उम्मीद के नए रंग

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महिला मजदूर से लोक कला के शिखर तक

भूरी बाई
भूरी बाई

करीब पच्चीस साल पहले जब भूरी बाई नाम की एक भील महिला को मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा राजकीय सम्मान  ‘शिखर सम्मान’ मिला तो बहुतों के लिए यह आदिवासी कलाकर एक पहेली की तरह सामने उपस्थित हुई थी. भूरी बाई प्रथम भील आदिवासी चित्रकार के तौर पर जब पूरी दुनिया में शोहरत हासिल करने लगीं तो कला प्रेमियों के मन में एक सहज सवाल यह उठा कि आखिर वे कैसे इस मुकाम तक पहुंचीं.

भूरी बाई आज जिस मुकाम पर हैं वहां तक पहुंचने का सपना भी उन्होंने कभी नहीं देखा था. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि आपके साथ घटी एक घटना ही आपके पूरे भविष्य की बुनियाद बन जाती है. भूरी बाई के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. यदि उनके जीवन में वह सुखद घटना नहीं घटती तो इतनी महान आदिवासी कलाकार के रूप में हम और आप उनकी कला को कभी नहीं देख पाते.

भूरी बाई की कहानी बड़ी दिलचस्प है. वे अपने पति के साथ मजदूरी की तलाश में जब सैकड़ों मील दूर का फासला तय करके राजधानी भोपाल पहुंचीं तो उन्हें एक बड़े भवन की दीवारों को खड़ा करने के काम में मजदूरी मिली. दरअसल उन दिनों वे देश और दुनिया के कला जगत की एक मजबूत नींव भारत भवन की दीवारों को खड़ा कर रही थीं. उन्हीं दिनों महान कलाकार और भारत भवन की बुनियाद के एक मजबूत स्तंभ स्वर्गीय जे स्वामीनाथन उनके पास आए. वे भूरी बाई से कुछ बातें करने लगे लेकिन हिन्दी न आने के चलते भूरी बाई को उनकी बातें समझ नहीं आईं. तब उनके साथी मजदूरों ने भूरी बाई को समझाया कि दरअसल साहब उनकी चित्रकला के बारे में समझना चाह रहे हैं. स्वामीनाथन को उन्होंने बाबा कहते हुए बताया कि यह चित्रकारी यहां संभव नहीं है. वजह यह है कि इसके लिए जो बहुत सारे रंग चाहिए वे भोपाल में नहीं मिल सकते. उन्होंने बताया कि भील आदिवासी अपने इलाके की खास किस्म की मिट्टी से काला रंग और खास किस्म की पत्तियों से हरा रंग बनाती हैं. उन्होंने बताया कि इसके लिए जो दीवार चाहिए वह भी भोपाल में नहीं मिलेगी. और उससे भी बड़ी बात तो यह है कि इसके लिए जो समय चाहिए वह भी उनके पास नहीं है. वजह यह थी कि तब उन्हें भारत भवन को बनाने के काम में छह रुपये दिन मिला करते थे. लेकिन श्री स्वामीनाथन ने जब जिद की और साथ ही यह भी कहा कि वे उनकी कला का मेहनताना देगें तो भूरी बाई ने उनके लिए कागजों पर भील चित्रकला के कुछ नमूने बनाए. स्वामीनाथन की आंखों में चमक आ गई. उन्होंने भूरी बाई से पूछा कि इस चित्रकला को आप अपनी बोली में बोलते क्या हो? भूरी बाई ने जवाब दिया बाबा यह हम भीलों के लिए पिथोरी चित्रकला है.

भूरी बाई की स्वामीनाथन से हुई यह बातचीत और उनके लिए बनाए गए पिथोरा चित्रकला के नमूनों ने आगे चलकर उन्हें लोक कला संसार में एक नई पहचान दी. वर्तमान में भूरी बाई अपनी कला का प्रदर्शन पूरे देश भर में कर चुकी हैं. उन्होंने भील पिथोरा चित्रकला को दुनिया में एक खास पहचान दिलाने के लिए अमेरिका सहित कई देशों की यात्रा भी की है. उनकी चित्रकला से प्रभावित हुए हर कलाप्रेमी को वे बताना चाहती हैं कि पिथोरा भील आदिवासी समुदाय की एक ऐसी कला-शैली है जिसमें गांव के मुखिया की मौत के बाद उन्हें हमेशा अपने बीच याद रखने के लिए गांव से कुछ कदमों की दूरी पर पत्थर लगाया जाता है. और फिर इस पत्थर पर एक विशेष किस्म का घोड़ा बनाया जाता है. यह विशेष किस्म का घोड़ा ही पिथोरा चित्रकला को खास पहचान देता है. किंतु भीलों में यह विशेष किस्म का घोड़ा बनाने की इजाजत केवल पुरुषों को ही दी जाती है. यही वजह है कि भूरी बाई ने अपनी चित्रकला की शैली में घोड़े की डिजाइन बदल दी है.

दरअसल भील आदिवासी पिथोरा चित्रों को अपने घरों की दीवारों पर बनाते हुए उनके भीतर बहुत ही सुव्यवस्थित तरीके से एक कहानी बुनते हैं. इस प्रकार पिथोरा चित्रकला में कुल चार प्रकार की कहानियां होती हैं. इन कहानियों का संदेश सिर्फ इतना होता है कि वे तीज और त्यौहारों पर अपने पुरखों को याद कर रहे हैं. दरअसल मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में प्रचलित इस पिथोरा चित्रकला के भीतर भीलों की अपनी ही दुनिया है. इसमें उन्हीं की दुनिया का रंग और रूप झलकता है. शहरी लोगों के लिए भले ही वह मनोरंजन का जरिया हो लेकिन आदिवासी तबके के लिए उनकी कला उस प्रकृति के सामने कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है जिससे उनका जीवनभर भरण-पोषण चलता रहता है.

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