एकता की क़वायद

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा और नीतीश की कोशिशें क्या रंग लाएँगी?

विपक्ष 2024 के आम चुनाव के लिए कमर कस रहा है। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा और दिल्ली आकर नीतीश कुमार की विपक्ष के नेताओं से मुलाक़ात, ये दोनों ही गतिविधियाँ सत्ता पक्ष की भाजपा को चुनौती देने की तैयारी के लिहाज़ से काफ़ी अहम हैं। उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव भी सक्रिय हैं, जिससे लगता है कि विपक्ष बिखराव से बाहर निकलकर किसी सर्वसम्मत फार्मूले के तहत एक मंच पर आ सकता है, या दो ध्रुवों में एकजुट हो सकता है; भले इसमें अभी वक़्त लगे। पूरे हालात और भविष्य की सम्भावनाओं को लेकर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

राहुल गाँधी के महँगे नीले जूते और हज़ारों की टी-शर्ट पर तंज! महँगाई, बेरोज़गारी के विरोध में और देश में एकता के लिए कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को कमतर आँकने का यह भाजपा का तरीक़ा था। जवाब में कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महँगे पेन, सूट और चश्मे की क़ीमत बतानी पड़ी। उधर भाजपा से अलग हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सितंबर के पहले पखवाड़े राजधानी दिल्ली में सक्रिय रहे। उन्होंने राहुल गाँधी से शुरू कर शरद पवार, मुलायम सिंह / अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी और अरविंद केजरीवाल सहित कई बड़े नेताओं से मुलाक़ात की, जिसका मक़सद विपक्ष को एक धुरी पर लाने की शुरुआत करना था। भले संगठित और आक्रामक भाजपा के मुक़ाबले विपक्ष की यह कोशिशें शुरुआत भर हों, भविष्य में इनके वृहद आकार लेने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। और यदि विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा साथ आता है, तो निश्चित ही साल 2024 के लिए भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ेगा।


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भाजपा से अलग होने के बाद अब उसी के ख़िलाफ़ विपक्ष को एकजुट करने की उनकी कोशिश बहुत मायने रखती है। नीतीश विपक्षी दलों को यह सन्देश भी दे रहे हैं कि कांग्रेस के बिना विपक्ष ताक़तवर नहीं हो पाएगा। हालाँकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव ग़ैर-कांग्रेसी विपक्षी मंच खड़ा करना चाहते हैं। राव हाल में जब पटना आये थे, उन्होंने कोशिश की थी कि नीतीश अगले चुनाव में प्रधानमंत्री उम्मीदवार होने की बात स्वीकार करें; लेकिन नीतीश ने ऐसा करने से मना कर दिया।

दो बार से लगातार सत्ता में बैठी भाजपा के भीतर भी अगले चुनाव को लेकर चिन्ताएँ हैं। भाजपा के बड़े नेताओं ने भले ख़ुद को जनता के सामने एक ऐसी पार्टी के रूप में पेश करने का तरीक़ा सीख लिया है, जिसे कोई हरा नहीं सकता और जो आने वाले कुछ और दशक तक सत्ता में रहेगी। इसका कारण नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता पर उसका अतिविश्वास है। लेकिन पार्टी के नेता यह भी जानते हैं कि यह सम्भव नहीं है। जनता कब किसी सरकार से ऊब जाए और उसे सत्ता से बाहर कर दे, इसकी भविष्यवाणी नहीं की सकती।

लिहाज़ा विपक्ष की एकता की कोशिशों से चिन्तित भाजपा भी है। लेकिन उसकी चतुराई यह है कि वह इसे ज़ाहिर नहीं होने देती। कांग्रेस का नेतृत्व कमज़ोर दिखे इसके लिए भाजपा एक रणनीति के तहत नीतीश के साल 2024 में प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने की बातों हो हवा दे रही है। ख़ुद नीतीश साफ़ रूप से कह चुके हैं कि वह उम्मीदवार नहीं है। हालाँकि उनकी पार्टी के नेता गाहे-ब-गाहे कह देते हैं कि नीतीश प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं। उनके ऐसा कहने की राजनीतिक ज़रूरतें हो सकती हैं।

