उत्तर प्रदेश में बदलाव के संकेत

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पहले पाँच चरणों में भाजपा बैकफुट पर

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार पहले पाँच चरण तक भाजपा के लिए सन् 2017 के विपरीत एक चौंकाने वाला अनुभव रहा। इन चरणों में प्रचार के लिए पहुँचे भाजपा नेताओं को जनता का खुला विरोध सहना पड़ा। जनता ने उनके भाषण सुनने से मना कर दिया या उन्हें सभा स्थल से भागने को मजबूर कर दिया। देवरिया में 22 फरवरी को भाजपा के लोकप्रिय नेता मनोज तिवारी को तो लोगों के विरोध के चलते बाइक से भागना पड़ा।

एक अनुमान के मुताबिक, इन पाँच चरणों में जनता की तरफ़ से भाजपा के नेताओं के खुले विरोध या उन्हें भगाने की 100 से ज़्यादा घटनाएँ हुईं। क्या भाजपा के प्रति जनता के रूख़ का यह बड़ा सन्देश है? या यह महज़ छिटपुट घटनाएँ थीं? इसका पता 10 मार्च को ही चलेगा। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त बता रही है कि कम-से-कम इन पाँच चरणों में भाजपा चुनाव प्रचार में काफ़ी रक्षात्मक दिखी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति की गहरी जानकारी रखने वाले जानकारों के दावे सही हैं, तो इन चरणों में भाजपा ने 2017 के चुनाव में जीतीं सीटों में से 40 से 50 फ़ीसदी सीटें खो दी हैं।

भाजपा को इस चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा)-राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) गठबन्धन ही नहीं, कांग्रेस और बसपा से भी कई सीटों पर टक्कर मिली है। सपा-रालोद की चुनाव सभाओं में भीड़ से गठबन्धन के नेता उत्साहित हैं और उनके ख़ेमे के बीच चर्चा से ज़ाहिर होता है कि वे ख़ुद को जनता की तरफ़ से भाजपा के विकल्प के रूप में चुना हुआ मान रहे हैं। मतदान का फ़ीसद भी पिछले चुनावों के मुक़ाबले कमोवेश सभी चरणों में थोड़ा कम रहा है और राजनीति को समझने वालों के एक ख़ेमे का कहना है कि इसका कारण यह है कि पिछले चुनाव में जो लोग भाजपा के पक्ष में मत देने के लिए बड़ी संख्या में निकले थे, वे इस बार उससे निराशा के कारण तटस्थ रहे। हालाँकि इस बार कुछ मतदान बूथों पर रिकॉर्ड 90 फ़ीसदी तक मतदान हुआ है।

इस बार एक और दिलचस्प बात दिखी है। चुनाव प्रचार में नेताओं ने मुद्दों की गाड़ी पटरी से उतारने की कोशिश की; लेकिन जनता ख़ुद उसे पटरी पर ले आयी। भाजपा का प्रचार इन चरणों में बिल्कुल भी जनता के मुद्दों को छू नहीं पाया। यही कारण था सपा, कांग्रेस और बसपा जैसी पार्टियों को योगी सरकार पर आक्रमण करने का खुला रास्ता मिल गया।

ख़ुद जनता ने जान नेताओं को प्रचार के दौरान घेरा, तो उनके सवाल रोज़गार, खेती, गन्ना, महँगाई और कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान बड़े पैमाने पर इंसानी ज़िन्दगियाँ जाने के इर्द-गिर्द थे। उत्तर प्रदेश की नदी में ही कोरोना में जान गँवाने वालों के शव तैरते मिले थे।

मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपनी सरकार का पाँच साल का जो लेखा-जोखा रखा, उससे जनता बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं दिखी है। भाजपा के लिए चिन्ता का बड़ा सबब यह रहा है कि अभी तक के पाँच चरणों में उसका हिन्दू-मुस्लिम का एजेंडा जनता के एक छोटे-से तबक़े को छोडक़र बाक़ी जनता के दिमाग़ में नहीं घुस पाया। भाजपा को इससे बड़ा नुक़सान झेलना पड़ा है, क्योंकि वह चाहकर भी जनता के मुद्दों पर प्रभावशाली तरीक़े से लौट नहीं पायी है। भाजपा ने राम मन्दिर को चुनाव में ज़्यादा नहीं भुनाया। सम्भवत: भाजपा का शीर्ष नेतृत्व राम मन्दिर, मथुरा और काशी को 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए बचाकर रखना चाहती है। उस चुनाव तक राम मन्दिर का निर्माण लगभग पूरा हो चुका होगा और मथुरा का राग भाजपा छेड़ चुकी होगी।

राम मन्दिर की बात करें, तो भाजपा के लिए यह मुद्दा कई चुनावों में सोने की खान साबित हुआ है। लेकिन इस बार भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने शायद इसे राज्य में बहुत ज़्यादा नहीं भुनाने दिया। यहाँ तक कि अपने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अयोध्या (या मथुरा) से चुनाव लडऩे की हार्दिक इच्छा को भी केंद्रीय नेतृत्व ने नहीं माना। ज़ाहिर है भाजपा को लगता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे इन धार्मिक मुद्दों की ज़रूरत पड़ सकती है। भाजपा के बड़े नेता भी नाम ज़ाहिर न करने की सूरत में स्वीकार करते हैं कि उनके सबसे बड़े ब्रांड नरेंद्र मोदी का जनता पर प्रभाव अब 2019 जैसा नहीं रहा है, भले मैदान में मोदी के सामने टिकने वाला कोई प्रभावशाली चेहरा फ़िलहाल सामने न हो। राहुल गाँधी हैं; लेकिन उन्हें विपक्ष की सर्व-मान्यता हासिल करनी होगी।

नहीं चला हिन्दू-मुस्लिम कार्ड

भाजपा हाल के साल में हिन्दू-मुस्लिम को हर चुनाव के केंद्र में रखती रही है। लेकिन धीरे-धीरे जनता इसके प्रभाव से विमुख हुई है। कारण साफ़ है कि उसे लगता है कि यह मुद्दे उसका पेट नहीं भर सकते, न ही उसके बच्चों को रोज़गार दे सकते हैं। यही कारण रहा है कि इस चुनाव में भाजपा नेताओं को जनता ने जब प्रचार के दौरान घेरा या उनका विरोध किया, तो उनके सवाल इन्हीं मुद्दों पर थे और नेताओं के पास इनका कोई ठोस जवाब नहीं था। अगर देखें, तो भाजपा के लिए चुनाव मतदान गंगा और यमुना के उपजाऊ इलाक़ों से होते हुए गोमती तट (चौथे चरण) तक पहुँचने के वक़्त तक कोई ख़ास उम्मीद वाला नहीं दिखा। अवध और सरयू पार पूर्वांचल में जनता क्या करेगी? यह तो नतीजों में ही पता चलेगा। लेकिन फ़िलहाल भाजपा अवध में बढ़त की उम्मीद कर रही है। हालाँकि पूरब उसके लिए फिर कठिन हो सकता है। लेकिन इन चरणों में मुक़ाबला सीधे-सीधे भाजपा के ब्रांड नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के भाजपा क्षत्रप योगी आदित्यनाथ बनाम सपा के ब्रांड अखिलेश यादव के बीच दिखा है। कांग्रेस के लिए इतने वर्षों बाद प्रियंका गाँधी पहली बार जनता के बीच निश्चित ही उपस्थिति दिखाने में सफल रहीं। शायद लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को इसका लाभ मिले। हाँ, विधानसभा चुनाव में अपनी सीटें ज़्यादा करने से कांग्रेस कोई बड़ा करिश्मा शायद न कर पाए। बसपा भी शुरुआती ठंड से बाहर निकलकर कई सीटों पर जीत सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनाव जनसभाओं में बार-बार डबल इंजन सरकार की बात की। अर्थात् लखनऊ और दिल्ली में एक ही पार्टी की सरकार। सवाल यह है कि क्या पिछले पाँच साल तक दोनों जगह डबल इंजन की सरकार नहीं थी? लेकिन इसके बावजूद योगी सरकार को लेकर जनता के बीच विरोधी लहर (एंटी इनकम्बेंसी) हुई है, तो डबल इंजन सरकार के फ़ायदे के दावों पर सवाल तो उठते ही हैं। देखना दिलचस्प होगा कि डबल इंजन सरकार के नाम पर क्या जनता भाजपा पर भरोसा कर रही है? कारण यह है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने भी डबल इंकम्बेंसी है- केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार दोनों की।

किसानों की नाराज़गी

हालाँकि कुछ विश्लेषक मानते हैं कि सीधे खातों में पैसा डालने की मोदी सरकार की नीति भाजपा को फ़ायदा दे सकती दे सकती है। एक बड़ा वर्ग इससे लाभान्वित हुआ है। लेकिन इन सबके बावजूद शुरुआती चरण में किसान आन्दोलन का चुनाव में जबरदस्त प्रभाव दिखा है। इसके बाद के चरण में किसान-मुसलमान भी भाजपा के ख़िलाफ़ रहे। सपा की सम्भावनाओं और उम्मीदों के बीच पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी मैदान में आने से ख़ुद को रोक नहीं पाये। पिछले साल के मध्य तक भाजपा उत्तर प्रदेश में ख़ुद को बहुत मज़बूत मानकर चल रही थी। हालाँकि कोरोना वायरस के दूसरे घातक हमले में बड़े पैमाने पर लोगों की मौतों और उसके बाद किसान आन्दोलन के आख़िरी छ: महीनों ने राजनीतिक स्थिति को बदल दिया। लखीमपुर खीरी में जो हुआ उसने ग़ैर-सिख और ग़ैर-किसान मतदाता के मन में भी ग़ुस्सा भर दिया। यह आरोप लगाया जाता है कि भाजपा के स्थानीय नेताओं ने यहाँ हिन्दू-सिख के बीच दरार डालने की कोशिश की थी; लेकिन वह सफल नहीं हुई। चौथे चरण में जब यहाँ मतदान हुआ, तो यह 65.54 फ़ीसदी था, जिससे ज़ाहिर होता है कि लखीमपुर खीरी किसान हत्याकांड को लेकर लोगों में जबरदस्त ग़ुस्सा रहा। ऊपर से इसके गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मिश्रा ‘मोनू’ ज़मानत मिलने से लोग नाराज़ हैं।

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल बदलने में सबसे बड़ी भूमिका किसान आन्दोलन की दिखती है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत और पूरब में योगी सरकार में मंत्री रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर को बदलाव का श्रेय जाता है। ऊपर के एक के बाद एक 14 दलित भाजपा विधायकों के इस्तीफ़ों से माहौल बदला है। यह साफ़ हो गया है कि भाजपा का रास्ता उतना साफ़ नहीं रहा है, जितना जितना आज से कुछ महीने पहले दिख रहा था।

इस चुनाव से पहले भाजपा से ज़्यादा बेहतर रणनीति सपा की दिखी। इसका असर भी पहले पाँच चरणों में दिखा है। उसने पिछड़े और दलित वर्गों को साधने में चतुराई दिखायी। ये वर्ग भाजपा से नाराज़ हैं। क्योंकि उसने जातिगत जनगणना से मना कर दिया था। सरकारी कम्पनियों का निजीकरण भी आरक्षित वर्गों के लिए चुनाव का मुद्दा है। हाल के हफ़्तों में यह साफ़ दिखा है कि सामाजिक न्याय वाली राजनीतिक ताक़तें लम्बे अरसे बाद सपा के साथ लामबंद हुई हैं। भाजपा को इसका नुक़सान हो सकता है, भले भाजपा नेता इससे मना करते हैं।

रोज़गार बड़ा मुद्दा

इस चुनाव में रोज़गार बड़ा मुद्दा रहा है। तालाबंदी (लॉकडाउन) में सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर जो लोग अपना रोज़गार छोडक़र वापस गाँवों को गये, उनमें उत्तर प्रदेश के बहुत युवा और अन्य लोग थे। तालाबंदी के बाद असंगठित क्षेत्र की जैसी हालत हुई है, उसने बेरोज़गारों की कतार लम्बी कर दी है। इसके लिए सरकारी नौकरियों बनाया जा सकता था; लेकिन ऐसा हुआ नहीं। भले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दावा है कि उन्होंने इन पाँच साल में साढ़े चार लाख लोगों को नौकरियाँ दीं। लेकिन ज़मीन पर बेरोज़गारी को लेकर सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी दिखती है। इसका कारण राज्य में बड़े पैमाने पर ख़ाली पड़े पदों पर भर्ती न होना और लाखों युवाओं की नौकरी जाना है।

