैठे लोग और नेता ही डकार जाते हैं। फिर ध्यान आया कि शायद यह बच्चा उस कैटिगरी में आता ही नहीं होगा जिनकी लिस्ट ‘सांता क्लाॅस’ को उसके निजी सचिव ने दी होगी। यह भी हो सकता है कि यह बच्चा उस राजनीतिक दल से न हो जो सत्ता में है। आखिर ज़मीनी स्तर से तो सिफारिश बूथ और वार्ड पर तैनात किए गए छुट भैया नेता ही करते हैं। बड़ी दुविधा थी। यदि एक अधनंगा बच्चा उस कैटीगरी में नहीं आता तो फिर कौन आ सकता है? खैर, वैसे तो देश में रिवाज़ है कि जिसके पास है उसे ही और दो। उसकी झोली ‘ओवर फ्लो’ कर दो। फिर चाहे वे बैंक के कर्जे हों या सरकारी अनुदान। यहां तो हालत यह है कि यदि एक करोड़ रुपए का अनुदान मिलेगा तो उस स्कूल को जिसमें अनुदान देने वाला खुद पढ़ा हो या जहां करोड़पतियों के बच्चे पढ़ते हों , और यदि किसी क्लब को लाखों रुपए की सरकारी सहायता मिलेगी तो उस क्लब को जिसके सभी सदस्य प्रमुख नौकरशाह, बड़े फौजी अफसर या बड़े व्यापारी हों। आखिर पैसे को पैसा ही खींचता है। उस पैसे पर कोई किंतु परंतु भी नहीं हो सकता। चाहे पैसा सरकारी है पर बांटने वाले तो गैर सरकारी हैं। हमने बहुत पहले एक कहावत सुनी थी-‘अंधा बांटे रेवड़ियां मुड़-मुड़ अपने को दे।’ पर एक बड़े स्कूल और क्लब को पैसा देने वाले ‘अंधे’ नहीं दो-दो आंखों वाले थे।

चलो हमें क्या, हम तो बात कर रहे थे सांता क्लाॅस और उस अधनंगे बच्चे की। दिसंबर की ठिठुरती ठंड में उस बच्चे के लिए कोई सांता क्लाॅस नहीं आया था। फिर हमने इस विषय पर शोध किया कि सांता क्लाॅस का तोहफे बांटने का कराइटेरिया क्या है? हमने बस्ती के हर घर का मुआयना किया तो पाया कि सांता क्लाॅस की बग्घी के पहियों के निशान ग़रीबों की बस्ती की सरहद पर ही रुक गए थे उसके अंदर नहीं थे आए। उस सरहद के दूसरी तरफ बड़ी आलीशान इमारतें थी। उनमें हर घर के बाहर लंबी-लंबी गड़ियां खड़ी थी। उन कोठियों के हर दरवाजे पर सांता की बग्घी के पहियों के निशान थे। वहां जिन बच्चों की बातें सुनी वे बता रहे थे कि उन्हें सांता क्लाॅस ने क्या दिया। सेठ धनी राम के पोते के सिरहाने सोने की चेन, मंहगे कपड़े और खिलौने थे। एक नौकरशाह के बेटे को अपने सिरहाने के नीचे ढेर सी मिठाईयां, काजू की बर्फी और विदेशी पोशाकें मिली। इसी तरह हर घर में खुशी का वातावरण था। बच्चे पार्क में मिले तोहफों की नुमायश लगा कर बैठै थे। और उसी पार्क की दीवार के दूसरी ओर से बस्ती के बच्चे हसरत भरी निगाहों से इन बच्चों को मंहगे खिलौनों के साथ खेलते हुए देख रहे थे। वे खिलौने जो सांता क्लाॅस शायद उनके लिए लेकर आया था। पर ये उस बस्ती तक नहीं पहंुचे थे।

बस्ती के अधनंगे बच्चों की आंखों में एक सवाल था, कि हर साल सांता क्लाॅस के खिलौनों का ‘स्टाॅक’ बस्ती की दहलीज पर आकर ही क्यों खत्म हो जाता है? वे इंतजार करते हैं, एक चमत्कार का और प्रतीक्षा करते हैं सांता क्लाॅस की।  उसकी बग्घी बस्ती की गंदी बदबूदार गलियों में क्यों नहीं आती? इन मासूमों को भी इंतजार रहता है एक पूरे साल का कि शायद अगली बार सांता क्लाॅस की तोहफों से भरी बग्घी बस्ती में आ जाए।  उनके लिए बहुत सारे कपड़े, मिठाइयां और चाकलेट लाए क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके मां-बाप उन्हें ये सब कभी नहीं दिला पाएंगे। इस कारण बस्ती के ये बच्चे रात रात भर जाग कर उस बग्घी की आहट सुनने की चेष्टा करते  हैं जो कभी नहीं आती। उनके तकिए के नीचे कभी कोई तोहफा नहीं होता।

हमने सदियों से बस्ती के बच्चों की आंखों में देखा है एक अंतहीन इंतज़ार। इन मासूमों को कौन समझाए कि सांता क्लाॅस केवल अमीर घरों में आता है। वहां बच्चों को सुबह उठ कर अपने तकियों के नीचे मिलते हैं महंगे-मंहगे तोहफे और उनमें लिपटी नई आशाएं। पर गरीबों की बस्तियों में ऐसा नहीं होता वहां बच्चों के तकियों के नीचे से निकलते हैं- बिखरे सपनें और टूटी उम्मीदें।