नीतीश की सक्रियता
भाजपा से अलग होने के बाद भाजपा के ख़िलाफ़ नीतीश कुमार की सबसे बड़ी पहल सितंबर के पहले हफ़्ते दिखी, जब वह दिल्ली आये। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से सबसे पहले मुलाक़ात की। उसके बाद वह कई और नेताओं से मिले। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के मुख्यालय में पार्टी महासचिव डी. राजा से उनकी मुलाक़ात भी शामिल है। नीतीश ने माकपा नेता सीताराम येचुरी से भी भेंट की और विपक्षी एकता को लेकर चर्चा की। उनसे मुलाक़ात के बाद नीतीश ने कहा कि उनके माकपा के साथ पुराने और लम्बे सम्बन्ध हैं। कहा कि वह जब भी दिल्ली आते हैं, माकपा कार्यालय जाना नहीं भूलते।
येचुरी का कहना है कि नीतीश कुमार की विपक्ष में वापसी और भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई का हिस्सा बनने की उनकी इच्छा भारतीय राजनीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। येचुरी कहते हैं- ‘पहली बात तो मक़सद विपक्षी दलों को एकजुट करने का है, प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चयन करने का नहीं। जब समय आएगा, हम प्रधानमंत्री पद का दावेदार चुनेंगे और आपको बताएँगे।’ नीतीश हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला से भी मिले।

राहुल गाँधी के बाद नीतीश जनता दल(यू) के प्रमुख एच.डी. कुमारस्वामी से मिले। उनकी एक और महत्त्वपूर्ण मुलाक़ात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मुखिया शरद पवार से भी हुई। हाल में पवार के क़रीबी सहयोगी पार्टी नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा था कि उनके नेता पवार न तो कभी प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे, न ही उन्होंने आगे के लिए ऐसी कोई मंशा जतायी है। नीतीश पुराने मित्र और बिहार के मुख्यमंत्री रहे राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के अलावा अस्वस्थ चल रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके पूर्व मुख्यमंत्री बेटे सपा नेता अखिलेश यादव से भी मिले।

निश्चित ही यह क़वायद भाजपा को परेशान करने वाली है; लेकिन ख़ुद विपक्ष इस शुरुआत को कितना आगे तक लेकर जाएगा? यह देखने वाली बात होगी। इस कोशिश की निरंतरता पर भी उसका साथ होना सम्भव होगा।

विपक्ष का चेहरा
लोकसभा के साल 2024 के चुनाव के लिए भाजपा के पास निश्चित ही नरेंद्र मोदी इकलौता चेहरा हैं। भले भाजपा के भीतर मोदी की शख़्सियत को लेकर विचारों की भिन्नता हो, मोदी और शाह पार्टी में इतने ताक़तवर हैं कि उन्हें हटाने की बात करने की हिम्मत कोई पार्टी में जुटा नहीं सकता। मोदी के नज़दीकी नेता तो यह भी दावा करते हैं कि आरएसएस भी आज की तारीख़ में मोदी को हटाने की नहीं सोच सकता, क्योंकि वे पार्टी के लिए अपरिहार्य हो चुके हैं। बेशक वरिष्ठ और कामयाब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को मोदी-शाह के लिए चुनौती माना जाता हो, उन्हें हाल में पार्टी के सबसे ताक़तवर बोर्ड से बाहर कर दिया गया था।

ऐसे में विपक्ष के लिए सन् 2014 में भाजपा की चुनौती जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी चुनौती यह भी है कि मोदी के ख़िलाफ़ उसका चेहरा कौन होगा? भाजपा कांग्रेस को कमज़ोर दिखाने के लिए नीतीश कुमार को विपक्ष का चेहरे बनाने की मीडिया और सोशल मीडिया में मुहिम को $खूब हवा दे रही है। ख़ुद नीतीश कुमार दिल्ली में आकर कह चुके हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं। लेकिन हाल में उनकी दिल्ली यात्रा और सक्रियता से यह उत्सुकता बढ़ी है कि क्या बिहार का यह दिग्गज सचमुच विपक्षी एकता के लिए ऐसा कर रहा है, या उनकी अपनी भी कोई महत्त्वाकांक्षा है। लेकिन यहाँ सबसे दिलचस्प बात यह है कि विपक्षी एकता के लिए नीतीश जब दिल्ली आये, तो वह सबसे पहले कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से मिले। इससे ज़ाहिर होता है कि नीतीश कांग्रेस को विपक्षी एकता के लिए कितना महत्त्वपूर्व कारक (फैक्टर) मानते हैं।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, नीतीश साल 2024 के लिए कांग्रेस की योजना का बड़ा हिस्सा हैं। पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रखना चाहती है। नीतीश देश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का बड़ा और निर्विवाद चेहरा हैं। ज़ाहिर है हाल तक भाजपा का साथी होने के बावजूद नीतीश भाजपा के ख़िलाफ़ एक बड़ा और ज़्यादा स्वीकार्य चेहरा हैं। वैसा ही जैसा राहुल गाँधी हैं, जो हाल तक अकेले ही भाजपा सरकार से लड़ते रहे हैं। नीतीश की छवि बेशक राहुल गाँधी की तरह देशव्यापी न हो, उत्तर भारत और उससे बाहर भी क्षेत्रीय दलों में उनके लिए समर्थन राहुल गाँधी से इसलिए ज़्यादा होगा; क्योंकि राहुल गाँधी और कांग्रेस की मज़बूती क्षेत्रीय दलों के लिए ख़तरा है, नीतीश की नहीं।