उत्तर प्रदेश के चुनाव के बीच में ही राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार ने पुरानी पेंशन देने का ऐलान करके उत्तर प्रदेश में भी माहौल गर्म कर दिया है। देश भर में कर्मचारी यूनियन पुरानी पेंशन लागू करने की माँग कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के चुनाव से इसका कनेक्शन यह है कि सपा नेता अखिलेश यादव अपनी सरकार आने पर पुरानी पेंशन का वादा कर चुके हैं। इसका असर यह हुआ है कि कर्मचारी संगठन सपा गठबन्धन के साथ खड़े दिख रहे हैं।

भाजपा के समर्थक सुस्त

पाँच दौर के मतदान से यह ज़ाहिर होता है कि ग्रामीण इलाक़ों और सपा गठबन्धन के प्रभाव वाले इलाक़ों में मतदान ज़्यादा हुआ है, जबकि शहरों और भाजपा समर्थक इलाक़ों में मतदान कम रहा। इन चरणों में प्रचार के दौरान भी भाजपा नेताओं को दिक़्क़तें झेलनी पड़ीं। कानपुर जैसे बड़े शहर में भाजपा नेताओं की सभाओं और रोड शो में भीड़ का टोटा दिखा। एक मौक़े पर तो रोड शो में कम भीड़ को देखकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की नाराज़गी वाली वीडियो बहुत वायरल हो गयी। वहीं एक जगह योगी आदित्यनाथ ने एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने किसी अन्य दल की भीड़ को फोटो शॉप पर एडिट कराकर पोस्ट कर दिया, जिस पर वह ट्रोल हो गये।

उत्तर प्रदेश में सन् 1989 के बाद सरकार का कभी भी दोहराव नहीं हुआ है। भाजपा के लिए यह भी बड़ी चिन्ता का सबब है। भाजपा नेता तक यह मान रहे हैं कि कम मतदान उन्हें नुक़सान का अहसास है। हिन्दू-मुस्लिम एजेंडा न चल पाने के बाद भाजपा के नेता, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी अपने भाषणों में मतदाताओं को अखिलेश यादव के सत्ता में आने की स्थिति में गुण्डा-बदमाश और मुसलमानों के ताक़तवर होने का डर दिखाते नज़र आये।

बसपा और कांग्रेस का हाल

बसपा को इस चुनाव में दो कारणों से समर्थन की कमी रह सकती है। एक यह कि बसपा ज़रूरत पडऩे पर भाजपा को समर्थन दे सकती हैं। जनता, यदि भाजपा को हटाना चाहती है, तो उसे बसपा का यह रूख़ सही नहीं लगेगा और वह उसे वोट नहीं देगी। दलित वर्ग के बुद्धिजीवी नया नेतृत्व चाहते हैं। हाँ, इस चुनाव बसपा का सबसे पुराने मतदाता जाटव अभी भी उसके साथ दिखते हैं। ग़ैर-जाटव सपा या कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं। इस चुनाव में बसपा की रणनीति ख़राब रही। उसने बड़ी संख्या में मुस्लिम प्रत्याशी तो खड़े किये; लेकिन उनका रुझान सपा की तरफ़ दिखा है। इसका कारण यह है कि उन्हें लगता है कि यदि भाजपा को हराना है, तो सपा को ताक़त देनी होगी। बसपा के महामंत्री सतीश मिश्रा राम मन्दिर में पूजा करके चुनाव अभियान में कूदे और बसपा प्रमुख मायावती को ज़्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतारने के लिए तैयार किया; लेकिन इस वर्ग के वोट अभी भी भाजपा या कांग्रेस को जाते दिख रहे हैं।