उपेक्षित उत्पीड़न

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14 मई, 2013 को उत्तर प्रदेश के एटा जिले में पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में लिया. उन्हें महीने भर पुराने एक कत्ल के मामले में पकड़ा गया था. तीन दिन बाद उनमें से एक बलबीर सिंह की लखनऊ के एक अस्पताल में मौत हो गई. सिंह के रिश्तेदार सुनुल कुमार इसकी वजह पुलिस की थर्ड डिग्री को बताते हैं. वे कहते हैं, ‘पुलिस ने उन्हें बिजली के झटके दिए थे. उन्हें पेट्रोल और तेजाब के इंजेक्शन भी लगाए गए. पुलिस ने उन्हें जबरन बिजली के हीटर पर बैठाया जिससे वे बुरी तरह जल गए.’ कुमार के मुताबिक  बलबीर ने मरने से पहले उनसे बात की थी. वे कहते हैं, ‘उनका कहना था कि पुलिस उनसे हत्या में शामिल होने की बात कबूलवाना चाहती थी.’

बलबीर सिंह की हालत कितनी खराब हो चुकी थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले उन्हें जिला अस्पताल एटा में भर्ती कराया गया, यहां बात नहीं बनी तो उन्हें एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा भेजा गया और आखिर में जीएमसी मेडिकल कॉलेज लखनऊ जहां आईसीयू में उनकी मौत हो गई. मरने से पहले मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में उन्होंने उन पुलिसवालों के नाम लिए जिन्होंने उन्हें यातनाएं दी थीं. इसके बाद पुलिस को हत्या का मामला दर्ज करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद निचले स्तर के पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया. खबर लिखे जाने तक इस मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई थी. एक सब-इंस्पेक्टर फरार है. संबंधित थाने के एसओ देवेंद्र पांडे को सिर्फ तबादला करके छोड़ दिया गया, जबकि कुमार के मुताबिक सिंह को बिजली के झटके पांडे ने ही दिए थे. सिंह का एक साल का बेटा है और उनकी पत्नी दूसरी संतान को जन्म देने वाली हैं.

ऐसा ही एक मामला चार अगस्त 2013 को भी सुर्खियों में आया. पंजाब में अमृतसर के सुल्तानविंड इलाके सतिंदरपाल सिंह नाम के एक युवक की पुलिस हिरासत में मौत के मुद्दे पर लोगों ने जमकर हंगामा किया. सतिंदर की पत्नी और मां का आरोप था कि पुलिस ने उसे पकड़कर गैर कानूनी हिरासत तरीके से हिरासत में रखा. उनका कहना था कि इस दौरान दी गई यातनाओं से जब उसकी मौत हो गई तो परिवार को सूचना दिए बिना आनन-फानन में पोस्टमाटर्म करवाकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया. इस मुद्दे पर जब बवाल होने लगा तो  एक एएसआई और दो अन्य पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया.

2010 में अपने एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था, ‘अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए तो सभ्य समाज का अस्तित्व खत्म हो जाएगा….आपराधिक कृत्य करने वाले पुलिसकर्मियों को दूसरे लोगों के मुकाबले और भी कड़ी सजा दी जानी चाहिए, क्योंकि उनका कर्तव्य लोगों की सुरक्षा करना है न कि खुद ही कानून तोड़ना.’ यह फैसला उस मामले में आया था जिसमें थाने में एक व्यक्ति का जननांग काटने के दोषी बाड़मेर के एक कांस्टेबल किशोर सिंह को अदालत ने पांच साल कैद की सजा सुनाई थी. अदालत ने पुलिस की मानसिकता की निंदा करते हुए कहा था कि लोकतांत्रिक देश के कानून में थर्ड डिग्री जैसे गैरकानूनी तरीकों के इस्तेमाल की कोई जगह नहीं है.

लेकिन पुलिस या जेल अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न और आम भाषा में कहें तो टॉर्चर के आरोपों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा. बीती 18 मई को ही फैजाबाद अदालत में पेशी के बाद लखनऊ जेल ले जाए जा रहे 32 साल के खालिद मुजाहिद ने दम तोड़ दिया. सात जून, 2012 को इस तरह का एक और मामला सामने आया. बदायूं के रहने वाले 23 वर्षीय रिंकू यादव की पुलिस हिरासत के दौरान खून की उल्टियां करने के बाद मौत हो गई.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 2001 से 2010 के बीच देश 14 हजार से भी ज्यादा लोगों की पुलिस हिरासत और जेल में मौत की घटनाएं दर्ज की हैं. यानी औसतन देखा जाए तो चार मौतें रोज. आयोग के मुताबिक पिछले तीन साल में ही पुलिस हिरासत में 417 और न्यायिक हिरासत में 4,285 मौतें हुई हैं. इस दौरान पुलिस हिरासत में शारीरिक शोषण और यातना के 1,899 मामले देखे गए हैं, जबकि 75 मामले आयोग ने ऐसे दर्ज किए हैं जिनमें पुलिसकर्मियों पर ही बलात्कार का आरोप है.

