उफ! बुरे फंसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश

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दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ लगे यौन उत्पीडऩ (सेक्सुअल हेरासमेंट) के आरोपों के तहत चल रही सुनवाई की रिर्पोटिंग पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने इस संबंध मे एक जनहित याचिका दाखिल की थी।

सुप्रीमकोर्ट की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ‘सेक्सुअल हेरासमेंट’ का आरोप लगाया था। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष बेंच कर रही है। सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच में जस्टिस अरूण मिश्र, रोहिंटन फाली नैरिमन और दीपक गुप्त हैं। ऐसे आरोप पर पूरा देश सन्न रह गया।

ये आरोप गंभीर इसलिए है क्योंकि इससे मुख्य न्यायाधीश की साख प्रभावित होती है। संवैधानिक तौर पर वे एक ऊंचे ओहदे पर हैं और देश की एपेक्स कोर्ट के प्रमुख हैं। चूंकि इस आरोप से घिन सी आती है और मुख्य न्यायाधीश का नाम इससे जुड़ता है इसलिए पूरे मामले की समुचित जांच होनी चाहिए। जिससे बात साफ हो।

मुख्य न्यायाधीश को बरसों औरों के लिए आदर्श काम करके यह इज्ज़त मिलती है। उसे सिर्फ आरोपों का शिकार नहीं बनने देना चाहिए। बल्कि इसमें जांच परख के ऊंचे सिद्धांतों का ध्यान रखा जाना चाहिए। साथ ही कानूनी तौर पर यह पता लगाना चाहिए कि क्या इन आरोपों के पीछे कोई साजिश थी और एक गठजोड़ करके मुख्य न्यायाधीश को बदनाम करना था। मुख्य न्यायाधीश के अपने बैंक के खाते में थोड़ी सी राशि बतौर ऐसे जस्टिस है जो निर्दोष कामकाज का हवाला देते हुए काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि न्यायालय की आज़ादी आज गंभीर खतरे के दौर से गुजर रही है। कुछ ताकतें मुख्य न्यायाधीश के आफिस को निष्क्रिय करना चाहती हैं।

इस बेंच के एक वकील उत्सव सिंह बैंस ने यह आरोप लगाया कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आरोप एक बड़ी साजिश का हिस्सा है। इस कांड में अदालत के हताश कर्मचारी हैं और दूसरे दलाल हैं। शिकायत करने वाले ने तो यह तक भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की जो इन हाउस कमेटी मामले की पड़ताल में जुटी है उनमें एक जस्टिस के तो अच्छे ताल्लुकात हैं, न्यायाधीश गोगोई से। इन हाउस कमेटी से जुड़े जस्टिस ने फिर खुद को ही उस कमेटी से अलग कर लिया। उनकी जगह फिर एक महिला जज को मौका मिला।

 इस पूरे मामले में कई खामियां लगती हैं। पहली, ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि यदि मुख्य न्यायाधीश से ही शिकायत है तो इन हाउस जांच ‘सेक्सुअल हेरासमेंट ऑफ वीमेन एट वर्क प्लेस’ एक्ट 2013 के तहत क्यों नहीं हो रही है। फिर सुप्रीम कोर्ट में बनी यह कमेटी क्या सिर्फ अदालत के कर्मचारियों की जांच करेगी? जज की नहीं? मुख्य न्यायाधीश की जांच में कई पहलू हैं। पहले भी मुख्य न्यायाधीश गोगाई की कड़ी आलोचना हो चुकी है जब वे एक विशिष्ट मामले में न्यायिक सुनवाई कर रहे थे। इससे ऐसा लगता है मानो ऐसे मामले वे हल नहीं कर पाते।

ऐसा मामला पहला नहीं है जो मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के साथ कहा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस एके गांगुली को इस्तीफा तब देना पड़ा जब अदालत में ‘इन्टर्न’ कर रही एक महिला ने उनके खिलाफ ‘सेक्सुअल हेरासमेंट’ का आरोप लगाया। मध्यप्रदेश की एक न्यायिक अधिकारी ने हाईकोर्ट के जज एसके नंगीले पर ‘सेक्सुअल हेरासमेंट’ के आरोप लगाए थे। राज्यसभा के तीन सदस्यों की जांच कमेटी ने सारी जांच की लेकिन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई।