उत्तर-पूर्व केसरिया हुआ पर उत्तर प्रदेश, बिहार में झटका | Tehelka Hindi

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उत्तर-पूर्व केसरिया हुआ पर उत्तर प्रदेश, बिहार में झटका

भारतीय जनता पार्टी ने 'चलो पल्टाई (हमें बदलना चाहिए) का नारा दिया था। उत्तरपूर्व के नौजवान मतदाताओं को यह लुभा गया। 'चलो पल्टाई 2011 की एक बांग्ला फिल्म से लिया गया है। वह फिल्म आज के युवाओं की जि़ंदगी, सोच और आकांक्षाओं पर थी। उत्तरपूर्व में अपनी कामयाबी से भाजपा ने भारत के एक बड़े भूभाग में कब्जा जमाया लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में हार ने उनका गणित बिगाड़ दिया लगता है।

2018-03-31 , Issue 06 Volume 10

उत्तर-पूर्व में जीत का जो उन्माद भाजपा में भरा था, वह उत्तर प्रदेश और बिहार के उपचुनावों में मिली पराजय से उतर गया। गोरखपुर की सम्मान का प्रतीक बनी सीट के हारने से भाजपा को खासा धक्का लगा है। ध्यान रहे कि गोरखपुर की सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से खाली हुई थी। वे इस सीट से पांच बार चुने गए थे। इसके साथ फूलपुर की सीट भी उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या के पास थी। समाजवादी पार्टी ने ये दोनों सीटें मायावती के सहयोग से आसानी से जीत लीं। मौर्या ने स्वयं कहा कि बसपा ने बड़ी सफलता से अपने वोट समाजवादी पार्टी को दिलवा दिए।

इस जीत का अनुभव अगले लोकसभा चुनावों में एक बड़े गठबंधन का आधार बन सकता है। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल आरजेडी ने अररिया संसदीय सीट और जहानाबाद की विधानसभा सीटों पर कब्जा कर लिया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एकदम ट्वीट कर लालू प्रसाद यादव को बधाई दी। इससे भविष्य में अच्छे गठबंधन के संकेत मिलते हैं।

केसरिया झंडे का अब त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में लहराना भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) की ऐतिहासिक जीत है। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस पार्टी किस तरह सिमट रही है और भारतीय जनता पार्टी लगातार कितनी तेजी से विकास कर रही है। उत्तरपूर्व के तीनों राज्यों में भाजपा की जो विजयगाथा लिखी गई है वह अविस्मरणीय है। पूरे देश के 29 राज्यों में से 22 राज्यों पर पार्टी या उसके सहयोगियों का सीधा नियंत्रण है। इसका राजनीतिक संदेश बहुत साफ है कि कांग्रेस का हाथ त्रिपुरा और नगालैंड में ज़ीरो रह गया है।

जबकि 2013 में त्रिपुरा में कांग्रेस को दस सीटें मिली थीं और नगालैंड में 2013 में आठ सीटें मिली थी। भाजपा अब खुद को उत्तर भारत की पार्टी नहीं अखिल भारतीय पार्टी होने का दावा कर सकती है। अब भाजपा की निगाहें कर्नाटक, ओडिसा,बंगाल पर हैं साथ ही राजस्थान और मध्यप्रदेश में एंटी इकंबैंसी का कामयाबी से मुकाबला करने पर।

पारंपरिक तौर पर उत्तरपूर्वी राज्य केंद्र में राज कर रही पार्टी की ही ओर झुकते हैं क्योंकि उन राज्यों की ज़रूरत ’ग्रांटÓ और ’फंडÓ की रहती है। लेकिन भाजपा ने उत्तरपूर्वी राज्यों में अपना जो सिक्का जमाया है वह इस सोच से बिलकुल अलग इसलिए है क्योंकि इन राज्यों के मतदाताओं ने खुद केसरिया को मत देकर अपनी पसंद जताई है। यानी यह पार्टी न केवल हिंदी इलाकों में बल्कि असम, मणिपुर, नगालैंड, अरूणाचल और अब त्रिपुरा के लोगों की पसंदीदा पार्टी है। दरअसल जब से ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में माकपा को परास्त किया तब से वामपंथी बेहद अलग-थलग पड़ गए हैं। उधर उत्तरपूर्व में भाजपा का प्रदर्शन कम से कम वाम राज की त्रिपुरा से विदाई को बताता है। इसने 59 सीटों में से 43 पर जीत हासिल की है। त्रिपुरा में जीत का महत्व इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि त्रिपुरा में वामपंथी मोर्चा 25 साल से लगातार राज कर रहा था।

‘चलो पल्टाई’ ने खींचा ध्यान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई और देखरेख में पार्टी की चुनावी मशीनरी सक्रिय रही। इसे 2013 में जहां शून्य मिला था वहीं आज इसकी सरकार बनी है। वाकई ’चलो पल्टाईÓ और विकास के वादे का मतदाताओं पर असर पड़ा और उन्होंने उखाड़ फैंकी सरकार वह भी माणिक सरकार की। आंकड़ों के अनुसार त्रिपुरा में पूरे देश की तुलना में सबसे ज़्यादा बेरोजगारी है। लेकिन माकपा आज भी वामपंथियों की पुरानी पड़ गई विचारधारा जिसमें समान अधिकारों की क्रांति का ही राग अलापती है। जबकि भाजपा विकास और बदलाव की रणनीति का वादा करती है। त्रिपुरा में 25 साल से चला आ रहा वामपंथी राज अब धसक चुका है। भाजपा को 60 सदस्यों वाली विधानसभा में दो तिहाई का बहुमत मिल गया है। इस तरह माणिक सरकार का चार बार मुख्यमंत्री बने रहने का सिलसिला भी टूट गया है।

सत्ता संभाल रही माकपा को आंकड़ों के खेल में हराया। सत्ता में रही माकपा को 42.6 फीसद वोट तो मिले लेकिन वाम मोर्चा को आंकड़ों के खेल में पराजय मिली। यह 50 से घट कर 16 सीट पर आ गई। कांग्रेस तो पूरी तौर पर हवा हो गई। इसका 2013 में 36.53 फीसद वोटों की हिस्सेदारी थी लेकिन इस बार उसका खाता ही नहीं खुला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, ‘शून्य से शिखर तक की यात्रा इसलिए ही कामयाब हो पाई क्योंकि विकास का मज़बूत एजेंडा है और हमारा संगठन मज़बूत रहा है।Ó

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा उनकी पार्टी की प्रभावशाली विजय से यह संकेत मिलता है कि अगले कुछ और चुनाव जो आगे होने हैं उनमें भी ऐसा ही होगा। पार्टी के कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है। वे 2019 के चुनावों की तैयारी में अभी से लगे हुए हैं।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 06, Dated 31 March 2018)

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