पुलिसिया उत्पीड़न से जुड़ी इस तरह की ज्यादातर  घटनाओं पर कोई खास चर्चा नहीं होती. सवाल उठता है कि ऐसा क्यों होता है. दरअसल इसके दो कारण हैं. पहला कारण तो यह आम धारणा है कि उत्पीड़न उन्हीं का होता है जिनका होना चाहिए. दूसरा कारण भी एक धारणा ही है और वह यह है कि गैरकानूनी होने पर भी उत्पीड़न ही एक ऐसा तरीका है तो आतंकी घटनाओं या माफिया गतिविधियों के संदेह में गिरफ्तार लोगों से कुछ अहम जानकारियां उगलवा सकता है.

लेकिन जानकारों के मुताबिक ये दोनों ही धारणाएं सही नहीं हैं. ज्यादातर मामलों में उत्पीड़न से सटीक जानकारी नहीं मिलती. बल्कि एक लिहाज से यह सुरक्षा व्यवस्था के लिए संकट की बात ही होती है क्योंकि अक्सर इससे डरकर लोग वे अपराध कबूल लेते हैं जो उन्होंने किए ही नहीं जबकि असल अपराधी खुले घूमते रहते हैं. दूसरी बात यह है कि उत्पीड़न सिर्फ कुछ दुर्लभ मामलों तक ही सीमित नहीं है. अक्सर यह छोटे-मोटे अपराध में पकड़े गए आरोपितों के साथ होता है.

रतनजी वाघेला का मामला इसका एक उदाहरण है. उन्हें इस साल 27 अप्रैल को गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया. डिप्रेशन और याद्दाश्त की कमी जैसी बीमारियों के मरीज वाघेला का कसूर यह था कि वे एक सरकारी काफिले के रास्ते में आ गए थे. उनके परिवार का आरोप है कि उन्हें प्रताड़ित किया गया जिसकी वजह से उन्हें बहुत चोटें आईं और उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. नई दिल्ली में इस मुद्दे पर अभियान चला रहे सुहास चकमा कहते हैं, ‘दुनिया में बहुत कम देश ऐसे होंगे जहां उत्पीड़न इतना व्यवस्थित और व्यवस्थागत है. ‘ सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ कहती हैं, ‘भारत में उत्पीड़न अपवाद नहीं है. यह तो आम बात है.’

फिर भी वाघेला खुशकिस्मत हैं. उनके मामले में चकमा की शिकायत के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गुजरात सरकार को आदेश दिया है कि वह वाघेला को तीन लाख रु का अंतरिम मुआवजा दे. यही नहीं, उससे चकमा को प्रताड़ित किए जाने के आरोप की जांच करने के लिए भी कहा गया है. लेकिन उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की कोई किरण नहीं है जो भारत के थानों और जेलों में बर्बर यातना के शिकार हो रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में दो साल जेल में बिताने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बिनायक सेन कहते हैं, ‘मैंने देखा है कि लोगों को तब तक पीटा जाता है जब तक वे ढेर नहीं हो जाते. और ऐसा करने वालों को सजा का कोई डर नहीं होता. भारतीय जेलों में यह रोज की हकीकत है.’ सेन को 2010 में राष्ट्रद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी और उनका मामला अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बन गया था. ऊपरी अदालत में इस फैसले के खिलाफ अपील करने के बाद वे फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. सेन कहते है कि जब उन्होंने साथी कैदियों के उत्पीड़न का विरोध किया तो उनका मजाक उड़ाया गया. उनके मुताबिक उन्होंने उत्पीड़न से पीड़ित एक भी व्यक्ति नहीं देखा जो इसके खिलाफ न्याय चाहता हो.

वैसे तो सरकारी एजेंसियों द्वारा उत्पीड़न के मामले बाकी दुनिया में भी सामने आते रहते हैं, लेकिन भारत का जिक्र इस मायने में उल्लेखनीय है कि कमोरेस या गिनी-बिसाऊ जैसे छोटे-छोटे पांच-छह देशों की लिस्ट में वह अकेला बड़ा देश है जो उत्पीड़न के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के साथ समझौता करने के बावजूद इसे अपने यहां लागू नहीं कर पाया है. हिरासत में यातना, अमानवीय व्यवहार और सजा के खिलाफ 1997 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के साथ समझौता किया था. इसे लागू करने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों में संशोधन कर नया कानून बनाना जरूरी था. हालांकि हिरासत में उत्पीड़न के खिलाफ कुछ प्रावधान भारतीय दंड संहिता में हैं, लेकिन उनमें न उत्पीड़न की व्याख्या है और न इसे आपराधिक माना गया है. इस बर्बरता को रोकने के लिए जरूरी है कि इसे गैरकानूनी घाेषित करते हुए इसके लिए सजा का प्रावधान हो. 2010 में प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल के साथ ऐसी एक कोशिश हुई तो थी मगर बिल के मसौदे में कई गड़बड़ियां थीं जिन पर ध्यान दिलाए जाने पर उनकी जांच के लिए एक संसदीय समिति बनाई गई और तब से मामला ठंडे बस्ते में ही है.

नतीजा यह है कि भारत में कानून का पालन सुनिश्चित होने की जो प्रक्रिया है उत्पीड़न इसका एक अभिन्न हिस्सा बना हुआ है और न्यायपालिका भी इससे आंखें फेरे रहती है. इस मुद्दे पर लंबे समय से अभियान चला रही उच्चतम न्यायालय की अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर कहती हैं, ‘ज्यादातर मामलों में उत्पीड़न पर न्यायपालिका सिर्फ जुबानी गुस्सा दिखाती है. इसे अंजाम देने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होती.’ कभी किसी मामले पर हल्ला हो जाता है तो ज्यादा से ज्यादा पीड़ित को मुआवजा दे दिया जाता है. लेकिन जहां तक दोषी पर कार्रवाई का सवाल है तो मामला हमेशा के लिए घिसटता रह जाता है. हैरानी की बात है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े ही बता रहे हैं कि हिरासत में उत्पीड़न के आरोप में पुलिस और जेल अधिकारियों के खिलाफ इतने मामलों के बावजूद आज तक एक भी उदाहरण ऐसा नहीं जहां आरोप सिद्ध हो गए हों.

सामाजिक कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि हिरासत के दौरान होने वाली मौतों में से ज्यादातर उत्पीड़न के चलते होती हैं. हालांकि स्वाभाविक ही है कि अधिकारी हमेशा इससे इनकार करते हैं. अधिकांश ऐसी मौतें खुदकुशी के तौर पर दर्ज होती हैं तो कइयों के पीछे की वजह बीमारी बताई जाती है.

‘जब वे पैर के तलवे पर डंडे बरसाते थे तो दर्द यहां तक जाता था. तीन दिन बाद मैंने मान लिया कि बम रखने वाला मैं था’ नरेश कुजूरी (कुजूरी पर गढ़चिरौली में वह बम रखने का आरोप था जिससे हुए धमाके में 12 लोग मारे गए)
‘जब वे पैर के तलवे पर डंडे बरसाते थे तो दर्द यहां तक जाता था. तीन दिन बाद मैंने मान लिया कि बम रखने वाला मैं था’
नरेश कुजूरी
(कुजूरी पर गढ़चिरौली में वह बम रखने का आरोप था जिससे हुए धमाके में 12 लोग मारे गए)

और जो इस बर्बरता के बावजूद बच जाते हैं उनके लिए कभी न खत्म होने वाले एक बुरे सपने की शुरुआत हो जाती है. 24 जनवरी, 2012 को बिहार के शेखपुरा जिले में पुलिस ने मुकेश कुमार नाम के एक व्यक्ति को अवैध शराब बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया था. बाद में राज्य मानवाधिकार आयोग में दर्ज एक शिकायत के मुताबिक 21 साल के कुमार को जिले के एसपी बाबू राम के सरकारी आवास पर ले जाया गया और वहां बुरी तरह पीटा गया. उसके मल द्वार में डंडा घुसेड़ दिया गया. (हालांकि पुलिस इससे इनकार करती है). चार दिन बाद जब उसे अस्पताल लाया गया तो डॉक्टरों ने पाया कि उसकी आंत बुरी तरह फट चुकी है. हालत बिगड़ने पर उसे दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान लाना पड़ा जहां उसके ऑपरेशनों पर अब तक करीब दो लाख रु खर्च हो चुके हैं. डॉक्टरों के मुताबिक उसकी चोट शायद ही कभी ठीक हो.

कुमार के मामा धीरज सिंह बताते हैं, ‘जब कानून के रखवाले ही ऐसा अपराध करेंगे तो आदमी कहां जाए?’ मामला सुर्खियों में आया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एसपी के तबादले के आदेश दिए. शेखपुरा की नई एसपी मीनू कुमारी कहती हैं, ‘एसपी सहित मामले में शामिल सभी पुलिसकर्मियों का

तबादला कर दिया गया है. मैं इस मामले पर कोई और टिप्पणी नहीं कर सकती.’

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