उत्तरपूर्व में तिल का ताड़ बनी छोटी सी जातीय झड़प

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शिलांग मशहूर रहा है महिलाओं की सुरक्षा के लिए। लेकिन शिलांग में अभी हाल एक लंबी रात हुई झड़पों, लूटपाट और आगजनी की क्या बीती उसकी गंूज पंजाब तक पहुंची। इसकी अहम वजह थे वाल्मीकि सिख जो यहां तीन दशकों से जमे हुए हैं। शिलांग में बसे सिखों को इस झड़प में अपनी बेशकीमती वस्तुए और घरेलू ज़रूरत का सम्मान खोना पड़ा। गनीमत रही कि किसी की जिंदगी नहीं गई और कोई घायल भी नहीं हुआ।

अफवाह या कहें एक झूठ जो वाट्सएप के जरिए शिलांग के निचले इलाकों में फैली और पूरे सप्ताह झड़पों, आगजनी और लूटपाट का बाज़ार गर्म रहा। इसके चलते दो समुदायों के बीच घृणा और अफवाहें खूब फैली। मजहबी सिख समुदाय के सदस्यों, शहर के पंजाबी लेन में बरसों से रह रहे लोगों और एक ‘खासीÓ युवक और उसके सहयोगियों के बीच किसी स्थानीय मुद्दों पर नाराज़गी देखते-देखते तिल का ताड़ बन गई। हालांकि झूठ यह प्रचारित किया गया एक घायल युवक की उसके जख्मों के चलते मौत हो गई और ‘खासीÓ प्रदर्शन प्रदर्शनकारियों ने पंजाबी लेन के चारों और घेरा डाल रखा है। उनकी मांग है कि इस इलाके के सिख निवासी इस क्षेत्र से बाहर जाएं। यहां आकर बसे निवासी लगभग एक डेढ़ शताब्दी से यहां रह रहे हैं। उन्हें यहां लाए थे ब्रिटिश कोलोनियर। इनसे वे साफ-सफाई के काम कराते थे। तब से ये यहीं बस गए। उन्हें बाहर से आकर यहां बसा हुआ माना भी नहीं जा सकता। प्रशासन ने ज़रूर बड़ी सजगता से पंजाबी लेन में रहने वालों को हिंसा का शिकार होने से बचाया हालांकि वहां इकट्ठी हुई भीड़ हिंसा पर उतारू रही। तब वहां कफ्र्यू लगाया गया और सेना को ‘अल्र्टÓ रखा गया।

तस्वीरों में आकर्षक ‘पहाडिय़ों की रानी शिलांगÓ अब वह आकर्षक पहाड़ी स्थल नहीं रहा। अब यह शोर भरा शहर है जो बगैर किसी नक्शे के फैला हुआ है। हालांकि अब ज़रूरत है कि यहां भी नगरीय अनुशासन अमल मेें लाएं जाएं। आंदोलनकारियों की मांग है कि सिख समुदाय को यहां से दूसरी जगह बसाया जाए। उनकी यह मांग पूरी तौर पर अतार्किक है और इसका प्रतिवाद किया जाना चाहिए। दरअसल मेघालय हाईकोर्ट ने जि़ला कमिश्नर के उस आदेश पर 1986 में रोक लगा दी जिसमें पंजाबी लेन (जिसे स्वीपर्स कॉलोनी नाम से भी जाता है।)

ऐसी घटनाएं फिर न हों इसलिए सरकार को यहां के सिख निवासियों की रक्षा करनी चाहिए। आंदोलनकारियों की मांग का समर्थन तो कतई नही होना चाहिए। सिख फोरम ने देश की धार्मिक अधिकारों पर नज़र रखने वाली संस्था ‘नेशनल कमीशन फार माइनॉरिटीज (एनसीएम) में अपनी गुहार लगाई है। इसमें कहा गया है कि शिलांग का छोटा सा सिख समुदाय आज एक मजबूत स्थानीय समुदाय के अन्याय का शिकार हो रहा है। सिख फोरम एक गैर राजनीतिक मंच है जिसमें विभिन्न पेशे के लोग हैं जिनमें व्यापारी, पूर्व सैन्य अधिकारी, नौकरशाह आदि हैं। इसका गठन लेफ्टिनेंट जगजीत सिंह अरोड़ा ने किया था जो बांग्लादेश युद्ध के नायक थे। जब पूरे देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में सिख विरोधी दंगे हुए थे तब इसका गठन जगजीत सिंह अरोडा ने किया था। इस फोरम में महासचिव पूर्व डीआईजी प्रताप सिंह ने दिल्ली में एनसीएस प्रतिनिधि मंडल के साथ शिलांग पंजाबी लेन में बसे सिखों की रक्षा की मांग की थी।

मेघालय राज्य की राजधानी शिलांग में 29 मई से अखबारों में ‘खासीÓ समुदाय और पंजाब कॉलोनी (स्वीपर्स कालोनी) के निवासियों के बीच झगड़े फसाद की खबरें आने लगी थीं। तकरीबन एक दर्जन लोग घायल हुए। इनमें सिपाही भी थे। यहां बसे सिख निवासी उन दलित पंजाबियों की वंशज हैं जिन्हें ब्रिटिश 1857 के पहले यहां लाए थे। पूरे उप महाद्वीप तब फिरंगी जल बिछ रहा था।

हमने दिल्ली में एनसीएम के सिख सदस्य मनजीत सिंह राय से बातचीत की और अनुरोध किया कि शिलांग में अल्पसंख्यक सिखों की हर तरह की सुरक्षा की जाए। यह जानकारी दी लेफ्टिनेंट- कर्नल सुखविंदर सिंह सोढ़ी ने वे धार्मिक अधिकारों पर नज़र रखने वाली संस्था के प्रतिनिधियों से मिले थे।