लिहाज़ा नीतीश की क़वायद क्या रंग लाती है और कांग्रेस उनकी विपक्षी एकता की क़वायद का कितना बड़ा हिस्सा रहती है, यह देखना दिलचस्प होगा। इस का एक बड़ा कारण है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फ़िलहाल कांग्रेस से दूर दिख रही हैं। हाल में राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में उनके कांग्रेस से मतभेद सामने आये थे। तृणमूल कांग्रेस के ही नेता यशवंत सिन्हा, जो राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझे उम्मीदवार थे; को कांग्रेस ने तो समर्थन दिया था; लेकिन उप राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस की मार्गरेट अल्वा को ममता की तृणमूल ने समर्थन नहीं दिया और मतदान से दूर रही थी।

देखा जाए, तो नीतीश कुमार के मुक़ाबले ममता बनर्जी ज़्यादा बड़ी देशव्यापी छवि रखती हैं। दक्षिण से उत्तर तक लोग उन्हें जानते हैं। अनुभवी भी हैं। यह माना जाता है कि वह प्रधानमंत्री पद के लिए कोशिश कर सकती हैं। ऐसे में कांग्रेस से उनका तनाव विपक्षी एकता में आड़े आ सकता है। यह माना जाता है कि नीतीश कांग्रेस को साथ रखने के लिए ममता को मनाने की कोशिश कर सकते हैं। हालाँकि यदि ममता या राहुल गाँधी (कांग्रेस) में से एक को चुनने की नौबत आ गयी, तो नीतीश कांग्रेस के साथ जाएँगे।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव भी फ़िलहाल कांग्रेस से अलग लाइन पकड़े हुए हैं। हाल में वह पटना में नीतीश कुमार के साथ मंच साझा कर चुके हैं। राव नीतीश के मुँह से बुलवाना चाहते थे कि वह (नीतीश) प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं; लेकिन नीतीश बड़ी सफ़ाई से बच निकले थे। लेकिन यह माना जाता है कि कांग्रेस से ही निकले राव अंतत: कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं; क्योंकि वे भाजपा के विरोधी हैं। राव ख़ुद विपक्षी एकता के लिए काफ़ी सक्रिय हैं और ममता और नीतीश सहित अन्य विपक्षी नेताओं से मिलते रहे हैं। वामपंथी दल फ़िलहाल अलग पंक्ति में हैं और विपक्ष की एकता की पहला खुलकर साथ नहीं आये हैं। वैसे नीतीश ने दिल्ली दौरे में सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी से मुलाक़ात की थी। लेकिन कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के केरल में लम्बे ठहराव पर माकपा ने सवाल उठाये थे और कांग्रेस से पूछा था कि वह उत्तर प्रदेश में ऐसा क्यों नहीं करने जा रही?

विपक्ष के चेहरा बनने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी हैं। नीतीश उनसे भी मिले थे। यहाँ यह बता दें कि जब नीतीश कुमार दिल्ली के अपने समकक्ष अरविंद केजरीवाल से मिले, उस समय दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) नेता संजय झा भी मौज़ूद थे। केजरीवाल की अभी अखिल भारतीय छवि नहीं है; लेकिन वह चर्चा के केंद्र में रहते हैं। केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी पर यह भी आरोप हैं कि वह भाजपा की ‘बी’ टीम हैं। यह कहा जाता है कि भाजपा आप को उन राज्यों में इस्तेमाल करती है, जहाँ उसे कांग्रेस के मत (वोट) कटवाने हों। गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी मैदान में है, और यह माना जाता है कि जितने मत वह लेगी, उससे भाजपा नहीं, बल्कि कांग्रेस का नुक़सान होगा; क्योंकि यह सारे मत विरोधी लहर (एंटी इंकम्बेंसी) के होंगे। यदि गुजरात में आप कोई बड़ा उलटफेर कर देती है, तो निश्चित ही वह बड़ी चर्चा में आ जाएगी। पंजाब में उसने 92 सीटें जीतकर पहले ही कांग्रेस को झटका दे दिया था। ऐसी स्थिति में केजरीवाल 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए ख़ुद को विपक्ष के चेहरे के चेहरे के रूप में सामने करना चाहेंगे। और यदि कांग्रेस वहाँ भाजपा को हरा देती है, तो निश्चित ही वह विपक्ष की धुरी बन जाएगी।